बांका : हरिनंदन बाबा के सान्निध्य में आकागोडा में शुरू हुआ संतमत सत्संग का 34वां अधिवेशन
बांका के आकागोडा गांव में जिला संतमत सत्संग का 34वां वार्षिक अधिवेशन महर्षि हरिनंदन परमहंस के सान्निध्य में शुरू हुआ। उन्होंने सत्य, अहिंसा और सदाचार ...और पढ़ें

संतमत सत्संग के दौरान आकागोडा गांव में मंच पर विराजमान संत समाज।
संवाद सूत्र, बाराहाट (बांका)। जिला संतमत सत्संग का 34वां वार्षिक अधिवेशन सोमवार को आकागोडा गांव में आध्यात्मिक वातावरण के बीच आरंभ हुआ। कार्यक्रम का उद्घाटन महर्षि मेंही आश्रम, कुप्पाघाट भागलपुर के संतमत आचार्य महर्षि हरिनंदन परमहंस ने किया। इस अवसर पर मंचासीन संतमत के सभी संतों को श्रद्धा-भक्ति के साथ सामूहिक माल्यार्पण कर सम्मानित किया गया। सुबह से ही कार्यक्रम स्थल पर भक्तों की भीड़ उमड़ पड़ी। कार्यक्रम की शुरुआत वैदिक मंत्रोच्चारण, गुरु वंदना और भजन-कीर्तन के साथ हुई।
आचार्य महर्षि हरिनंदन परमहंस ने अपने प्रवचन में कहा कि संतमत का मूल उद्देश्य मानव जीवन को सत्य, अहिंसा और सदाचार के मार्ग पर अग्रसर करना है। उन्होंने बताया कि भौतिक युग में आत्मिक शांति पाने के लिए सत्संग और साधना अत्यंत आवश्यक है। सत्संग के माध्यम से ही ईश्वर की प्राप्ति संभव है और जैसा संग होगा, वैसा ही प्रभाव पड़ेगा। उन्होंने भक्तों को गुरु की सेवा श्रद्धापूर्वक करने की सलाह दी, क्योंकि सनातन परंपरा में गुरु को भगवान से भी श्रेष्ठ माना गया है।

महर्षि हरिनंदन परमहंस ने कहा कि परमेश्वर सर्वशक्तिमान हैं, लेकिन ईश्वर की स्वीकृति और गुरु के आशीर्वाद के बिना कोई योजना पूरी नहीं हो सकती। गुरु का आशीर्वाद साधक के प्रयासों को प्रभावशाली बनाता है और जीवन में अचानक लाभ या संकट का टलना इसी दैवीय कृपा का संकेत है। अधिवेशन के दौरान संतों ने गुरु-शिष्य परंपरा, नाम-स्मरण, ध्यान-साधना, आत्मज्ञान, सदाचार, अहिंसा और मानव सेवा पर विस्तार से चर्चा की।
कार्यक्रम को सफल बनाने के लिए महिला और पुरुष श्रद्धालुओं के लिए अलग बैठने की व्यवस्था की गई। इसके साथ ही सुरक्षा, पेयजल, चिकित्सा, स्वच्छता, ठहरने और भोजन की समुचित व्यवस्था की गई। इस कार्य में गणेश चौधरी, जयप्रकाश चौधरी सहित अन्य श्रद्धालु और आयोजक सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं। अधिवेशन ने न केवल आध्यात्मिक अनुशासन को बल दिया, बल्कि लोगों में मानव सेवा, गुरु भक्ति और सदाचार के महत्व को भी उजागर किया। श्रद्धालुओं ने कार्यक्रम में भाग लेकर इसे सफल और अनुकरणीय बनाया।
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