कोसी स्नातक में पढ़े-लिखे वोटरों की अजीब दास्तान; आधे घर बैठे, जो पहुंचे उनमें से 9086 ने कर दिया वोट रद
Kosi Graduate MLC Election Analysis: बिहार विधान परिषद के कोसी स्नातक निर्वाचन क्षेत्र में भाजपा के डॉ. एनके यादव ने ...और पढ़ें

Kosi Graduate MLC Election Analysis: डॉ एनके यादव को मिठाई खिलाती उनकी पत्नी डॉ. वीणा यादव, बगल में विधायक रोहित पांडेय।
HighLights
डॉ. एनके यादव ने तीसरी बार जीत दर्ज की।
स्नातक मतदाताओं की मात्र 52.52% मतदान भागीदारी।
9,086 पढ़े-लिखे मतदाताओं के वोट अमान्य हुए।
डिजिटल डेस्क, भागलपुर। Kosi Graduate MLC Election Analysis: बिहार विधान परिषद के कोसी स्नातक निर्वाचन क्षेत्र का परिणाम आ चुका है। दूसरी वरीयता के वोटों की गिनती के बाद भाजपा के डॉ. एनके यादव ने लगातार तीसरी बार जीत दर्ज कर शानदार 'हैट्रिक' बना ली। जीत का जश्न, ढोल-नगाड़े, अबीर-गुलाल और बधाइयों का दौर जारी है।
लेकिन, इस चुनावी जीत के उल्लास से इतर यदि आप नतीजों के भीतर छिपे आंकड़ों की परतों को उधेड़ेंगे, तो हमारे समाज के तथाकथित 'प्रबुद्ध' और 'डिग्रीधारी' तबके की एक बेहद अजीब, हास्यास्पद और आंखें खोलने वाली तस्वीर सामने आएगी।
14 जिले, 1.34 लाख डिग्रियां... पर आधे घर पर सोते रहे!
जरा इस चुनाव के गणित और मतदाता की योग्यता को समझिए। स्नातक निर्वाचन क्षेत्र यानी वोटर बनने की पहली और आखिरी शर्त-आप कम से कम ग्रेजुएट (स्नातक) हों। इस क्षेत्र में बिहार के 14 जिले आते हैं, जहां बीए, बीएससी, बीकॉम से लेकर एमए, एमटेक और पीएचडी तक की भारी-भरकम डिग्रियां रखने वाले कुल 1,34,082 मतदाता पंजीकृत थे।
लेकिन जब 23 अक्टूबर को लोकतंत्र के इस महापर्व में वोट की आहुति देने का दिन आया, तो इन 'स्कॉलर्स' की सुस्ती देखने लायक थी। कुल मतदान हुआ महज 52.52 प्रतिशत! यानी करीब आधे वोटर अपने घरों के ड्राइंग रूम में बैठकर चाय की चुस्कियों के साथ 'देश की दुर्दशा' पर ज्ञान देते रहे, लेकिन बूथ तक जाने की जहमत नहीं उठाई।
गांव के अनपढ़ और देहाती मजदूर जहां लंबी कतारों में लगकर लोकतंत्र को जिंदा रखते हैं, वहीं हमारे पढ़े-लिखे साहिबान ने वोटिंग डे को बस एक 'हॉलिडे' मानकर निपटा दिया। अब इस उदासीनता पर लंबा-चौड़ा विमर्श हो सकता है- चाहे तो किसी सेमिनार में कर लीजिए या सोशल मीडिया के किसी ज्ञानवर्धक थ्रेड पर!
9086 वोट रद: क्या डिग्री केवल विजिटिंग कार्ड के लिए है?
चलिए, आधे लोग नहीं आए, इसे उनकी 'बौद्धिक सुस्ती' मानकर छोड़ भी दें। लेकिन जो 73,487 जागरूक वोटर बूथ तक पहुंचे, उन्होंने जो 'कलाकारी' दिखाई, वह तो सिर पकड़ लेने वाली है!
मतगणना के दौरान जब मतपेटियां खुलीं, तो पता चला कि कुल पड़े मतों में से 9,086 वोट (यानी लगभग 12.36 प्रतिशत) सीधे-सीधे अमान्य (रद) पाए गए। यानी हर आठवां पढ़ा-लिखा वोटर बैलेट पेपर पर सही तरीके से वोट तक नहीं डाल सका! चुनाव आयोग ने स्पष्ट निर्देश दिया था कि वरीयता क्रम 1, 2, 3 के रूप में अंकों में लिखना है। लेकिन हमारे ग्रेजुएट मतदाताओं ने किसी पर परीक्षा की तरह टिक (✓) मार दिया, किसी पर क्रॉस (✗) लगा दिया, तो किसी ने बॉक्स के बाहर ही नंबर घसीट दिए।
अब सबसे बड़ा चुभता हुआ सवाल यही है- आखिर इन डिग्रियों का हासिल क्या है? क्या शिक्षा सिर्फ एक अदद नौकरी पाने, समाज में रौब दिखाने और नाम के आगे 'डॉक्टर' या 'इंजीनियर' का तमगा लटकाने का जरिया भर रह गई है? जब देश के शीर्ष 14 जिलों के 9 हजार से ज्यादा स्नातक और स्नातकोत्तर मतदाता एक पर्चे पर सही निशान नहीं लगा सकते, तो लोकतंत्र की दशा और दिशा पर सवाल उठना लाजिमी है।
डिग्रियों के पहाड़ तो खड़े हैं, लेकिन बुनियादी लोकतांत्रिक चेतना का यह अकाल साफ बता रहा है कि कागजों पर साक्षर होना और लोकतंत्र में 'जागरूक नागरिक' होना दो बिल्कुल अलग बातें हैं!
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