बिहार में PhD के लिए नए नियम लागू: 10% से ज्यादा 'कॉपी-पेस्ट' पर वापस होगी थीसिस, गाइड पर भी गिरेगी गाज
बिहार के विश्वविद्यालयों में अब पीएचडी शोध कार्य राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुसार होंगे, जिससे डिग्री की विश्वसनीयता बढ़ेगी। ...और पढ़ें

बिहार में PhD के लिए नए नियम लागू (AI Generated Image)
HighLights
छह विशेषज्ञों का पैनल, तीन राज्य के बाहर से होंगे।
थीसिस मूल्यांकन छह माह के भीतर, डिजिटल माध्यम से।
दस प्रतिशत से अधिक साहित्यिक चोरी पर थीसिस वापस।
दीनानाथ साहनी, पटना। बिहार के विश्वविद्यालयों में पीएचडी शोध कार्य में राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मानकों का अनुपालन अनिवार्य कर दिया गया है। इसे लेकर कुलाधिपति सचिवालय ने सभी कुलपतियों को निर्देश दिया है।
इस निर्देश से माना जा रहा है कि विश्वविद्यालयों से पीएचडी करना अब पहले से अधिक चुनौतीपूर्ण होगा, लेकिन इसकी डिग्री की विश्वसनीयता और स्वीकार्यता राष्ट्रीय स्तर पर बढ़ेगी।
कुलाधिपति ने यूनिफार्म ऑर्डिनेंस-2026 में पीएचडी थीसिस के मूल्यांकन की पूरी प्रक्रिया में बदलाव किया है और इसे सख्ती से अनुपालन सुनिश्चित कराने का निर्देश कुलपतियों को दिया गया है।
नए नियमों के अंतर्गत कुलपति छह बाहरी विशेषज्ञों का पैनल तैयार करेंगे, जिसमें कम-से-कम तीन राज्यों के प्रोफेसर सम्मिलित होंगे। आवश्यकता पड़ने पर विदेशी विशेषज्ञ भी पैनल में सम्मिलित किए जा सकेंगे।
राज्यपाल सचिवालय के एक अधिकारी ने बताया कि राज्य के विश्वविद्यालयों में पीएचडी शोध कार्य समयसीमा के अंदर पूरा कराने का निर्देश कुलपतियों को दिया गया है। विभागीय प्री-पीएचडी प्रेजेंटेशन देना होगा।
शोधार्थी द्वारा थीसिस जमा करने के बाद छह माह के अंदर उसका मूल्यांकन और फिर साक्षात्कार लेना अनिवार्य किया गया है।
विश्वविद्यालय को थीसिस जमा होने के 15 दिनों के भीतर उसे डिजिटल माध्यम से परीक्षकों को भेजना जरूरी है। अगर मूल्यांकन में 10 प्रतिशत से कम साहित्यिक चोरी (प्लेगरिज्म) सुनिश्चित करना होगा। इससे अधिक प्लेगरिज्म पाया जाता है तो उसे सुधार हेतु शोधार्थी को वापस करना होगा।
कम से कम एक शोध-पत्र मान्यता प्राप्त जर्नल में प्रकाशित कराना होगा। दो राष्ट्रीय या अंतरराष्ट्रीय सेमिनारों में शोध प्रस्तुत करना अनिवार्य है।
शोधार्थियों के हित में यह पहल, पीएचडी की साख बढ़ेगी
उच्च शिक्षा में शोध और नवाचार की दिशा में राज्यपाल सचिवालय का यह पहल शोधार्थियों के हित में है। इससे राज्य की पीएचडी की राष्ट्रीय-अतरराष्ट्रीय स्तर पर साख बढ़ेगी।
वहीं, विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने शोध और उच्च शिक्षा की गुणवत्ता को वैश्विक स्तर पर सुधारने के लिए पीएचडी कार्यक्रमों में राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मानकों का कड़ाई से पालन करना अनिवार्य कर दिया है। इस दृष्टि से भी राज्य के विश्वविद्यालयों में पीएचडी शोध में गुणवत्ता सुनिश्चित करना आवश्यक है।
वैश्विक मानक और प्रक्रिया विनियम के तहत राज्यपाल के स्तर से यह सुनिश्चित किया जा रहा है कि शोध कार्य विदेशी और राष्ट्रीय स्तर के सर्वश्रेष्ठ शैक्षणिक तरीकों के अनुकूल हों। शोध नैतिकता भी जरूरी है क्योंकि साहित्यिक चोरी (प्लेगरिज्म) रोकने और डेटा की प्रामाणिकता बनाए रखने के लिए शोधार्थियों को शुरुआत में ही नैतिक मानकों का प्रशिक्षण देने की जरूरत है। - पूर्व कुलपति डॉ. रासबिहारी सिंह, पटना विश्वविद्यालय एवं नालंदा खुला विश्वविद्यालय
जरूरी प्वाइंटर्स-
- छह विशेषज्ञों का तैयार पैनल में तीन एक्सपर्ट राज्य के बाहर के होंगे
- शोध थीसिस का मूल्यांकन राज्य के बाहर के तीन विशेषज्ञ करेंगे
- छह विशेषज्ञों के पैनल में विदेशी परीक्षक भी हो सकेंगे शामिल
- दो परीक्षकों ने थीसिस खारिज की तो शोधार्थी का पंजीयन होगा रद
- दोषी पाए जाने पर शोधार्थी के गाइड़ पर भी होगी कार्रवाई
- थीसिस जमा होने के छह माह के अंदर मूल्यांकन एवं साक्षात्कार जरूरी
- विश्वविद्यालय को डिजिटल माध्यम से परीक्षकों को भेजनी होगी थीसिस
- प्लेगरिज्म 10 प्रतिशत से अधिक होने पर थीसिस सुधार के लिए वापस
