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    पुराने मुकदमों के आधार पर किसी को ‘असामाजिक तत्व’ घोषित करना अवैध, पटना हाईकोर्ट का बड़ा फैसला

    Updated: Sat, 18 Jul 2026 12:25 AM (IST)

    पटना हाईकोर्ट ने बिहार कंट्रोल ऑफ क्राइम एक्ट, 2024 पर महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। ...और पढ़ें

    पटना हाई कोर्ट।

    पटना हाई कोर्ट।

    HighLights

    1. पुराने मुकदमों पर 'असामाजिक तत्व' घोषित करना गलत: हाईकोर्ट।

    2. नालंदा डीएम का आदेश रद्द, याचिकाकर्ता को मुआवजा मिलेगा।

    3. बीसीसी एक्ट के तहत कार्रवाई के लिए नए मामले जरूरी।

    जागरण संवाददाता, पटना। पटना हाईकोर्ट ने बिहार कंट्रोल ऑफ क्राइम (बीसीसी) एक्ट, 2024 के तहत किसी व्यक्ति को ‘असामाजिक तत्व’ घोषित करने और उसकी आवाजाही पर अंकुश लगाने की कार्रवाई पर महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि केवल पुराने मुकदमों के आधार पर किसी नागरिक के मौलिक अधिकारों का हनन नहीं किया जा सकता।

    अदालत ने नालंदा के जिलाधिकारी द्वारा पारित आदेश को अवैध करार देते हुए न केवल उसे रद कर दिया, बल्कि राज्य सरकार को याचिकाकर्ता को एक लाख रुपये मुआवजा और 10 हजार रुपये वाद व्यय एक माह के भीतर देने का निर्देश भी दिया। साथ ही कहा कि यह राशि संबंधित दोषी अधिकारियों से वसूल की जाए।

    न्यायाधीश राजीव रंजन प्रसाद एवं कुमार मनीष की खंडपीठ ने राजेश कुमार की आपराधिक रिट याचिका पर फैसला सुनाते हुए कहा कि बीसीसी एक्ट के तहत कार्रवाई तभी संभव है, जब कार्रवाई शुरू होने से पूर्व के 24 महीनों में कम से कम दो ऐसे मामलों में पुलिस रिपोर्ट न्यायालय में दाखिल हुई हो, जो अधिनियम की परिभाषा के अनुरूप हों।

    याचिकाकर्ता के विरुद्ध वर्ष 2021 के बाद कोई नया मामला दर्ज नहीं हुआ था, इसलिए उसे ‘असामाजिक तत्व’ घोषित करना कानून के विपरीत था।

    अदालत ने कहा कि जिलाधिकारी ने बिना पर्याप्त और सत्यापित सामग्री के केवल पुलिस की अनुशंसा पर याचिकाकर्ता को प्रत्येक सोमवार और शुक्रवार को सिलाव थाना में हाजिरी लगाने का आदेश दे दिया। जबकि याचिकाकर्ता गिरियक थाना क्षेत्र का निवासी था। अदालत ने इसे नियमों के भी विपरीत माना।

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    स्वतंत्रता के अधिकार पर गंभीर आघात

    खंडपीठ ने कहा कि किसी व्यक्ति को ‘असामाजिक तत्व’ घोषित करना उसकी प्रतिष्ठा और संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत प्रदत्त जीवन एवं व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार पर गंभीर आघात है।

    ऐसे मामलों में प्रशासन को अत्यधिक सावधानी और स्वतंत्र रूप से तथ्यों का परीक्षण करना चाहिए। मात्र पुलिस अधिकारी के अप्रमाणित और सामान्य आरोपों के आधार पर इतनी कठोर कार्रवाई नहीं की जा सकती।

    अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि थाना प्रभारी से लेकर एसपी और फिर जिलाधिकारी तक एक ही दिन में बिना किसी स्वतंत्र सत्यापन के पूरी प्रक्रिया पूरी कर दी गई, जिससे कार्रवाई की निष्पक्षता पर प्रश्नचिह्न लगता है।

    इन टिप्पणियों के साथ हाईकोर्ट ने 20 मार्च 2026 को पारित जिलाधिकारी, नालंदा के आदेश को निरस्त करते हुए याचिका स्वीकार कर ली।

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