कॉपर का इतिहास: तीर-तलवार से इलेक्ट्रिक कार तक... मानव सभ्यता की सबसे पहली धातु, आज कैसे चला रही दुनिया?
Copper History: तांबा, मानव द्वारा खोजी गई सबसे पहली धातु, प्राचीन काल से लेकर आधुनिक औद्योगिक क्रांति तक महत्वपूर्ण रही ...और पढ़ें
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Copper History: मानव इतिहास की पहली धातु, जिसे पीटकर बनाए हथियार-सिक्के और बर्तन, आज उसी के दम पर कैसे टिकी पूरी टेक्नोलॉजी?
HighLights
तांबा मानव द्वारा खोजी गई सबसे पहली महत्वपूर्ण धातु है।
प्राचीन औजारों से लेकर आधुनिक इलेक्ट्रिक कारों तक इसका सफर।
बिजली, इलेक्ट्रॉनिक्स और नवीकरणीय ऊर्जा में तांबा अनिवार्य है।
बिजनेस डेस्क, नई दिल्ली| कभी सोचा है? जब आप दीवार पर लगा स्विच ऑन करते हैं, तो पलक झपकते ही पंखा कैसे चलने लगता है, बल्ब से रोशनी कैसे होने लगती है? या फिर सड़क पर बिना आवाज किए दौड़ती इलेक्ट्रिक गाड़ियां किस चीज केदम पर दौड़ रही हैं। इसका एक ही जवाब है- तांबा, यानी कॉपर। जिस तांबे को आज हम सिर्फ बिजली के तारों या पूजा के बर्तनों में देखते हैं, असल में वह इंसान द्वारा खोजी गई और इस्तेमाल की गई सबसे पहली धातु है।
तांबे का इतिहास 7000 से 10,000 साल पुराना है। कभी इससे जानलेवा हथियार बने, कभी खूबसूरत जेवर, कभी सिक्के तो कभी रसोई के बर्तन। लेकिन आज इंडस्ट्रियल डिमांड ने इस लाल रंग की धातु का पूरा खेल ही बदल कर रख दिया है।
दुनिया में पहली बार कब और कहां मिला कॉपर?
तांबा मानव इतिहास की सबसे पुरानी इस्तेमाल की जाने वाली धातु है। इतिहासकार और पुरातत्वविदों के पास मौजूद सबूत बताते हैं कि इंसानों ने इसका इस्तेमाल कम से कम 9,000 ईसा पूर्व के आसपास शुरू कर दिया था। आर्कियोलॉजिस्ट बताते हैं कि तांबे (Copper History) के शुरुआती प्रमाण मध्य पूर्व के इलाके से जुड़े हैं। उत्तरी इराक में करीब 8700 ईसा पूर्व का एक तांबे का आभूषण मिलने का उल्लेख किया जाता है। एशिया माइनर, यानी आज के तुर्की के आसपास के इलाके भी तांबे के शुरुआती इस्तेमाल और विकास के बड़े केंद्रों में रहे।
शुरुआत में इंसान को तांबा किसी बड़ी फैक्ट्री या खदान से नहीं मिला था। प्रकृति में कहीं-कहीं यह नेटिव कॉपर, यानी लगभग शुद्ध धातु के रूप में मिलता था। इंसान ने ऐसे टुकड़ों को उठाया, पीटकर आकार दिया और उनसे छोटी चीजें बनानी शुरू कीं। यही वह दौर था, जब मानव सभ्यता धीरे-धीरे सिर्फ पत्थर पर निर्भर रहने से आगे बढ़ रही थी।
लेकिन असली बदलाव तब आया, जब इंसान ने तांबे को अयस्क से निकालना सीखा। आग, भट्ठी और गलाने की तकनीक ने तांबे को नई ताकत दी। इसके बाद सिर्फ प्राकृतिक रूप से मिले छोटे टुकड़ों पर निर्भर रहने की जरूरत नहीं रही। तांबे के अयस्क से धातु निकालकर बड़े पैमाने पर इस्तेमाल का रास्ता खुला।
इंडस्ट्रियल डिमांड ने बदल दिया पूरा खेल
फिर आया एक और बड़ा मोड़- ब्रॉन्ज यानी कांसे का दौर। जब तांबे में टिन मिलाया गया तो उससे ज्यादा मजबूत मिश्रधातु बनी। इसी तकनीक ने हथियार, औजार और दूसरी चीजों को मजबूत बनाया और मानव इतिहास में ब्रॉन्ज एज की पहचान बनी। यानी तांबे ने सिर्फ एक नई धातु नहीं दी, बल्कि टेक्नोलॉजी के विकास की दिशा बदल दी।
मिस्र, मेसोपोटामिया, यूनान और रोमन दुनिया में तांबे की अहमियत लगातार बढ़ती गई। इससे हथियार, सजावटी सामान, बर्तन और सिक्के बनाए गए। रोमन दौर में तांबे का खनन और गलाना बड़े स्तर पर होता था।
एक वैज्ञानिक अध्ययन के मुताबिक,
रोमन काल, करीब 250 ईसा पूर्व से 350 ईस्वी तक, तांबे का उत्पादन काफी तेज था। अनुमान है कि उस दौर में रोमन दुनिया ने कुल मिलाकर करीब 40 से 50 लाख टन तांबा पैदा किया। 1750 के आसपास शुरू हुई औद्योगिक क्रांति के समय तांबे का ग्लोबल उत्पादन मात्र 10,000 टन सालाना था। लेकिन जैसे-जैसे दुनिया में बिजली और मशीनों का विस्तार हुआ, तांबे की डिमांड रॉकेट की तरह भागी। 1850 से लेकर आज तक तांबे के उत्पादन में 300 गुना से ज्यादा की वृद्धि हुई है। वर्तमान में तांबे का उत्पादन बढ़कर करीब 90 लाख टन सालाना से भी ऊपर जा चुका है।
रोमन साम्राज्य के पतन के बाद उत्पादन में गिरावट आई। बाद में चीन के सोंग राजवंश के दौर में तांबे का उत्पादन फिर तेजी से बढ़ा। लेकिन तांबे ने साल 1850 के दौरान सबसे बड़ी छलांग आधुनिक दौर में लगाई, खासकर बिजली के इस्तेमाल के साथ। क्योंकि तांबा बिजली का बहुत अच्छा चालक है।
जैसे-जैसे बिजली घरों, शहरों, फैक्ट्रियों और संचार व्यवस्था तक पहुंची, तांबे की जरूरत तेजी से बढ़ी। तार, मोटर, जनरेटर, ट्रांसफॉर्मर और इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों ने इसकी मांग बढ़ा दी। एक आर्थिक इतिहास अध्ययन के अनुसार 1850 के बाद बिजली के बढ़ते इस्तेमाल ने तांबे के उपयोग में जबरदस्त उछाल पैदा किया और आधुनिक दौर में इसका उत्पादन शुरुआती औद्योगिक युग की तुलना में कई गुना बढ़ गया।
आखिर भारत कैसे पहुंचा तांबा?
इसका जवाब बेहद दिलचस्प है। तांबा भारत में सिर्फ बाहर से आया, ऐसा कहना सही नहीं होगा। आर्कियोलॉजिस्ट बताते हैं कि भारतीय उपमहाद्वीप में तांबे के अपने स्रोत भी थे और प्राचीन व्यापार नेटवर्क के जरिए दूर-दराज के इलाकों से भी तांबा आता था।
राजस्थान का खेती क्षेत्र, अरावली इलाके और वहां की गणेश्वर-जोधपुरा संस्कृति तांबे के प्राचीन इतिहास में महत्वपूर्ण मानी जाती है। पुरातात्विक साक्ष्य बताते हैं कि इस क्षेत्र में तांबे की वस्तुओं का बड़ा भंडार मिला है। यह भी माना जाता है कि इस इलाके के लोग हड़प्पा सभ्यता को तांबा सप्लाई करते रहे होंगे।
हड़प्पा सभ्यता, जिसे हम सिंधु घाटी सभ्यता भी कहते हैं, एक ब्रॉन्ज एज सभ्यता थी। आज के भारत और पाकिस्तान के बड़े इलाके में फैली इस सभ्यता में तांबा और तांबा आधारित मिश्रधातुओं का इस्तेमाल होता था। धोलावीरा, कालीबंगन, लोथल और राखीगढ़ी जैसे केंद्र भारत में इस विशाल सभ्यता की कहानी बताते हैं।
दिलचस्प बात यह है कि प्राचीन हड़प्पाई दुनिया के समुद्री और व्यापारिक संपर्क भी दूर तक फैले हुए थे। पुरातात्विक और रासायनिक अध्ययनों के आधार पर ओमान से तांबा आने की संभावना के भी संकेत मिले हैं। यानी भारत का प्राचीन तांबा नेटवर्क स्थानीय खदानों तक सीमित नहीं था, बल्कि पश्चिम एशिया और समुद्री व्यापार से भी जुड़ा हुआ था।
भारत में बाद के दौर में भी तांबे का इस्तेमाल लगातार जारी रहा। राजस्थान, झारखंड और दूसरे क्षेत्रों में तांबे के खनन और धातुकर्म की पुरानी परंपराओं के प्रमाण मिलते हैं। उत्तर भारत में 1500 से 1000 ईसा पूर्व के बीच के तांबे से बने हार्पून, कुल्हाड़ी और अन्य वस्तुएं भी मिली हैं। यह बताता है कि तांबा भारतीय समाज में सिर्फ सजावट की चीज नहीं था।
आज दुनिया में कहां होता है सबसे ज्यादा प्रोडक्शन?
आज दुनिया में सबसे ज्यादा कॉपर कहां पैदा होता है? इसका जवाब है- चिली। तांबा उत्पादन में चिली लंबे समय से दुनिया का सबसे बड़ा देश है। 2025 के लिए उपलब्ध अनुमानित आंकड़ों में भी चिली सबसे ऊपर है। उसके बाद डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो और पेरू जैसे बड़े उत्पादक देश आते हैं। चीन, अमेरिका, रूस और जाम्बिया भी प्रमुख देशों में शामिल हैं।
चिली की ताकत इतनी बड़ी है कि 2025 में उसकी अनुमानित कॉपर माइन प्रोडक्शन करीब 53 लाख टन रही। दुनिया का कुल खनन उत्पादन करीब 2 करोड़ 30 लाख टन के आसपास आंका गया है। यानी दुनिया के कॉपर बाजार में चिली की हिस्सेदारी बेहद अहम है।
कॉपर प्रोडक्शन में भारत कहां खड़ा है?
रिपोर्ट्स की मानें तो भारत दुनिया के सबसे बड़े कॉपर माइन उत्पादकों की टॉप सूची में नहीं है। अमेरिकी भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण, USGS के 2025 अनुमान के मुताबिक भारत का खदानों से कॉपर उत्पादन करीब 23 हजार टन था। इसकी तुलना चिली के करीब 53 लाख टन से करें तो साफ है कि खनन उत्पादन में भारत करीब 30वें पायदान पर है। हालांकि भारत में रिफाइंड कॉपर उत्पादन और तांबे की खपत की अलग औद्योगिक अहमियत है।
इंसान के काम आने वाली तीसरी जरूरी धातु
लोहा, एल्युमीनियम, प्लास्टिक और ऑप्टिक फाइबर जैसी कड़ी टक्कर देने वाली चीजों के बाजार में आने के बावजूद, तांबे ने अपनी अहमियत कभी कम नहीं होने दी। 2007 के आंकड़ों के मुताबिक, दुनिया भर में 1.8 करोड़ टन रिफाइंड कॉपर की खपत हुई। वजन के हिसाब से, लोहा और एल्युमीनियम के बाद तांबा इंसान के काम आने वाली दुनिया की तीसरी सबसे महत्वपूर्ण धातु बन चुका है।
आज तांबे की कहानी फिर एक नए मोड़ पर है। बिजली, पावर ग्रिड, इलेक्ट्रॉनिक्स, नवीकरणीय ऊर्जा और इलेक्ट्रिक वाहनों की दुनिया में इसकी जरूरत बनी हुई है। यानी जिस धातु को इंसान ने हजारों साल पहले हाथ से पीटकर आकार दिया था, वही आज आधुनिक टेक्नोलॉजी की नसों में दौड़ रही है।
