वेदांता वाले अनिल अग्रवाल को बड़ा झटका! इस देश का कॉपर प्लांट 60 दिनों के लिए बंद, सप्लाई पर क्या पड़ेगा असर?
वेदांता समूह की जाम्बिया स्थित इकाई KCM ने नचांगा कॉपर स्मेल्टर को 60 दिनों के लिए रखरखाव हेतु बंद कर दिया है। इससे जाम्बिया में कॉपर और सल्फ्यूरिक एस ...और पढ़ें
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वेदांता का जाम्बिया कॉपर स्मेल्टर 60 दिन बंद, आपूर्ति और कीमतों पर प्रभाव
HighLights
KCM नचांगा कॉपर स्मेल्टर 60 दिनों के लिए बंद।
रखरखाव से जाम्बिया में कॉपर उत्पादन प्रभावित होगा।
वैश्विक कॉपर बाजार में कीमतें बढ़ने की संभावना।
नई दिल्ली| कॉपर बाजार के लिए बड़ी खबर सामने आई है। वेदांता समूह की जाम्बिया स्थित इकाई कोंकोला कॉपर माइंस ने अपने नचांगा (KCM Nchanga shutdown) कॉपर स्मेल्टर को जरूरी मरम्मत और रखरखाव के लिए 60 दिनों के लिए बंद (Zambia smelters shutdown) कर दिया है। कंपनी का कहना है कि यह कदम प्लांट की कार्यक्षमता, विश्वसनीयता और लंबे समय के उत्पादन प्रदर्शन को बेहतर बनाने के लिए उठाया गया है।
80000 मीट्रिक टन कॉपर का प्रोडक्शन
KCM के मुताबिक, यह शटडाउन कंपनी की व्यापक आधुनिकीकरण रणनीति का हिस्सा है। कंपनी का लक्ष्य 2030 तक अपना कॉपर उत्पादन बढ़ाकर 3 लाख टन प्रति वर्ष (copper production) तक पहुंचाना है। जाम्बिया के खान मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, KCM ने 2025 में 80,215 मीट्रिक टन कॉपर का उत्पादन किया था।
यह कदम ऐसे समय पर उठाया गया है जब जाम्बिया के अन्य बड़े कॉपर प्रोसेसिंग प्लांट्स भी रखरखाव के दौर से गुजर रहे हैं। जून से सितंबर के मध्य तक नचांगा के अलावा मोपानी (Mopani) और चांबिशी (Chambishi) प्लांट्स में भी लंबे समय का शटडाउन रहेगा। इससे देश में कॉपर और सल्फ्यूरिक एसिड के उत्पादन पर दबाव बढ़ सकता है।
कॉपर मार्केट के लिए क्या है चिंता की बात?
बाजार के लिए चिंता की बात यह भी है कि सल्फ्यूरिक एसिड कॉपर और कोबाल्ट प्रोसेसिंग का अहम कच्चा माल है। वैश्विक स्तर पर ईरान युद्ध के चलते सल्फ्यूरिक एसिड की सप्लाई पहले ही प्रभावित बताई जा रही है। ऐसे में जाम्बिया के बड़े प्लांट्स के बंद होने से सप्लाई और सख्त हो सकती है।
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हालांकि KCM ने कहा है कि वह अपने नचांगा टेलिंग्स लीच प्लांट को सल्फ्यूरिक एसिड की आपूर्ति जारी रखेगा। इसके लिए कंपनी बाहरी स्रोतों के साथ-साथ नचांगा स्थित अपनी 500 टन प्रतिदिन क्षमता वाली एसिड यूनिट का उपयोग करेगी।
विशेषज्ञों का मानना है कि वैश्विक सप्लाई पर दबाव बढ़ने से कॉपर बाजार में कीमतों को अतिरिक्त समर्थन मिल सकता है।
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