प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के 10 साल: किसानों को मिले कितने फायदे, कृषि कारोबार पर क्या पड़ा असर?
प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (PMFBY) ने एक दशक में भारतीय कृषि को महत्वपूर्ण रूप से बदला है। यह योजना अब दुनिया के सबसे बड़े कृषि जोखिम प्रबंधन कार्यक् ...और पढ़ें

भारत हमेशा ही मूल रूप से एक कृषि प्रधान अर्थव्यवस्था रही है. लाखों परिवारों के लिए खेती आजीविका भी रही है और विरासत भी, जो पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ती आई है। देश की प्रगति में किसानों की अहम भूमिका को देखते हुए यह स्वाभाविक है कि वित्तीय समावेशन पर होने वाली किसी भी चर्चा के केंद्र में हमारे अर्थतंत्र की इस मज़बूत नींव को रखा जाए। लेकिन विडंबना यह रही कि जो वर्ग मौसम और आय की अनिश्चितताओं से सबसे ज़्यादा प्रभावित होता है, उसके पास ही लंबे समय तक संगठित वित्तीय सुरक्षा के पर्याप्त साधन नहीं रहे हैं।
बीमा की दुनिया में हम अक्सर ‘प्रोटेक्शन गैप’ यानी सुरक्षा के अभाव की बात करते हैं। भारतीय कृषि क्षेत्र में यह अंतर साफ दिखाई देता था. 2016 से पहले, क्रॉप इंश्योरेंस या फसल बीमा को अक्सर किसानों के लिए एक जटिल और बैंक-केंद्रित औपचारिक प्रक्रिया के रूप में देखा जाता था, न कि वास्तविक सुरक्षा कवच के रूप में। लेकिन प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (पीएमएफबीवाई) की शुरुआत से इस सोच में बदलाव आया।
PMFBY से कितना बदला कृषि कार्य का स्वरुप
अपने दस वर्षों के सफर में, पीएमएफबीवाई व्यापकता और आर्थिक प्रभाव की दृष्टि से दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण कृषि जोखिम प्रबंधन कार्यक्रमों में से एक बन चुकी है. इस योजना की वास्तविक अहमियत उन ठोस आंकड़ों से समझी जा सकती है, जो दिखाते हैं कि यह भारत के कृषि तंत्र को कितनी गहराई से बदल रही है. केवल 2024–25 में ही, 23 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में 4.19 करोड़ से अधिक किसानों को इस योजना के तहत बीमा सुरक्षा मिली. यानी भारत के लगभग एक-तिहाई किसान समुदाय ने पीएमएफबीवाई पर अपना भरोसा जताया. इस योजना की सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक यह है कि आज करीब 55% बीमित किसान
ऐसे हैं जिन्होंने कोई कृषि लोन नहीं लिया हैं, यानी वे अपनी इच्छा से इसमें शामिल हुए हैं. इससे पता चलता है कि किसान अब इस योजना को केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि वास्तविक लाभ देने वाली सुरक्षा के रूप में देख रहे हैं. जोखिम कवरेज के मामले में भी कार्यक्रम का दायरा लगातार बढ़ा है. 2024–25 में लागू राज्यों में कुल बोए गए क्षेत्र (GCA) का लगभग 35% हिस्सा बीमित रहा, जो पिछले वर्षों की तुलना में एक महत्वपूर्ण वृद्धि है. खास बात यह है कि योजना से जुड़े 85% किसान छोटे और सीमांत श्रेणी के हैं. इस लिहाज़ से पीएमएफबीवाई वैश्विक स्तर पर भी अलग पहचान बनाती है, क्योंकि यह सबसे अधिक संवेदनशील वर्ग को सुरक्षा प्रदान करती है।
किसानों के लिए एक मज़बूत सुरक्षा कवच
यह सिर्फ एक आंकड़ा नहीं है, बल्कि सामाजिक समावेशन और समान अवसरों की दिशा में हुए वास्तविक बदलाव का संकेत है. इतना ही नहीं, महाराष्ट्र की विनाशकारी बाढ़ या कर्नाटक में पड़े सूखे जैसे प्राकृतिक संकटों के दौरान, पीएमएफबीवाई किसानों के लिए एक मज़बूत सुरक्षा कवच और झटकों को संभालने वाला प्रमुख सहारा साबित हुई है. आपको जानकर आश्चर्य होगा कि योजना की शुरुआत से अब तक 10.80 करोड़ से अधिक किसानों को कुल मिलाकर ₹1.93 लाख करोड़ से ज़्यादा के दावों का भुगतान किया जा चुका है. इस स्तर पर हुए क्लेम सेटलमेंट ने किसानों को मजबूरी में कर्ज़ लेने की स्थिति से काफी हद तक बचाया है, ऋण अनुशासन को मजबूत किया है और जलवायु से जुड़ी चुनौतियों के दौर में लाखों परिवारों को आर्थिक सहारा दिया है. राज्य सरकारों के लिए भी यह योजना कृषि संकट से निपटने का एक संगठित और व्यवस्थित ढांचा प्रदान
करती है.
पहले जहां केवल तात्कालिक आपदा राहत फंड पर निर्भर रहना पड़ता था, जो अक्सर राज्य के बजट पर अतिरिक्त दबाव डालते थे, वहीं अब यह बीमा-आधारित मॉडल पहले से वित्तपोषित और एक्चुरियल रूप से संतुलित प्रणाली के माध्यम से राहत राशि का वितरण सुनिश्चित करता है. क्लेम और कवरेज से परे, इस योजना के सामाजिक और आर्थिक प्रभावों पर बात करना भी उतना ही ज़रूरी है. बैंकों, कॉमन सर्विस सेंटर्स (CSCs), इंश्योरेंस इंटरमीडियरीज़, एग्री-टेक कंपनियों, फील्ड एन्यूमरेटर्स, वेदर स्टेशन टीमों और राज्य स्तर की PMUs को शामिल करने वाले व्यापक क्रियान्वयन ढांचे ने ग्रामीण और अर्ध-शहरी भारत में रोज़गार के हज़ारों नए अवसर पैदा किए हैं. इस पूरे पारिस्थितिकी तंत्र ने स्थानीय स्तर पर डेटा संग्रह, डिजिटल एक्सटेंशन सेवाओं और फील्ड-लेवल सेवा वितरण की क्षमता को मज़बूत किया है.
साथ ही, पीएमएफबीवाई धीरे-धीरे ज़मीनी स्तर पर बीमा जागरूकता भी बढ़ा रही है. जो किसान पहले बीमा को सिर्फ एक अतिरिक्त खर्च मानते थे, वे अब रिस्क ट्रांसफर के सिद्धांत को समझने लगे हैं. यह समझ परिवर्तनकारी है. यही समझ भारत के बड़े हिस्से के लिए व्यापक वित्तीय सुरक्षा की ओर आगे बढ़ने का रास्ता खोलती है, जैसे जीवन बीमा, स्वास्थ्य बीमा, ट्रैक्टर, संपत्ति और पशुधन बीमा.
पीएमएफबीवाई की सफलता का एक बड़ा आधार इसका टेक्नोलॉजी-आधारित बदलाव रहा है. NCIP डिजिटल इकोसिस्टम, सैटेलाइट की मदद से फसल उत्पादन का आकलन करने वाला YES-TECH, CCE एग्री ऐप, और तेज़ी से विस्तार करते WINDS वेदर डेटा नेटवर्क जैसे प्लेटफॉर्म्स ने प्रक्रिया को ज़्यादा पारदर्शी बनाया है, मानवीय अनुमान पर निर्भरता कम की है और दावा निपटान को पहले से कहीं ज़्यादा तेज़ किया है.
इसके साथ ही, डिजिटल एग्रीकल्चर मिशन के तहत 7.63 करोड़ से अधिक किसान आईडी तैयार की गई हैं और 23.5 करोड़ फसल के प्लॉट्स का सर्वेक्षण किया जा चुका है, जिससे कृषि क्षेत्र के लिए एक विशाल डिजिटल आधार तैयार हुआ है. AI और डेटा टूल्स की मदद से अब वास्तविक समय में कीट निगरानी और स्थानीय स्तर पर वर्षा का पूर्वानुमान संभव हो रहे हैं, जिससे किसानों को समय रहते बेहतर फैसले लेने में सहायता मिलती है. दूसरी ओर, 11 क्षेत्रीय भाषाओं में 93 लाख से अधिक प्रश्नों के उत्तर देने वाले किसान ई-मित्र चैटबॉट जैसे इनोवेशन पहले से ही देशभर के किसानों के लिए जानकारी तक पहुंच को आसान और निर्णय-प्रक्रिया को और भी प्रभावी बना रहे हैं.
जैसे-जैसे जलवायु से जुड़े जोखिम बढ़ रहे हैं, पीएमएफबीवाई के अगले दशक का ध्यान AI-आधारित मौसम पूर्वानुमान पर होना चाहिए, ताकि जोखिम सामने आने से पहले ही उनकी पहचान की जा सके, और योजना का दायरा इतना व्यापक बनाया जा सके कि हर किसान को मज़बूत वित्तीय सुरक्षा मिल सके. जहां 'बीमा उद्योग 2047 तक सभी के लिए बीमा' के लक्ष्य को साकार करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है, वहां पीएमएफबीवाई जैसी योजनाएं बेहद महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगी, और लाखों परिवारों के लिए पहली बार बीमा से जुड़ने का प्रवेश द्वार बनेंगी. जब किसान पारदर्शी प्रक्रियाओं और फसल नुकसान की स्थिति में समय पर मिलने वाले डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर का अनुभव करेंगे, तो बीमा व्यवस्था के प्रति उनका भरोसा और भी मज़बूत होगा.
इसके परिणामस्वरूप, उन्हें अन्य बीमा उत्पादों पर भी विचार करने के लिए प्रेरणा मिलेगी. इस तरह पीएमएफबीवाई केवल एक फसल बीमा योजना भर नहीं रह जाएगी, बल्कि समग्र वित्तीय सुरक्षा की ओर ले जाने वाला रास्ता बन जाएगी. यह योजना न सिर्फ भारत को सार्वभौमिक बीमा कवरेज की दिशा में तेज़ी से आगे बढ़ेगी, बल्कि उन हाथों की सुरक्षा भी सुनिश्चित करेगी, जो पूरे देश का पेट भरते हैं.
लेखक- डॉ. तपन सिंघल, MD और CEO, बजाज जनरल इंश्योरेंस लिमिटेड
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