Undervalued Stock: क्या हर सस्ता शेयर निवेश का मौका है? जानिए सही शेयर चुनने का सबसे भरोसेमंद फॉर्मूला
यह लेख शेयर बाजार में सही और सस्ते शेयरों की पहचान करने के मूल मंत्र बताता है, जिसमें DDM और FCFE जैसे तरीकों का उल्लेख है। यह मार्जिन ऑफ सेफ्टी, धैर् ...और पढ़ें

Undervalued Stock क्या हर सस्ता शेयर निवेश का मौका है जानिए सही शेयर चुनने का सबसे भरोसेमंद फॉर्मूला
HighLights
सही और सस्ते शेयरों की पहचान है मूल मंत्र।
DDM, FCFE, PE रेशियो से करें मूल्यांकन।
मार्जिन ऑफ सेफ्टी और विविधीकरण है महत्वपूर्ण।
नई दिल्ली। शेयर बाजार में पैसा हर कोई लगाना चाहता है, लेकिन अक्सर लोग दूसरों की देखा-देखी या बिना सोचे-समझे किसी भी शेयर में दांव लगा देते हैं। जिसके बदले में लोगों को ज्यादातर नुकसान ही उठाना पड़ता है। ऐसे में शेयर बाजार से मोटा मुनाफा कमाने का एक ही मूल मंत्र है सही समय पर सही और 'सस्ते' शेयर की पहचान करना। लेकिन सवाल ये है कि आखिर ये कैसे पता चलेगा कि कोई शेयर अपनी असली कीमत से सस्ता (Under-valued) मिल रहा है या महंगा? ऐसे में ये समझना बेहद जरूरी है कि कोई भी निवेशक अंडर वैल्यू शेयरों की पहचान कैसे करे।
किसी शेयर की असली कीमत को पहचानने का सबसे मूल नियम ये है कि आप ये देखें कि आज उसका जो बाजार भाव है, वो भविष्य में कंपनी से मिलने वाली कमाई के मुकाबले कहां खड़ा है। इसके लिए आज भी 'डिविडेंड डिस्काउंट मॉडल' (DDM) और 'फ्री कैश फ्लो टू इक्विटी' (FCFE) जैसे तरीकों को सबसे भरोसेमंद माना जाता है।
लेकिन, किसी कंपनी को सिर्फ छोटे समय के फायदों या कुछ नंबरों से नहीं मापा जा सकता। कई बार कोई शेयर पीई (PE) या पीबी (PB) रेशियो के हिसाब से महंगा दिखता है, लेकिन अगर बाजार उसके आगे बढ़ने की क्षमता को नहीं समझ पा रहा है, तो वो शेयर असल में अपनी सही कीमत से बहुत सस्ता हो सकता है।
दूसरी तरफ, जो कंपनियां धीरे-धीरे आगे बढ़ रही हैं, वे भी निवेश का एक बेहतरीन मौका हो सकती हैं। बशर्ते उनकी पक्की कमाई का पूरा फायदा अभी शेयर की कीमत में न दिख रहा हो। कमाई का असली मौका वहीं होता है जहां शेयर की असली कीमत और उसके बाजार भाव में बड़ा अंतर हो। निवेश की दुनिया में इस अंतर को ‘मार्जिन ऑफ सेफ्टी’ (Margin of Safety) कहा जाता है।
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क्या कहता है इतिहास?
ऐसी चीजें पहले भी कई बार हो चुकी हैं। जैसे, 1990 के दशक के आखिरी सालों में आईटी कंपनियों के शेयर बहुत महंगे वैल्यूएशन पर मिल रहे थे, लेकिन उनकी कमाई में जो लगातार बढ़त हुई, उसने लंबी अवधि में निवेशकों को मालामाल कर दिया।
इसी तरह, कोविड महामारी के बाद सरकारी बैंकों (PSU Banks) के शेयर अपनी बुक वैल्यू से भी नीचे कारोबार कर रहे थे, जबकि उनकी बैलेंस शीट (आर्थिक स्थिति) काफी मजबूत थी। बाद में जब उनका मुनाफा और बिजनेस सामान्य हुआ, तो इन शेयरों की कीमत तेजी से बढ़ी और निवेशकों ने तगड़ा मुनाफा कमाया।
बाजार का मूड और धैर्य का खेल
कम समय में शेयर बाजार अक्सर लोगों की भावनाओं, पैसे के बहाव और तुरंत के आर्थिक माहौल से चलता है। ऐसे में कई बार अच्छे मौके बनते हैं, जब किसी कंपनी का शेयर कुछ समय की दिक्कतों के कारण अपने जैसी दूसरी कंपनियों या अपने पुराने रिकॉर्ड के मुकाबले काफी सस्ता हो जाता है।
ऐसे मौकों पर धैर्य रखना बहुत जरूरी है, क्योंकि शेयर का दाम तुरंत बढ़ना शुरू नहीं होता। साथ ही, ये भी समझना जरूरी है कि हर वो शेयर जिसका PE कम है या जो लंबे समय से पिट रहा है, वो निवेश के लिए अच्छा ही हो। आपको ये फर्क समझना होगा कि कंपनी की कमजोरी कुछ समय के लिए है या उसके पूरे बिजनेस मॉडल में ही कोई बड़ी गड़बड़ है।
सस्ते शेयरों को कैसे पहचानें?
शुरुआती तौर पर आप ऐसे शेयरों पर नजर रख सकते हैं जो सिंगल डिजिट, जैसे 9 से कम PE पर मिल रहे हों और जिनका कैश फ्लो (फ्री कैश फ्लो कन्वर्जन) मजबूत हो। कई बार इतने सस्ते दाम का मतलब ये होता है कि बाजार कंपनी के सिर्फ अगले 10-15 साल की कमाई को देख रहा है और भविष्य में होने वाली ग्रोथ को बिल्कुल भूल चुका है।
इसी तरह, 5% या उससे ज्यादा का डिविडेंड यील्ड या 8% से ज्यादा का फ्री कैश फ्लो यील्ड भी सस्ते और अच्छे शेयरों की पहचान करने के बढ़िया तरीके हैं। हालांकि, साइकिल वाले बिजनेस (जैसे स्टील या कमोडिटी, जो कुछ समय बहुत चलते हैं और फिर धीमे हो जाते हैं) में कुछ समय के ऊंचे मुनाफे को हमेशा का मुनाफा मानकर गलती न करें।
तेजी से बढ़ने वाली कंपनियों में मौका
दूसरी तरफ, बहुत तेजी से आगे बढ़ने वाली कंपनियों में कमाई का मौका तब मिलता है जब बाजार उनकी ग्रोथ की रफ्तार या उनके बड़े होने के समय को कम आंकता है। जो निवेशक ऐसी कंपनियों को शुरुआती दिनों में ही पहचान लेते हैं, वे थोड़े महंगे दाम पर भी शेयर खरीदकर लंबी अवधि में असाधारण रिटर्न (Multibagger Return) पाते हैं, क्योंकि लगातार बढ़ती कमाई पर कंपाउंडिंग (चक्रवृद्धि ब्याज) का जादू काम करता है।
एक उदाहरण से समझें:
मान लेते हैं कि कोई कंपनी अपनी पूंजी पर 40% का रिटर्न (ROCE) कमा रही है, उसकी कॉस्ट ऑफ इक्विटी 12% है और आखिरी ग्रोथ दर 5% मानी जाए। अब अगर बाजार यह मानकर चल रहा है कि यह कंपनी अगले 10 साल में सिर्फ 15% की रफ्तार से बढ़ेगी, लेकिन असल में वह कंपनी 25% की रफ्तार से बढ़ जाती है, तो निवेशक का सालाना रिटर्न (IRR) लगभग 19% तक पहुंच सकता है। यह रिटर्न इक्विटी की लागत से कहीं ज्यादा है। ऐसे मामलों में अगर आप 25 के ऊंचे PE पर भी निवेश करते हैं, तो वह लंबे समय में बहुत फायदेमंद साबित होता है। हालांकि, ऐसे शानदार मौके बाजार में बहुत कम मिलते हैं।
जोखिम से बचने का सबसे बेस्ट तरीका
चूंकि भविष्य में क्या होगा, इसका सटीक अंदाजा कोई नहीं लगा सकता, इसलिए निवेश हमेशा संभावनाओं का खेल है। ऐसे में समझदारी इसी में है कि आप किसी एक शेयर में सारा पैसा लगाने के बजाय अलग-अलग सस्ते और अच्छे शेयरों में अपना पैसा बांटकर लगाएं। इससे आपका जोखिम भी कम रहेगा और अगर कोई एक निवेश उम्मीद के मुताबिक काम नहीं भी आया, तो बाकी के शेयर आपके पोर्टफोलियो को संभाल लेंगे।
(लेखक-कार्तिकराज लक्ष्मणन, सीनियर वाइस प्रेसिडेंट- इक्विटी, यूटीआई एएमसी, ये लेखक के अपने विचार हैं, यहां किसी भी तरह के निवेश की सलाह नहीं दी जा रही है।)
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