दिल्ली-नोएडा से फरीदाबाद तक यमुना खादर में 'अवैध' शहर! चौंकाने वाले आंकड़े और बढ़ता बाढ़ का खतरा
दिल्ली सरकार ने यमुना के ओ-जोन में पुराने निर्माणों को न तोड़ने और नए निर्माणों को रोकने की घोषणा की है, जबकि अवैध अतिक्रमणों से बाढ़ का खतरा बढ़ रहा ...और पढ़ें

सांकेतिक तस्वीर एआई जनरेटेड
HighLights
दिल्ली सरकार का ओ-जोन में पुराने निर्माणों को न तोड़ने का फैसला।
यमुना के डूब क्षेत्र में अवैध निर्माणों से बाढ़ का खतरा।
एनजीटी ने वैज्ञानिक सीमांकन और अतिक्रमण हटाने के निर्देश दिए।
डीडीए द्वारा दिल्ली में यमुना के डूब क्षेत्र यानी ओ-जोन में किए गए निर्माण पर बीते दिनों हुई कार्रवाई के बाद अब दिल्ली सरकार ने घोषणा की है कि ओ-जोन में पुराने निर्माण नहीं तोड़े जाएंगे और नए निर्माण नहीं होने दिए जाएंगे।
नियमत: यमुना का डूब क्षेत्र रहने के लिए नहीं है, वहां अस्थायी निर्माण कर खेती इत्यादि तो की जा सकती है, लेकिन स्थायी रूप से निर्माण कर रहा नहीं जा सकता, लेकिन यहां राजनीतिक हितों की आड़ में स्थायी निर्माण होता गया और अब बड़ी संख्या में लोग रह रहे हैं।
दिल्ली ही नहीं, एनसीआर के अन्य शहरों नोएडा, गाजियाबाद, फरीदाबाद का भी यही हाल है। दो वर्ष पूर्व दिल्ली में यमुना में आई बाढ़ के समय भी विशेषज्ञों ने कहा था कि बाढ़ की एक प्रमुख वजह यमुना के डूब क्षेत्र में अवैध निर्माण था।
ऐसे में सवाल उठता है कि दिल्ली में यमुना के ओ-जोन में बने अवैध निर्माण को कार्रवाई से छूट दिया जाना कितना उचित है? क्या दिल्ली में यमुना के ओ-जोन में बने ये अवैध निर्माण भविष्य में दिल्ली में बाढ़ की स्थिति को और विकराल नहीं बनाएंगे, इसी की पड़ताल आज प्रासंगिक है-
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दिल्ली
ओ-जोन का कितना क्षेत्रफल : दिल्ली मास्टर प्लान (2021/2041) के अनुसार लगभग 9,700 हेक्टेयर (97 वर्ग किलोमीटर) है।
कहां : शास्त्री पार्क, उस्मानपुर और खजूरी खास (उत्तर-पूर्वी दिल्ली), गीता कॉलोनी, लक्ष्मी नगर (यमुना पुश्ता क्षेत्र) और मयूर विहार (पूर्वी दिल्ली), जैतपुर, मदनपुर खादर और ओखला (दक्षिण-पूर्वी दिल्ली), संगम विहार (यमुना क्षेत्र) और बुराड़ी/झाड़ौदा (उत्तर/उत्तर-पश्चिम दिल्ली)
डीडीए द्वारा हाल ही में की गई कार्रवाई
मदनपुर खादर एवं जैतपुर : यमुना खादर की जमीन पर अवैध रूप से बनी व्यावसायिक इमारतों, दुकानों और अवैध कॉलोनियोंके पक्के ढांचों को ध्वस्त किया गया।
शास्त्री पार्क एवं खजूरी खास : यमुना किनारे अतिक्रमण कर बनाई गई झुग्गियों, नर्सरियों के नाम पर पक्के निर्माणों और व्यावसायिक कब्जों को हटाया गया।
मयूर विहार एवं अक्षरधाम के समीप का खादर क्षेत्र : खादर में अवैध कृषि बस्तियों, अवैध बाड़ों (डेरी) और पक्के ढांचों पर बुलडोजर चलाकर जमीन मुक्त कराई गई।
ओखला एवं कालिंदी कुंज क्षेत्र : नदी के डूब क्षेत्र में बने अवैध फार्महाउसों और पक्के अतिक्रमणों पर कार्रवाई की गई।
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ओ जोन में निर्माण संबंधी नियम और संवैधानिक संस्था :
मास्टर प्लान के तहत ओ-जोन (रिवर फ्रंट/ग्रीन डेवलपमेंट जोन) एक नो-कंस्ट्रक्शन जोन है। यहां किसी भी प्रकार का पक्का आवासीय, व्यावसायिक या औद्योगिक निर्माण पूरी तरह से प्रतिबंधित है। केवल नदी विकास, जैव विविधता पार्क, वेटलैंड्स और अस्थायी हरित गतिविधियों की अनुमति है।
अदालत में लंबित प्रमुख वाद का संक्षिप्त ब्योरा
मामला : नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) और दिल्ली उच्च न्यायालय में मनोज मिश्रा बनाम यूनियन आफ इंडिया (यमुना जिए अभियान) तथा अन्य संबंधित याचिकाएं।
ब्योरा : इसमें यमुना के ओ-जोन में हुए सभी प्रकार के अवैध निर्माणों को पूरी तरह हटाने, पुनरुद्धार करने और 'डीमार्केशन आफ फ्लडप्लेन' (डूब क्षेत्र के सीमांकन) की निगरानी का मुद्दा लंबित/सक्रिय निगरानी में है।
एनजीटी द्वारा समय-समय पर दिए गए प्रमुख निर्देश
यमुना फ्लडप्लेन का पूर्ण सीमांकन : 1-इन-25 इयर्स फ्लडप्लेन (25 साल में एक बार आने वाली बाढ़ का स्तर) को चिन्हित कर उसे नो-कंस्ट्रक्शन जोन घोषित करने का आदेश।
शून्य सहनशीलता : ओ-जोन में किसी भी नए पक्के निर्माण पर रोक और पहले से बने अवैध ढांचों को तुरंत ध्वस्त करने का निर्देश।
पर्यावरण क्षतिपूर्ति : नदी क्षेत्र को प्रदूषित या अतिक्रमित करने वालों पर भारी जुर्माना लगाने का प्रविधान।
निगरानी समिति : एनजीटी द्वारा गठित उच्चस्तरीय समितियों को समय-समय पर डीडीए, एमसीडी और दिल्ली पुलिस को खादर जमीन खाली कराने और पुनरुद्धार की रिपोर्ट सौंपने के निर्देश दिए गए हैं।
फरीदाबाद
- डूब क्षेत्र : 15 किमी
- कितना निर्माण : 5 हजार
- आबादी : 15 हजार
गाजियाबाद
- डूब क्षेत्र : 28 किमी
- कितना निर्माण : 250 कालोनियां, 20 हजार मकान
- आबादी : 2.5 लाख
गौतमबुद्ध नगर
- डूब क्षेत्र : 30 किमी
- कितना निर्माण : 3.70 लाख मकान
- आबादी : 2.80 लाख
कांग्रेस के शासनकाल में गलत तरीके से गांव-कॉलोनी ओ -जोन में शामिल किए
रामवीर सिंह बिधूड़ी, सांसद, दक्षिण दिल्ली ने जागरण से विस्तार से बात की, उनके अनुसार, कांग्रेस के शासनकाल में 2010 में दिल्ली की 92 कॉलोनियोंव एक दर्जन प्राचीन गांवों को गलत तरीके से ओ-जोन में शामिल किया गया। पहले ये कलोनियां ओ-जोन में नहीं बल्कि एफ-जोन में थीं और 2008 में नियमित भी कर दिया गया था।
सितंबर 2013 में इन कॉलोनियोंको ओ-जोन से हटाने के लिए डीडीए ने ड्राफ्ट नोटिफिकेशन भी जारी कर दिया था लेकिन उसके बाद से यह सारा मामला अटका हुआ है। इससे यहां रहने वाले लगभग 15 लाख लोगों में डर, भ्रम और बेचैनी है।
इस समय जिन गांवों और कॉलोनियोंको ओ-जोन में बताया जा रहा है, उन्हें 24 मार्च, 2008 में ही नियमित कर दिया गया था। तब ये सभी कालोनियां ओ-जोन में नहीं थीं।
परंतु, आठ मार्च 2010 को कांग्रेस सरकार ने उन्हें ओ-जोन में शामिल कर दिया जिसके बाद विवाद शुरू हुआ। लोगों के विरोध के बाद सितंबर, 2013 में उस निर्णय को वापस लेने के साथ ही नोटिफिकेशन का ड्राफ्ट भी जारी कर दिया गया था।
उसी दौरान एक एनजीओ की याचिका पर एनजीटी ने उस समय चल रही प्रक्रिया पर रोक लगा दी थी। बाद में एनजीटी के निर्देश पर बाढ़ क्षेत्र का सीमांकन किया गया। उसके बाद डीडीए ने भी इन कॉलोनियोंव गांवों को ओ-जोन से बाहर माना।
इन गांवों की आबादी वाली भूमि को आवासीय श्रेणी में ही रखा गया। इसके बावजूद सितंबर, 2013 के नोटिफिकेशन को लागू नहीं किया गया। इस कारण कई इलाकों में तोड़फोड़ की कार्रवाई की शिकायतें सामने आती रही हैं।
यहां के लोगों को पीएम उदय योजना के अंतर्गत नियमित कॉलोनियोंमें शामिल नहीं किया गया जिससे न तो नागरिक सुविधाओं लाभ मिल रहा है और न ही मालिकाना अधिकार मिल रहे हैं।
यह कितना हास्यस्पद है कि इन गांवों व कॉलोनियोंको तो ओ-जोन में डाला ही गया, दिल्ली सचिवालय, अक्षरधाम मंदिर, डीडीए द्वारा स्वयं बसाई गई मदनपुर खादर पुनर्वास कॉलोनी, डीडीए की जसोला कॉलोनी, कामनवेल्थ खेल गांव और अनेक प्राचीन गांव भी इसी ओ-जोन श्रेणी में हैं।
परंतु, कार्रवाई सिर्फ गांवों व कॉलोनियोंमें रहने वालों पर हो रही है। दिल्ली पुलिस की रिपोर्ट के मुताबिक संबंधित गांव व कालोनियां यमुना नदी से काफी दूर लगभग तीन से चार किमी दूर स्थित हैं।
केंद्र सरकार की विशेषज्ञ समिति भी यह निष्कर्ष दे चुकी है कि इनसे न तो यमुना के बहाव पर असर पड़ता है और न ही नदी के पानी की गुणवत्ता प्रभावित होती है।
भाजपा सांसदों ने केंद्रीय आवासन एवं शहरी कार्य मंत्री मनोहर लाल, दिल्ली के उपराज्यपाल, मुख्यमंत्री और डीडीए के उपाध्यक्ष के सामने सभी तथ्यों को रखकर 2013 में जारी नोटिफिकेशन को लागू करके इन गांवों और कॉलोनियोंको ओ-जोन से बाहर करने की मांग की है।
इन कॉलोनियों को फिर से एफ-जोन में लाने की आवश्यकता है। इससे यहां के लोगों को पीएम उदय योजना के अंतर्गत अपने घर का मालिकाना हक मिलेगा। लोगों को नागरिक सुविधाएं मिलेंगी।
इन कॉलोनियों का लेआउट प्लान भी ओ-जोन से हटाने पर ही बन सकेगा और लोग नक्शा पास करवाकर मकान भी बनवा सकेंगे। ऐसा होने पर करीब 15 लाख लोगों को बड़ी राहत मिलेगी और वर्षों से चला आ रहा विवाद समाप्त हो सकेगा। इस दिशा में सरकार व डीडीए को आवश्यक कदम उठाना चाहिए।
ओ-जोन के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए वैज्ञानिक सीमांकन आवश्यक
बीएस रावत, साउथ एशिया नेटवर्क आन डैम्स, रिवर्स एंड पीपुल के सह संयोजक ने दैनिक जागरण से लंबी बात की जिसके अनुसार, इसमें कोई संदेह नहीं है कि दिल्ली में यमुना के बाढ़ क्षेत्र (खादर) में बढ़ते अतिक्रमण ने प्राकृतिक बाढ़ को आपदा में बदलने का खतरा पैदा कर दिया है। खादर क्षेत्र का सीमांगन नहीं होने के कारण ओ-ज़ोन (रिवर जोन) का सही तरह से क्रियान्वयन नहीं हो रहा है।
यह समझना जरूरी है कि खादर क्षेत्र में किस प्रकार के अतिक्रमण हुए हैं और इसकी सुरक्षा के लिए कौन-सा कानूनी एवं संस्थागत ढांचा उपलब्ध है। दिल्ली में यमुना का मात्र 22 किलोमीटर लंबे हिस्से में 25 पुल और तीन बैराज बने हुए हैं।
इतनी अधिक संरचनाएं नदी के लगभग 300 किलोमीटर लंबे ऊपरी और निचले हिस्से में भी नहीं मिलतीं हैं। इसके अलावा कामनवेल्थ गेम्स विलेज, अक्षरधाम मंदिर, मेट्रो डिपो और अन्य सरकारी परियोजनाओं ने बाढ़ क्षेत्र के बड़े हिस्से पर कब्जा कर लिया है।
वर्षों से झुग्गी बस्तियों और नदी किनारे रहने वाले किसानों के अस्थायी ढांचों को अतिक्रमण बताकर हटाया जाता रहा है। वहीं दूसरी ओर, बड़े स्थायी निर्माणों को उसी खादर में अनुमति मिलती रही।
वास्तविक समस्या केवल अतिक्रमण नहीं अनियोजित विकास, कमजोर शासन व्यवस्था तथा मौजूदा नियोजन प्रावधानों और न्यायिक आदेशों का चुनिंदा एवं कमजोर पालन है। यही कारण हैं जिनसे यमुना खादर लगातार सिकुड़ता, खंडित और शहरीकरण का शिकार होता जा रहा है।
खादर संरक्षण में तीन कानूनी और संस्थागत कमियां
- भारत में आज भी ऐसा कोई समर्पित वैधानिक कानून नहीं है जो नदी तल और फ्लडप्लेन की वैज्ञानिक पहचान, सीमांकन और संरक्षण सुनिश्चित करे। इस कमी को दूर करने के लिए पर्यावरण मंत्रालय ने वर्ष 2011 में रिवर रेगुलेशन ज़ोन का प्रस्ताव रखा था। इसका उद्देश्य वैज्ञानिक मानचित्रण और भूमि उपयोग नियंत्रण के माध्यम से नदी गलियारों की रक्षा करना था। लेकिन वर्षों बीत जाने के बाद भी यह अधिसूचित नहीं हो सका।
- दिल्ली मास्टर प्लान ने वर्ष 2001 में यमुना और उसके खादर को ओ-ज़ोन घोषित कर वैधानिक सुरक्षा प्रदान की। लेकिन खादर के वैज्ञानिक मानचित्रण, भौतिक सीमांकन और ज़ोन-ओ के प्रविधानों का ईमानदारी से क्रियान्वयन न होने के कारण इसका प्रभाव काफी कमजोर रहा है। दूसरी ओर, विभिन्न सरकारों ने खादर में स्थित अनधिकृत कॉलोनियोंको नियमित करने के प्रयास भी किए, जिससे ओ-जोन की मूल भावना लगातार कमजोर होती गई।
- दिल्ली में ऐसा कोई स्वतंत्र संस्थान नहीं है जो केवल यमुना खादर के प्रबंधन और संरक्षण के लिए उत्तरदायी हो। डीडीए, दिल्ली सरकार, राजस्व विभाग, सिंचाई एवं बाढ़ नियंत्रण विभाग और नगर निकाय सभी इस क्षेत्र में अधिकार रखते हैं। लेकिन जिम्मेदारी बंटी हुई है और जवाबदेही किसी एक संस्था की नहीं है।
विडंबना यह है कि स्वयं डीडीए ने खादर में रिवरफ्रंट परियोजनाओं, सुंदरीकरण पार्कों, निर्माण सुविधाओं, कास्टिंग यार्डों और अन्य अवसंरचना परियोजनाओं को अनुमति दी या बढ़ावा दिया।
सरकारी परियोजनाओं को अक्सर उन्हीं नियोजन प्रविधानों से छूट मिलती रही, जिनका उद्देश्य खादर की रक्षा करना था। यही कारण है कि ओ-जोन कागज़ों में अधिक प्रभावी दिखाई देता है, लेकिन जमीन पर उसका प्रभाव बहुत सीमित है।
न्यायिक हस्तक्षेप, लेकिन अधूरा क्रियान्वयन
जनवरी 2015 के ऐतिहासिक 'मैली से निर्मल यमुना' निर्णय में, मनोज मिश्रा और यमुना जिए अभियान के निरंतर प्रयासों के बाद, एनजीटी ने सभी एजेंसियों को खादर की रक्षा करने और नदी की बाढ़ वहन क्षमता कम करने वाली गतिविधियों पर रोक लगाने का निर्देश दिया।
जुलाई 2023 की बाढ़ के बाद एनजीटी ने दिल्ली सरकार को यमुना के 100 वर्षीय बाढ़ क्षेत्र का वैज्ञानिक मानचित्रण करने और उसका भौतिक सीमांकन करने का निर्देश दिया। उसने यह भी स्पष्ट किया कि तटबंधों को प्राकृतिक खादर की सीमा नहीं माना जा सकता।
सरकारी एजेंसियों के बीच समन्वय की कमी के कारण भौतिक सीमांकन अभी तक पूरा नहीं हो पाया है। जब तक वैज्ञानिक सीमांकन पूरा नहीं होगा, तब तक ओ-जोन का प्रभावी क्रियान्वयन और खादर का दीर्घकालिक संरक्षण संभव नहीं होगा।
दिल्ली को वैज्ञानिक मानचित्रण, भौतिक सीमांकन और एक स्वतंत्र खादर प्रबंधन संस्था पर आधारित कानूनी रूप से प्रभावी संरक्षण व्यवस्था की तत्काल आवश्यकता है। ओ-जोन को केवल कागज़ों में नहीं, बल्कि वास्तविक रूप से लागू किया जाना चाहिए।
यमुना खादर का संरक्षण केवल पर्यावरण का मुद्दा नहीं, बल्कि दिल्ली की बाढ़ सुरक्षा, जल सुरक्षा और जलवायु परिवर्तन के प्रति अनुकूलन की अनिवार्य शर्त है। आज खादर का जो भी हिस्सा नष्ट होगा, उसकी कीमत भविष्य में दिल्ली को कहीं अधिक सामाजिक, आर्थिक और पारिस्थितिक नुकसान के रूप में चुकानी पड़ेगी