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    अतिक्रमण और सरकारी लापरवाही का शिकार एनसीआर के लुप्त होते जलाशय, लापता तालाबों पर सन्नाटा क्यों?

    Updated: Fri, 22 May 2026 07:02 PM (IST)

    दिल्ली-एनसीआर में अतिक्रमण और सरकारी लापरवाही के कारण प्राकृतिक जलाशय तेजी से लुप्त हो रहे हैं। कई विभाग अभी भी उदासीन हैं और तालमेल की कमी बड़ी बाधा ...और पढ़ें

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    दिल्ली के साथ ही एनसीआर के अन्य जिलों में भी बड़ी संख्या में प्राकृतिक जलाशय विगत कुछ वर्षों में अतिक्रमण की भेंट चढ़ चुके हैं। एआई इमेज

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    समय कम है?

    जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में

    संक्षेप में पढ़ें

    मनु त्यागी, नई दिल्ली। दिल्ली में डीडीए ने जल संचय अभियान की शुरुआत की हैजिसके तहत 101 पारंपरिक जल निकायों का जीर्णोद्धारकायाकल्प और संरक्षण किया जाएगा। अगले माह के अंत तक दिल्ली समेत एनसीआर क्षेत्र में मानसून आ जाएगा। ऐसे में इस अभियान की अभी से शुरुआत किया जाना जल संरक्षण सरोकार की दृष्टि से बहुत जरूरी कदम है। लेकिन, यह बड़ी चिंता की बात है कि दिल्ली के साथ ही एनसीआर के अन्य जिलों में भी बड़ी संख्या में प्राकृतिक जलाशय विगत कुछ वर्षों में अतिक्रमण की भेंट चढ़ चुके हैं।

    अवैध कब्जों ने बढ़ाई दिक्कत

    कहीं इमारतें बना दी गई हैं या उनपर कब्जा कर झुग्गियां बसा दी गई हैं। उनकी खोज खबर सुध लेने वाला कोई नहीं है। जलाशय न सिर्फ वर्षा जल संचयन के लिए महत्वपूर्ण हैं,बल्कि इनसे भूजल स्तर में भी उल्लेखनीय वृद्धि होती है,जो पानी की कमी से जूझ रहे इस क्षेत्र के लिए अत्यंत आवश्यक हैं। ऐसे में सवाल यही है कि पूरे एनसीआर क्षेत्र में लापता हो चुके जलाशयों को खोजने और उन्हें अतिक्रमणमुक्त करने के प्रयास क्यों नहीं किए जाते?

    विभागों की योजनाएं नहीं हो रहीं सफल

    बीते सात साल में अमृत सरोवर जैसी योजनाएं भी चलींलेकिन विभागों की अन्यमनस्कता में सिरे नहीं चढ़ सकी। कुछ ही तालाब इसके जरिए पुनर्जीवित हो सके। आखिर इसके लिए कौन जिम्मेदार हैं,उनकी जवाबदेही क्यों नहीं तय होतीसाथ ही अतिक्रमण का शिकार जलाशयों को अतिक्रमणमुक्त कर उन्हें पुनः एक जलाशय के स्वरूप में लाने के लिए क्या किए जाने चाहिए ठोस उपायइसी की पड़ताल हमारा आज का मुद्दा है...

    संबंधित विभाग और कर्मचारियों में इच्छाशक्ति का अभाव

    गर्मी के दिन आते हैं, जलाशयों की चिंता होती है और फिर फाइलों में तालाबों के उद्धार की योजना कैद हो जाती है। यही कारण है कि कितने बरसों से न तालाबों की संख्या नहीं बढ़ रही है। योजनाएं अच्छी बनी हैं लेकिन उनका कोई क्रियान्वयन नहीं है और न ही संबंधित विभाग और कर्मचारियों में इच्छाशक्ति। अब भी जितना काम तालाबों के उद्धार के नाम पर हुआ भी है वो केवल कंक्रीट के पाथवे और पार्क बनाने तक सीमित है, जबकि पर्यावरणविदों के अनुसार असली जरूरत उनके पारिस्थितिक तंत्र को जीवित करने की है। कुल मिलाकर जलाशयों का वादों की डुबकी में ही उद्धार हो रहा है...

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    क्या कहते हैं तालाबों के आंकड़े?

    • ढाई दशक पुराने जलाशय : 1,000 से अधिक छोटे-बड़े जलाशय (तालाब, झीलें, बावड़ियां) चिह्नित किए गए थे, दिल्ली जल बोर्ड और नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) की रिपोर्टों में।
    • लापता जलाशय : 300 से अधिक जलाशय वर्तमान में "लापता" या "अतिक्रमित" की श्रेणी में
    • कई तालाबों का वजूद सिर्फ पुराने राजस्व रिकाॅर्ड (जैसे 25-30 साल पुराने खसरा-खतौनी) में बचा है, जमीन पर वहां पक्की कालोनियां या पार्क बन चुके हैं।
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    गायब होने के मुख्य कारण

    • अवैध काॅलोनियों का निर्माण: दिल्ली की सैकड़ों अनधिकृत कालोनियों का निर्माण पुराने ग्राम सभा के तालाबों को पाटकर किया गया।
    • क्रीटाइजेशन और कबाड़ डंपिंग: काॅलोनियों का सीवेज और मलबे को सीधे स्थानीय तालाबों में डाला गया, जिससे वे धीरे-धीरे समतल मैदान बन गए।
    • कैचमेंट एरिया का विनाश: अरावली पहाड़ी क्षेत्रों (जैसे महरौली या छतरपुर) और ग्रामीण इलाकों में प्राकृतिक नालों को पक्का कर दिया गया या रोक दिया गया, जिससे तालाबों तक वर्षा का पानी पहुंचना बंद हो गया।
    • भूजल का अत्यधिक दोहन: आसपास के क्षेत्रों में अत्यधिक बोरवेल होने के कारण भूजल का स्तर नीचे चला गया, जिससे जलाशय स्वाभाविक रूप से सूख गए।
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    एजेंसियों के कदम, विफलता के कारण और वर्तमान स्टेटस

    • एजेंसियों ने क्या किया: एनजीटी के कड़े रुख के बाद दिल्ली सरकार ने वन एवं वन्यजीव विभाग और 'दिल्ली जल बोर्ड' को नोडल एजेंसी बनाकर 'स्टेट वेटलैंड अथारिटी' का गठन किया। दिल्ली के सभी जलाशयों को एक यूनीक आइडी दी जा रही है।
    • क्यों नहीं सफलता मिली: दिल्ली में मल्टी-एजेंसी ओवरलैप सबसे बड़ी बाधा। एक ही तालाब की जमीन डीडीए की है, देखरेख एमसीडी की है और पानी जल बोर्ड को देखना है। इस आपसी तालमेल की कमी और कोर्ट-कचहरी के मुकदमों के कारण कई सालों तक ठोस कार्रवाई नहीं हो सकी।
    • वर्तमान स्टेटस: अब दिल्ली जल बोर्ड 'सिटी आफ लेक्स' प्रोजेक्ट के तहत गायब हुए जलाशयों को एसटीपी शोधित पानी से दोबारा भरने का काम युद्धस्तर पर कर रहा है।
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    पुनर्जीवित होने से कितना होगा लाभ

    • गर्मियों में पानी की किल्लत का समाधान: दिल्ली हर साल पानी के लिए पड़ोसी राज्यों (हरियाणा/यूपी) पर निर्भर रहती है। इन जलाशयों से हर साल करोड़ों लीटर पानी जमीन में रीचार्ज होगा, जिससे दिल्ली का गिरता भूजल स्तर सुधरेगा।
    • 'हीट वेव' और तापमान में कमी: गर्मियों के दौरान बनने वाले 'अर्बन हीट आइलैंड' का असर कम होगा। जलाशयों के आसपास का तापमान 2 से 3 डिग्री तक कम हो सकता है।
    • बाढ़/जलभराव से मुक्ति: मानसून के दौरान मिंटो ब्रिज या धौला कुआं जैसे इलाकों में होने वाले जलभराव की समस्या खत्म होगी, क्योंकि वर्षा का अतिरिक्त पानी इन जलाशयों में चला जाएगा।
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    अतिक्रमणमुक्ति

    • 150 से अधिक जलाशयों को आंशिक या पूर्ण रूप से एनजीटी की 'जलाशय संरक्षण समिति' की निगरानी में दिल्ली जल बोर्ड और राजस्व विभाग ने अतिक्रमणमुक्त कराया।

    दोषियों पर कार्रवाई

    • डीडीए और एमसीडी द्वारा अवैध रूप से बनी इमारतों पर बुलडोजर चलाकर ध्वस्तीकरण किया गया।
    • एनजीटी के आदेश पर कई भू-माफिया और बिल्डरों पर भारी पर्यावरण मुआवजा यानी जुर्माना लगाया गया।

    नियम और प्रविधान

    • वेटलैंड्स (संरक्षण और प्रबंधन) नियम, 2017: इसके तहत जलाशयों के भीतर या उनके कैचमेंट एरिया में किसी भी तरह का निर्माण, ठोस कचरा फेंकना या रासायनिक सीवेज बहाना पूरी तरह प्रतिबंधित और दंडनीय अपराध है।
    • एनजीटी के कड़े निर्देश (ओए नंबर 325/2015): नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने दिल्ली सरकार को स्पष्ट आदेश दे रखा है कि दिल्ली के हर एक चिह्नित जलाशय की जियो-टैगिंग की जाए और उनके चारों तरफ बफर जोन (नो-कंस्ट्रक्शन जोन) बनाया जाए।

    जलस्रोतों के संरक्षण के लिए सरकारी और निजी भागीदारी अनिवार्य

    दिवान सिंह,  जल प्रहरी एवं संयोजक- यमुना सत्याग्रह, रिज बचाओ आंदोलन

    जलस्रोतों के संरक्षण और कायाकल्प के लिए सरकारी और निजी दोनों स्तर पर भागीदारी आवश्यक है। विभिन्न सरकारी एजेंसियों और राज्य के सिंचाई या जल संसाधन विभाग के समन्वय से एक विशेष कार्यबल का गठन किया जाना भी प्रभावी कदम हो सकता है। राष्ट्रीय राजधानी में करीब 1000 से अधिक तालाब थे। इनकी महत्ता के बारे में भी शायद ही किसी को संदेह हो।

    भूजल संवर्धन के अलावा भूजल की गुणवत्ता को बनाए रखने में भी इनका बहुत योगदान है। तालाब के माध्यम से ही वर्षा का पानी एकत्रित होता है। यह शुद्ध जल फिर धरती में छन छन कर जाता है। यूं समझिए कि कुदरत की धुरी ये तालाब ही थे। तालाब खत्म तो कुदरत खत्म। नतीजा- भूजल का स्तर गिर गया है। सबसे चिंताजनक यह है कि अब इन तालाबों की देख-रेख नहीं होने से कई जगह इनमें गंदा पानी जा रहा है जिससे भूजल विषैला होता जा रहा है।

    अब प्रश्न आता है कि जहां कुछ दशकों पहले तक तालाब बहुत अच्छी हालत में रहे हैं, तो अब क्यों इनकी स्थिति इतनी दयनीय हो चुकी है। इसका कारण यह है कि पहले समुदाय को इन तालाबों की जरूरत थी और उन्हीं के पास इनके रखरखाव की जिम्मेदारी भी होती थी। मगर आज घर-घर नल के माध्यम से पानी पहुंच गया है। लोगों को तालाब से सीधा कोई सरोकार नहीं बचा है।

    अगर समुदाय के लोग खुद से मिलकर इन तालाबों को पुनर्जीवित करने की कोशिश करें भी तो प्रशासन ऐसा होने नहीं देता है। सबसे सटीक उदाहरण है द्वारका में समुदाय द्वारा की गई कोशिश और उसके नतीजे का। 13 साल से द्वारका वासी करीब 33 तालाबों को पुनर्जीवित करने की कोशिश में लगे हुए थे। लेकिन प्रशासन द्वारा उनके प्रयास को हमेशा धक्का ही लगा। आखिर में सेक्टर 22,23 के निवासी अपना एक तालाब किसी तरह आधे अधूरे स्तर तक पुनर्जीवित करने में सफल हो पाए।

    सरकार में इच्छाशक्ति हो तो सब संभव है। तालाबों को पुनर्जीवित करना कोई राकेट साइंस नहीं है, न ही कोई महंगा काम है। समाज को भी हम जिम्मेदार नहीं ठहरा सकते क्योंकि सरकार ने एक तरफ तो समाज का संगठन निरर्थक कर दिया है, दूसरी तरफ पूरी जिम्मेदारी और शक्तियां अपने पास रख ली हैं।

    इन सबके के मद्देनजर यही कहा जा सकता है कि इंतज़ार है तो बस सरकार के जागने का। अतिक्रमण की चपेट में आए जलाशयों को उनके मूल स्वरूप में वापस लाने के लिए अतिक्रमण हटाने, जल-संरचना के जीर्णोद्धार और सख्त निगरानी जैसे ठोस बहुस्तरीय उपायों को लागू करना आवश्यक है।

    आधुनिक तकनीक (जैसे ड्रोन और जीआइएस मैपिंग) का उपयोग करके जलाशयों की मूल सीमा का सटीक सीमांकन किया जाए। प्रशासन द्वारा चिह्नित किए गए अतिक्रमणों (अवैध निर्माणों, झुग्गियों या कृषि गतिविधियों) को बलपूर्वक और बिना किसी देरी के हटाया जाए। अवैध कब्जा करने वालों पर भारी जुर्माना लगाया जाए और हटाने का खर्च भी उन्हीं से वसूला जाए।

    राजस्व विभाग के दस्तावेजों (खसरा-खतौनी) में जलाशय को स्पष्ट रूप से 'जल-निकाय' के रूप में दर्ज किया जाए। जलाशय के चारों ओर एक निश्चित हरित पट्टी विकसित की जाए, ताकि भविष्य में कोई निर्माण कार्य न हो सके। जलस्रोतों को नुकसान पहुंचाने या कब्जा करने वालों के खिलाफ सख्त दंडात्मक कानूनों का प्रविधान किया जाए।

    अतिक्रमण हटने के बाद, जलाशय की तली से गाद और कचरा निकालकर उसकी जल-धारण क्षमता को बढ़ाया जाए। ठोस कचरा प्रबंधन जलकुंभी और प्लास्टिक कचरे को नियमित रूप से साफ किया जाए, ताकि पानी का प्राकृतिक प्रवाह बहाल हो सके। जलाशय को भरने के लिए वर्षा जल संचयन और नजदीकी बरसाती नालों या नहरों से जोड़ने की व्यवस्था की जाए।

    कटाव रोकने के लिए किनारों पर मजबूत पत्थर की पिचिंग की जाए और स्थानीय प्रजातियों के पौधे लगाए जाएं ताकि जमीन फिर से कब्जा नहीं हो। जलस्रोतों की सुरक्षा के लिए स्थानीय नागरिकों, पर्यावरणविद्दों और निवासियों की कमेटियां बनाई जाएं। अतिक्रमण दोबारा न हो, इसके लिए सीसीटीवी लगाए जाएं और गश्त बढ़ाई जाए।

    (जैसा बातचीत में संजीव गुप्ता को बताया)

    जिला  जल निकाय उपलब्ध

    पूर्वी  

    50  6
    उत्तर-पूर्वी   47  11
    शहादरा  37  7
    उत्तरी  249  135
    उत्तर-पश्चिमी  130  97
    दक्षिण  190  78
    दक्षिण-पूर्वी  67  23
    दक्षिण-पश्चिमी  330  216
    पश्चिम  86  42
    नई दिल्ली  61  17
    मध्य  44  21
    कुल  1247 653

    एनसीआर में जलाशय लापता होने के कारण

    • अनियंत्रित शहरीकरण और बिल्डर परियोजनाएं
    • अवैध कॉलोनियों और व्यावसायिक निर्माण
    • भू-माफिया द्वारा कब्जे
    • सीवरेज, मलबा और कचरा डालकर भराव
    • प्राकृतिक नालों और ड्रेनेज सिस्टम पर अतिक्रमण
    • सरकारी एजेंसियों की निगरानी में कमी
    • राजस्व रिकॉर्ड का डिजिटलीकरण न होना
    • पंचायत और विभागों के बीच समन्वय की कमी
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    सैटेलाइट मैपिंग कर डिजिटल सीमांकन कराना जरूरी

    एनके कटारा, पूर्व चीफ इंजीनियर नगर निगम

    दिल्ली और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र लंबे समय से एक अजीब परिस्थिति से गुजर रहा है। वर्षा के दौरान सभी शहरों की सड़कें पानी से लबालब होती हैं। वहीं गर्मी का मौसम आते ही हम पानी के लिए तरसने लगते हैं। इसका सबसे बड़ा कारण प्रकृति के साथ संतुलन नहीं बना पाना है। हमने अपने प्राकृतिक जलाशयों (तालाब, झीलें, और जोहड़) को सहेजने का काम कभी भी जिम्मेदारी के साथ नहीं किया।

    राजस्व रिकाॅर्ड में दर्ज सैकड़ों जलाशय अब केवल कागजों तक सिमटकर रह गए। हैरानी की बात यह रही कि इन पर कब्जा करने वाले गैरजिम्मेदारों तक की जानकारी नहीं जुटाई, कार्रवाई तो दूर की बात है। अब सवाल उठता है कि इन जलाशयों को खोजने और इन्हें अतिक्रमणमुक्त करने के ठोस प्रयास क्यों नहीं हुए।

    जलाशयों के पुनरुद्धार के लिए विभागों के समन्वय की आवश्यकता होती है। ऐसे समय में विभागीय अधिकारी एक दूसरे के साथ तालमेल नहीं करते हैं। कई बार ऐसी स्थिति सामने आई है, जिस तलाब पर कब्जा किया हुआ है वह किसी और विभाग की जमीन है। लेकिन इस कब्जे को खाली कराने की शक्ति दूसरे विभाग के पास है। इस दौरान दोनों विभागों के बीच किसी भी तरह का तालमेल नहीं हो पाता है।

    एनसीआर में जमीन की कीमत में लगातार बढ़ोतरी हो रही है। ऐसे में भूमाफिया की नजर जलाशय की जमीन पर रहती है। जलाशय की जमीन को धीरे-धीरे कब्जे में लिया जाता है। इन प्राकृतिक जलाशयों को बचाने के लिए प्रशासन को सबसे पहले सभी जोहड़ की निशानदेही करनी होगी। इसके साथ ही जलाशय की जमीन पर कब्जा करने वालों के खिलाफ कठोर कार्रवाई करके उदाहरण पेश करने होंगे।

    इसके साथ ही जिस क्षेत्र में जलाशय आ रहा है। वहां के निगम और प्रशासन अधिकारी की भी जिम्मेदारी तय करनी होगी। सरकार की ओर से ही जलाशय के लिए नोडल एजेंसी बनानी होगी। जो जलाशयों को अतिक्रमण मुक्त रखने के लिए सभी विभागों के साथ तालमेल करे। 1970 या उससे पहले के राजस्व रिकाॅर्ड के आधार पर सभी जलाशयों की सैटेलाइट मैपिंग की जाए और उनका डिजिटल सीमांकन हो।

    एक बार सीमांकन होने के बाद किसी भी भूमाफिया के लिए तालाब की जमीन पर कब्जा करना आसान काम नहीं होगा। अतिक्रमण करने वालों और इसमें मदद करने वाले अधिकारियों पर भारी जुर्माना और जेल की सजा का प्रविधान होना चाहिए। जलाशयों का गायब होने से भूजल संकट गहराने के साथ पर्यावरण संकट भी होगा। इसके लिए सरकार को ठोस कार्रवाई करने की जरूरत है। 

    (जैसा बातचीत में प्रवीण कौशिक को बताया)

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    गुरुग्राम

    • 25 साल पहले जलाशय : 210
    • लापता जलाशय : 136
    • 18 तालाबों को कब्जा मुक्त करवाया गया।

    तालाबों का सर्वे किया गया

    • नगर निगम और हरसैक द्वारा जियोटैगिंग सर्वे कराया गया
    • जीआईएस मैपिंग और सैटेलाइट इमेज के जरिए जलाशयों की पहचान की गई।
    • तालाबों का रिकॉर्ड तैयार किया गया।
    • जिला प्रशासन द्वारा अतिक्रमण हटाने के अभियान चलाए गए।
    • डी-सिल्टिंग और बाउंड्री वाल बनाई गईं

    फरीदाबाद

    • ढाई दशक पहले जलाशय : 120
    • लापता जलाशय : 30
    • 82 तालाबों को पुनर्जीवित किया गया,इसमें निगम की ओर से अमृत सरोवर योजना के तहत 77 संवारे गए।
    • 5 लोगों पर अलग-अलग मामलों में अवैध रूप तालाबों पर कब्जा करने का मामला दर्ज कराया गया था।

    गाजियाबाद

    • ढाई दशक पहले : 1,100
    • लापता जलाश : 398
    • 139 जलाशयों का पता लगाया गया, 50 से अधिक पुनर्जीवित किए गए।
    • 2 एफआईआर भी कराई गई है, इनमें चार से अधिक लोगों पर पुलिस कार्रवाई की गई है।

    गौतमबुद्धनगर

    • ढाई दशक पहले : 1,200
    • लापता जलाश : 398
    • 75 तालाबों का चयन कर उनमें से 24 को पुर्नजीवित करने का काम चल रहा है।
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    क्या दिल्ली समेत एनसीआर में प्राकृतिक जलाशयों के लापता होने के लिए संबंधित उच्चाधिकारियों की जवाबदेही तय की जानी चाहिए?

    • हां : 97
    • नहीं : 3

    क्या दिल्ली समेत एनसीआर में लापता हो चुके प्राकृतिक जलाशयों का पता लगाकर पुनर्जीवित करने के प्रति संबंधित विभाग उदासीन हैं?

    • हां : 99
    • नहीं : 1