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    दिल्ली एनसीआर में अवैध निर्माण: हादसों की जड़ और स्थायी समाधान की चुनौती

    Updated: Thu, 11 Jun 2026 05:50 PM (IST)

    दिल्ली-एनसीआर में अवैध निर्माण गंभीर हादसों का कारण बन रहा है, जिसमें राजनीतिक संरक्षण और प्रशासनिक उदासीनता मुख्य बाधाएं हैं। ...और पढ़ें

    तस्वीर एआई जनरेटेड।

    तस्वीर एआई जनरेटेड।

    HighLights

    1. अवैध निर्माण हादसों का कारण, राजनीतिक संरक्षण और भ्रष्टाचार मुख्य जड़।

    2. प्रशासनिक उदासीनता, जवाबदेही की कमी समस्या को बढ़ाती है।

    3. कठोर कानून, शुरुआती कार्रवाई और राजनीतिक इच्छाशक्ति ही समाधान।

    अभी देश की राजधानी दिल्ली को देखेंगे तो लगेगा कि अब सब ठीक हो जाएगा। अतिक्रमण, अवैध निर्माण पर जिस तत्परता के साथ नगर निगम व अन्य एजेंसी बुलडोजर चला रही हैं...ऐसा भान होता है, अब दिल्ली में फिर कोई हादसा नहीं होगा। लेकिन सब इस हकीकत से भी वाकिफ हैं कि ये महज फौरी राहत है।

    अभी कुछ दिन बाद फिर वही हालात होंगे। दिल्ली में बीते दिनों हौजरानी क्षेत्र में एक अवैध होटल में आग लगने की घटना में 22 लोग की मौत हुई थी, पता यह चला कि बेड एंड ब्रेकफास्ट यानी बीएंडबी के नियमों के तहत इसके संचालक ने लाइसेंस लिया था, जिसमें छह कमरे बनाने की अनुमति थी, लेकिन उसने नियमों को दरकिनार कर अवैध रूप से 25 कमरे बनाए।

    इससे पहले सैदुलाजाब में एक अवैध इमारत गिर गई थी, इमारत पर और फ्लोर बढ़ाने के लिए निर्माण कार्य चल रहा था। इसमें भी छह लोग की मौत हुई थी। कमोबेश यही हाल एनसीअर का है।

    यहां सवाल ये उठता है कि दिल्ली समेत एनसीआर में अवैध निर्माण को रोकने के लिए जिम्मेदार एमसीडी या अन्य स्थानीय निकाय अपना दायित्व ठीक ढंग से क्यों नहीं निभाते? सरकार, प्रशासन, पुलिस सब बाद में ही क्यों जागते हैं? राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में अवैध निर्माण के कारण होने वाले हादसों पर कैसे लगे रोक और अवैध निर्माण पर प्रभावी कार्रवाई करने के लिए क्या किए जाने चाहिए ठोस उपाय। इसी की पड़ताल हमारा आज का मुद्दा है...

    क्या आप मानते हैं कि दिल्ली समेत एनसीआर में अवैध निर्माण रोकने में स्थानीय निकायों का भ्रष्टाचार सबसे बड़ी बाधा है?

    • हां : 97
    • नहीं : 3

    क्या अवैध निर्माण पर सख्त कार्रवाई से इमारतें ढहने या आग लगने से मौत की घटनाओं पर प्रभावी रोक लग सकती है?

    • हां : 92
    • नहीं : 8

    कहने से काम नहीं चलेगा, अवैध निर्माण पर कार्रवाई करनी ही होगी

    पूर्वी दिल्ली नगर निगम के पूर्व मेयर श्याम सुंदर अग्रवाल ने दैनिक जागरण से बातचीत में सौरभ पांडेय को बताया, राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में अवैध निर्माण के कारण होने वाले हादसे की जड़ केवल नियमों की अनदेखी नहीं, बल्कि राजनीतिक संरक्षण, प्रशासनिक उदासीनता है। भ्रष्टाचार का ये गठजोड़ कारोबार बना चुका है।

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    जब तक इस गठजोड़ को नहीं तोड़ा जाएगा, तब तक किसी भी कानून या अभियान से स्थायी समाधान नहीं निकलेगा। सबसे पहले आवश्यकता राजनीतिक इच्छाशक्ति की है। शासन और प्रशासन में बैठे लोगों को यह स्पष्ट संदेश देना होगा कि अवैध निर्माण किसी भी परिस्थिति में स्वीकार्य नहीं होगा।

    यदि कोई पार्षद, विधायक या सांसद किसी अवैध निर्माणकर्ता का पक्ष लेता है या कार्रवाई रुकवाने का प्रयास करता है, तो उसके विरुद्ध भी दंडात्मक कार्रवाई होगी।

    अवैध निर्माण रोकने की सबसे प्रभावी रणनीति यह है कि निर्माण के शुरुआती चरण में ही कार्रवाई हो। जब किसी भवन का पहला लेंटर डाला जा रहा हो और निर्माण स्वीकृत नक्शे के अनुरूप न हो, तभी उसे रोक दिया जाए।

    भवन पूरी तरह बनने के बाद उसे तोड़ने में प्रशासन को भारी संसाधन लगाने पड़ते हैं और खरीदारों को भी नुकसान उठाना पड़ता है। अवैध निर्माण को ध्वस्त करने पर आने वाला पूरा खर्च भवन मालिक से वसूला जाना चाहिए।

    भुगतान न करने की स्थिति में उसके बैंक खाते अटैच करने अथवा संपत्ति संबंधी अधिकारों पर रोक लगाने का प्रावधान होना चाहिए। इसके साथ ही जवाबदेही की व्यवस्था भी मजबूत करनी होगी।

    अवैध निर्माण के पूरे तंत्र में सब-रजिस्ट्रार कार्यालय की भूमिका भी बेहद महत्वपूर्ण है। यदि नियमों के विपरीत बनी मंजिलों की रजिस्ट्री ही न हो तो अवैध निर्माण का बड़ा हिस्सा स्वतः रुक सकता है। आज स्थिति यह है कि कई स्थानों पर पांचवीं और छठी मंजिल तक की रजिस्ट्री हो जाती है, जिससे बिल्डरों का मनोबल बढ़ता है।

    रजिस्ट्री के समय भवन का स्वीकृत नक्शा अनिवार्य रूप से संलग्न होना चाहिए, जिसमें पार्किंग, प्रत्येक मंजिल और उसके स्वामी का स्पष्ट विवरण दर्ज हो। 'टाप फ्लोर' जैसे भ्रामक शब्दों का प्रयोग समाप्त किया जाना चाहिए।

    साथ ही, फ्लैट बेचने वाले को शपथपत्र देना चाहिए कि संपत्ति नियमानुसार निर्मित है। यदि बाद में कोई अनियमितता सामने आती है तो खरीदार को उसकी पूरी राशि ब्याज सहित लौटाने की जिम्मेदारी विक्रेता की हो।

    अंततः भवन कानूनों में भी संशोधन की आवश्यकता है। वर्तमान दंडात्मक प्रविधान अवैध निर्माण से होने वाले लाभ की तुलना में बेहद कमजोर हैं। दोषी अधिकारियों के लिए अधिकतम सजा बढ़ाकर दस वर्ष तक करने और भारी आर्थिक दंड लगाने पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए।

    साथ ही, प्रत्येक वार्ड में चल रहे निर्माण कार्यों की साप्ताहिक रिपोर्ट सार्वजनिक की जाए और स्थानीय जनप्रतिनिधियों की जवाबदेही भी तय की जाए। अवैध निर्माण केवल भवन नियमों का उल्लंघन नहीं है, बल्कि यह नागरिकों के जीवन के साथ खिलवाड़ है।

    यदि राजनीतिक इच्छाशक्ति, प्रशासनिक जवाबदेही और पारदर्शी व्यवस्था को एक साथ लागू किया जाए, तो इस समस्या पर प्रभावी नियंत्रण संभव है। आवश्यकता केवल कानून बनाने की नहीं, बल्कि उन्हें निष्पक्ष और कठोरता से लागू करने की है।

    अवैध निर्माण, संगठित तंत्र, उसपर हो प्रहार

    जेपी वर्मा, पूर्व अधिशासी अभियंता, एमसीडी ने दैनिक जागरण से बातचीत में शशि ठाकुर ने बताया, वैसे इस पूरे खेल में सबसे पहली और प्रत्यक्ष जिम्मेदारी उस संपत्ति स्वामी या बिल्डर की है, जो चंद पैसों के मुनाफे के लिए या प्रशासनिक प्रक्रियाओं से बचने के लिए बिना स्वीकृत नक्शे के निर्माण कार्य शुरू कर देता है।

    अधिनियम के तहत यह संपत्ति स्वामी का प्राथमिक कर्तव्य है कि वह निर्माण से पहले सभी आवश्यक स्वीकृतियां प्राप्त करे और भवन उपविधियों के मानकों का पालन करे। जो लोग जानबूझकर इन नियमों को ठेंगा दिखाते हैं, वे निसंदेह इस अपराध के मुख्य सूत्रधार हैं। लेकिन क्या इस अपराध में उनका साथ देने वाले तकनीकी विशेषज्ञ भी पूरे जिम्मेदार हैं।

    भवन निर्माण से जुड़े आर्किटेक्ट, इंजीनियर और ड्राफ्ट्समैन का दायित्व केवल एक कागजी नक्शा तैयार करना नहीं है, बल्कि यह सुनिश्चित करना भी है कि जमीनी निर्माण स्वीकृत योजना के अनुरूप हो।

     एमसीडी अधिनियम ने निगम के प्रशासनिक अमले को निरीक्षण, निगरानी और अवैध निर्माण को शुरुआती चरण में ही रोकने की असीमित शक्तियां दी हैं। लेकिन हकीकत यह है कि किसी क्षेत्र में महीनों तक सरेआम अवैध निर्माण चलता रहता है, भारी मात्रा में निर्माण सामग्री सड़कों पर पड़ी रहती है, लेकिन संबंधित क्षेत्र के बिल्डिंग इंस्पेक्टर, कनिष्ठ अभियंता और सहायक अभियंता को इसकी भनक तक नहीं लगती।

    यह कैसे संभव है? जब अदालतें भी यह मान चुकी हैं कि प्रशासनिक लापरवाही और भ्रष्टाचार के बिना अवैध निर्माण की एक ईंट भी नहीं रखी जा सकती, तो फिर कार्रवाई के वक्त इन अधिकारियों पर गाज क्यों नहीं गिरती? यदि हम वाकई समाधान चाहते हैं, तो जितने सख्त प्रविधान मकान मालिक के लिए हैं, उतने ही कड़े दंडात्मक प्रविधान इन लापरवाह या भ्रष्ट अधिकारियों के खिलाफ भी लागू होने चाहिए।

    बात सिर्फ निगम तक ही सीमित नहीं रहती, बल्कि इस चक्रव्यूह में पुलिस प्रशासन और राजस्व विभाग की भूमिका भी संदिग्ध हो जाती है। हालांकि पुलिस का काम भवन निर्माण के नक्शे को स्वीकृत करना नहीं है, लेकिन कानून-व्यवस्था बनाए रखना और निगम के अधिकारियों को अवैध निर्माण रोकने में त्वरित सुरक्षा सहयोग देना उनकी वैधानिक जिम्मेदारी है।

    कई बार स्थानीय निवासियों द्वारा लिखित शिकायतें दिए जाने के बावजूद पुलिस और निगम के बीच जिम्मेदारी टालने का खेल चलता रहता है। वहीं, दूसरी ओर राजस्व विभाग की लापरवाही इस आग में घी का काम करती है।

    भूमि के मालिकाना हक, सीमांकन और सरकारी जमीनों के रिकार्ड में पारदर्शिता न होने का सीधा फायदा भू-माफिया उठाते हैं। अगर हमारा राजस्व विभाग जमीन के दस्तावेजों को पूरी तरह डिजिटल, पारदर्शी और अद्यतन कर दें, तो अनधिकृत कब्जे और अवैध निर्माण की गुंजाइश काफी हद तक अपने आप खत्म हो जाएगी।

    अपने जमीनी आकलन के आधार पर इस निष्कर्ष पर पहुंचता हूं कि दिल्ली में अवैध निर्माण के मुख्य रूप से दो ही उत्प्रेरक हैं पहला आवश्यकता और दूसरा लोभ-लाभ। जहां गरीब और मध्यम वर्ग अपनी बुनियादी जरूरत के लिए इस जाल में फंसता है, वहीं भू-माफिया और बिल्डर वर्ग केवल अंधा मुनाफा कमाने के लिए कानून को ठेंगे पर रखता है।

    राजस्व विभाग और पंजीकरण प्राधिकरण चाहें तो व्यावसायिक लाभ के लिए होने वाले इस अवैध खेल पर तुरंत रोक लगा सकते हैं, उन्हें बस ऐसी अवैध रूप से निर्मित संपत्तियों के क्रय- विक्रय और रजिस्ट्री पर पूर्ण प्रतिबंध लगाना होगा।

    दिल्ली

    • 60%  अवैध
    • 40% नियोजित रूप से विकसित।
    • 2000 से अधिक कालोनियों में 50 लाख से ज्यादा लोग रहते हैं।

    आखिर कौन और क्यों दे रहा अवैध निर्माण को बढ़ावा

    • वोट बैंक की राजनीति
    • शहर में तय मात्रा में आवासीय परिसर उपलब्ध न होना
    • डीडीए को हर साल एक लाख नए आवासीय परिसर बनाने की जिम्मेदारी, लेकिन नहीं होता काम, कट रहीं अवैध कॉलोनियां।
    • अवैध कालोनियों को राजनीतिक संरक्षण
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    अवैध निर्माण रोकने को क्या नियम-कानून :

    • एमसीडी एक्ट की धारा 343:  बिना स्वीकृत नक्शे  या उससे अलग, भवन उप नियमों का उल्लंघन करता है तो आयुक्त ध्वस्तीकरण का आदेश जारी कर सकता है।
    • कारण बताओ नोटिस के आधार पर 15 दिन तक का समय मिलता है। धारा 343 या 344 : पूर्ण हो चुके अवैध हिस्से या पूरे परिसर को सील कर सकता है। सील तोड़ना अवैध है और केवल सक्षम प्राधिकारी या अपीलीय आदेश से ही सील हटाई जा सकती है।

    किन मामलों में सबसे अधिक कार्रवाई होती है?

    • अतिरिक्त मंजिल बनाना
    • स्टिल्ट पार्किंग को कमर्शियल उपयोग में बदलना
    • कवरेज/एफएआर का उल्लंघन
    • बेसमेंट का अवैध उपयोग
    • छज्जा, बालकनी या प्रोजेक्शन का अतिक्रमण
    • बिना स्वीकृत नक्शे के निर्माण

     

    1. 1531 अनधिकृत कालोनियां जैसा है वैसे के आधार पर नियमित हो चुकी हैं। 31 जुलाई 2014 तक किए गए दिल्ली में निर्माण को निगम या अन्य किसी प्रशासन द्वारा कार्रवाई से बचने का संरक्षण दिल्ली विशेष प्रविधान एक्ट के तहत प्राप्त है।
    2. 400 जूनियर इंजीनियर और सहायक अभियंता और अधिशासी अभियंता हैं।

    दो हजार शिकायतें अवैध निर्माण की विभिन्न एजेंसियों को प्रति माह मिलती हैं-

    विभागीय शिकायतें और उन पर की गई कार्रवाई

    अवधि: 1 जनवरी से 30 अप्रैल | स्रोत: एसटीएफ रिपोर्ट


    विभाग शिकायतें प्राप्त कार्रवाई योग्य नहीं पाई गईं सील की गई संपत्तियां ध्वस्त की गई संपत्तियां
    दिल्ली नगर निगम (उत्तरी क्षेत्र) 89,194 63,891 472 2,066
    दिल्ली नगर निगम (दक्षिणी क्षेत्र) 67,007 40,311 2,197 3,024
    दिल्ली नगर निगम (पूर्वी क्षेत्र) 36,129 27,595 532 539
    दिल्ली विकास प्राधिकरण 23,039 13,697 98 728
    राजस्व विभाग 3,933 1,316 2 29
    दिल्ली पुलिस 2,284 1,014 1 79
    दिल्ली अग्निशमन सेवा 762 649 0 0
    दिल्ली जल बोर्ड 1,534 617 0 0
    लोक निर्माण विभाग 1,464 557 0 15
    नई दिल्ली नगर पालिका परिषद 524 308 13 7
    वन विभाग 571