'बेटा राज करेगा पीकर घुट्टी', बिना पद संजय बनाते थे गिरफ्तारी की सूची; कैसी थी इमरजेंसी के वक्त दिल्ली?
25 जून 1975 को देश में आपातकाल लागू हुआ था, जिसने भारतीय लोकतंत्र को झकझोर दिया। इस दौरान दिल्ली के लोगों की जिंदगी कैसी थी, यहां कैसे फैसले लिए जा र ...और पढ़ें

तत्कालीन राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद ने तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के कहने पर अनुच्छेद 352 के तहत आपातकाल की घोषणा की थी। एआई इमेज
HighLights
25 जून 1975 को इंदिरा गांधी ने देश में आपातकाल लगाया।
दिल्ली में 1050, देशभर में 1.10 लाख लोग बंदी बनाए गए।
विपक्षी नेता जेल में, मीडिया पर सख्त पाबंदी लगाई गई।
डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। 25 जून की तारीख हर साल भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में एक ऐसी चेतावनी के रूप में दर्ज है, जो 51 साल बाद भी बताती है कि जब सत्ता निरंकुश हो जाए तो लोकतांत्रिक अधिकार कितनी आसानी से छीने जा सकते हैं।
यही वह दिन है, जब 1975 में आधी रात के बाद पूरे देश पर ऐसा सन्नाटा छा गया था, जिसने लोकतंत्र की आत्मा को झकझोर दिया। अखबारों की स्याही पर पहरा था, विपक्षी जेलों में थे और नागरिक अधिकार सिर्फ कागजों तक सीमित हो गए थे।
25 जून 1975..आज 51 साल हो गए हैं, जब देश में लोकतंत्र की हत्या की गई थी। आइए आपातकाल के बारे में आपने सभी सवालों के जवाब यहां पढ़ें..
देश में कितनी बार लगा था आपातकाल?
- 26 अक्टूबर 1962: चीन के साथ जंग और बाहरी आक्रमण के चलते यह आपातकाल लगाया था, जोकि जनवरी 1968 तक प्रभावी रहा।
- 3 दिसंबर 1971: पाकिस्तान के साथ युद्ध और बाहरी आक्रमण के चलते लगा था। यह आपातकाल जारी था, तभी 1975 में आंतरिक आपातकाल भी लग गया था।
- 25 जून 1975: तत्कालीन राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद ने तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के कहने पर अनुच्छेद 352 के तहत आपातकाल की घोषणा की थी। यह सबसे विवादास्पद आपातकाल था।
51 साल पहले आज के दिन क्यों लगी थी इमरजेंसी?
25 जून, 1975 को लगी इमरजेंसी की कहानी साल 1971 से शुरू होती है। 1971 के लोकसभा चुनाव में इंदिरा गांधी उत्तर प्रदेश की रायबरेली सीट से लड़ी थीं। इंदिरा के खिलाफ राजनारायण चुनाव मैदान में थे। उस साल रायबरेली में राजनारायण के पक्ष में हवा थी, लेकिन जब चुनाव परिणाम आए तो राजनारायण हार गए।
राजनारायण ने चुनावी अनियमितताओं का आरोप लगाते हुए इंदिरा गांधी की जीत को इलाहाबाद हाईकोर्ट में चुनौती दी। इस याचिका पर सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति जगमोहन लाल सिन्हा ने 12 जून 1975 को इंदिरा गांधी की जीत को अवैध घोषित कर दिया था। इसी के साथ उन्होंने इंदिरा को जनप्रतिनिधित्व अधिनियम के तहत किसी भी निर्वाचित पद को संभालने से अयोग्य घोषित कर दिया था। यह पहली बार हुआ था, जब किसी मौजूदा प्रधानमंत्री की कुर्सी अदालत के फैसले से डगमगाई थी।
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आधी रात के फैसले से सुबह तक बदल गया था देश
इसके बाद राजनीतिक संकट गहराता गया। 25 जून 1975 को तत्कालीन राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद ने प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की सलाह पर संविधान के अनुच्छेद 352 के तहत आपातकाल की घोषणा कर दी। सुबह होते-होते देश की राजनीति का नक्शा बदल चुका था।
जेलों में विपक्ष, अखबारों पर पहरा
रातोंरात विपक्षी नेताओं की गिरफ्तारियां शुरू हो गईं। अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी, मोरारजी देसाई, चौधरी देवीलाल, चंद्रशेखर, बाला साहेब देवरस समेत लाखों राजनीतिक कार्यकर्ताओं, विपक्षी नेताओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं को बिना मुकदमे जेल में डाल दिया गया।
मीडिया हाउस और प्रिंटिंग प्रेस की बिजली काट दी गई। पत्रकारों पर भी शिकंजा कसा गया। इंदिरा के खिलाफ आवाज उठाने वाले 250 पत्रकारों को भी अरेस्ट कर लिया गया था। अखबारों की खबरें सेंसर होने लगीं। कई समाचार पत्रों को हर खबर छापने से पहले सरकारी मंजूरी लेनी पड़ती थी।
मां के राज में संजय की चलती थी तानाशाही
आपातकाल के दौरान इंदिरा गांधी के पुत्र संजय गांधी की भूमिका लगातार बढ़ती गई थी। आलोचकों का आरोप था कि बिना किसी संवैधानिक पद पर रहते हुए भी वे कई महत्वपूर्ण फैसलों को प्रभावित कर रहे थे। किस गिरफ्तार कर जेल में डालना है और किसे नहीं, कहां बुलडोजर चलना है, नसबंदी अभियान और कई विवादास्पद सरकारी कार्यक्रमों में संजय ही फैसले करते थे।
पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने जेल में रहते हुए कई कविताएं लिखीं, जो बाद में कैदी कविराय के नाम से प्रसिद्ध हुईं। उनकी एक प्रसिद्ध कविता को इंदिरा गांधी के राज्य संजय की तानाशाही पर व्यंग माना गया था। जिसकी पंक्ति थी...
'लोकशाही की छुट्टी, बेटा राज करेगा...'
सब सरकारों से बड़े हैं छोटे सरकार
गुड्डी जिनकी चढ़ रही दिल्ली के दरबार।
दिल्ली के दरबार बुढ़ापा खिसियाता है
पूत सवाया सिंहासन चढ़ता आया है
कह कैदी कविराय लोकशाही की छुट्टी
बेटा राज करेगा पीकर मुगली घुट्टी।

यह ग्राफिक्स एआई जनरेटेड है।
किसने दिया था आपातकाल का सुझाव?
पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने अपनी किताब 'द डेमोक्रेटिक डिकेड, द इंदिरा गांधी इयर्स' में इमरजेंसी का जिक्र किया है। जिसके मुताबिक, तत्कालीन पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री और वरिष्ठ कांग्रेस नेता सिद्धार्थ शंकर राय ने 'आंतरिक आपातकाल' का सुझाव दिया था। बताया जाता है कि इंदिरा गांधी ने इस सलाह को तुरंत स्वीकार कर लिया और इसके बाद घटनाक्रम तेजी से आगे बढ़ा।
लोकनायक जेपी का प्रतिरोध
लोकनायक जयप्रकाश नारायण आपातकाल के सबसे बड़े विरोधी चेहरों में थे। उन्होंने इसे 25 जून को 'राष्ट्रीय अपमान का दिन' करार दिया था। आपातकाल हटने के बाद उन्होंने युवाओं से लोकतंत्र की रक्षा के लिए जागरूक रहने का आह्वान किया। जेपी का मानना था कि लोकतांत्रिक चेतना के बिना लोकतंत्र केवल एक ढांचा बनकर रह जाता है।
आपातकाल को नेताओं, पत्रकारों, समाजिक कार्यकर्ताओं और साहित्यकारों ने अपने-अपने अंदाज में विरोध किया था। आपातकाल के विरोध में गांधीवादी कवि भवानी प्रसाद मिश्र ने रोज सुबह, दोपहर और शाम को एक कविता लिखने का निश्चय किया था। इसे यथासंभव निभाया भी था। उनकी रचनाओं का संग्रह 'त्रिकाल संध्या' नाम से प्रकाशित हुआ।
डॉ. धर्मवीर भारती ने ‘मुनादी’ शीर्षक की एक कविता के माध्यम से आपातकाल के दर्द को बयां किया है। उनकी यह कविता आज भी काफी लोकप्रिय है। उन्होंने लिखा था...
खलक खुदा का, मुलुक बाश्शा का
हुकुम शहर कोतवाल का…
हर खास-ओ-आम को आगाह किया जाता है
कि खबरदार रहें
और अपने-अपने किवाड़ों को अंदर से
कुंडी चढ़ाकर बंद कर लें
गिरा लें खिड़कियों के परदे
और बच्चों को बाहर सड़क पर न भेजें
क्योंकि एक बहत्तर बरस का बूढ़ा आदमी अपनी कांपती कमजोर आवाज में
सड़कों पर सच बोलता हुआ निकल पड़ा है!
…मुजिर है वह
कि हालात को हालात की तरह बयान किया जाए
कि चोर को चोर और हत्यारे को हत्यारा कहा जाए
कि मार खाते भले आदमी को
और अस्मत लुटती औरत को
और भूख से पेट दबाए ढांचे को
और जीप के नीचे कुचलते बच्चे को
बचाने की बेअदबी की जाए!

यह ग्राफिक्स एआई जनरेटेड है।
आपातकाल में दिल्ली में कैसी थी लोगों की जिंदगी?
आपातकाल के दौरान दिल्ली में रह रहे लोग बाहर निकले और बात करने से डरते थे। कौन सुन रहा है और किस पर बात पर जेल में डाल दिया जाए; हमेशा इस दहशत में जी रहे थे। तुर्कमान गेट इलाके में झुग्गी-बस्तियों को हटाने के नाम पर बड़े पैमाने पर बुलडोजर चलाए गए। विरोध करने वालों पर पुलिस कार्रवाई हुई। हजारों परिवारों को विस्थापित होना पड़ा और सैकड़ों को जेल में ठूंस दिया गया था। हजारों लोग बेरोजगार हो गए। सामाजिक नेटवर्क ध्वस्त हो गए थे।
अकेले दिल्ली में 1,050 से अधिक बने बंदी
आंकड़े बताते हैं कि आपातकाल (1975-1977) के दौरान अकेले दिल्ली में 1,050 से अधिक लोगों को गिरफ्तार किया गया था। पूरे भारत में 1,10,000 से अधिक लोगों को बिना मुकदमे के जेल में कैद कर लिया गया था। हालांकि, गिरफ्तार होने वालों की संख्या इससे कहीं बहुत ज्यादा थी। इन गिरफ्तारियों में अधिकतर विपक्षी दलों के नेताओं के अलावा बड़ी संख्या में जनसंघ, आरएसएस के कार्यकर्ता और मुखर होकर लिखने-बोलने वाले पत्रकार एवं बुद्धिजीवी शामिल थे।
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Source:
- कुलदीप नैयर की किताब- Emergency Retold
- बलवीर दत्त की किताब- इमरजेंसी का कहर और सेंसर का जहर
- किताब- कैसे भूलें आपातकाल का दंश
- जागरण अर्काइव