क्या आपके पास भी आया 'New Rent Rules 2026' का मैसेज? क्या है इसकी सच्चाई और आपके हक से जुड़ी हर छोटी-बड़ी बात
सोशल मीडिया पर 2026 से नए किराये नियमों के दावे गलत हैं। ये नियम मुख्य रूप से मॉडल टेनेंसी एक्ट 2021 से संबंधित हैं, जिसे केंद्र ने मंजूरी दी थी पर रा ...और पढ़ें

मॉडल टेनेंसी एक्ट 2021 के प्रावधान राज्यों के लिए लागू करना अनिवार्य नहीं। फोटो: एआई जनरेटेड
डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म और प्रोफेशनल नेटवर्किंग साइट्स पर इन दिनों यह दावा किया जा रहा है कि भारत में 2026 से किराये के मकानों को लेकर नए नियम लागू कर दिए गए हैं।
हालांकि वास्तविकता यह है कि इनमें से ज्यादातर नियम नए नहीं हैं। ये मुख्य रूप से मॉडल टेनेंसी एक्ट 2021 के प्रावधानों से जुड़े हैं, जिसे केंद्र सरकार ने जून 2021 में मंजूरी दी थी।
यह कानून देश के किराया बाजार को व्यवस्थित बनाने के लिए तैयार किया गया एक ढांचा है, लेकिन इसे सीधे पूरे देश में लागू नहीं किया गया है। किराये से जुड़े कानून राज्य सरकारों के अधिकार क्षेत्र में आते हैं, इसलिए कोई भी राज्य चाहे तो इसे अपनाकर अपने अनुसार लागू कर सकता है या फिर पुराने कानूनों के साथ ही व्यवस्था जारी रख सकता है।

फोटो: एआई जनरेटेड
भरोसे और अनौपचारिक समझौतों चलता है किराये का बाजार
दरअसल भारत में लंबे समय तक किराये का बाजार भरोसे और अनौपचारिक समझौतों पर चलता रहा है। पिछले कुछ वर्षों में शहरी इलाकों में 11 महीने के एग्रीमेंट आम हो गए हैं, जिनमें कई बार रजिस्ट्रेशन भी नहीं कराया जाता। मॉडल टेनेंसी एक्ट इस व्यवस्था को अधिक औपचारिक और दस्तावेज आधारित बनाने का प्रस्ताव देता है।
सोशल मीडिया पर जिन नियमों को नए नियम बताकर साझा किया जा रहा है, उनमें सिक्योरिटी डिपॉजिट की सीमा तय करना, किराये के समझौते का पंजीकरण और किराया विवादों के लिए विशेष अदालतों की व्यवस्था जैसे प्रावधान शामिल हैं। लेकिन जब तक किसी राज्य ने इन्हें अपने कानून के रूप में लागू नहीं किया है, तब तक ये अनिवार्य रूप से लागू नहीं माने जाएंगे।

फोटो: एआई जनरेटेड
सोशल मीडिया पर जिन नियमों की चर्चा हो रही है, उनमें प्रमुख बातें यह हैं
आवासीय मकानों के लिए सिक्योरिटी डिपॉजिट अधिकतम दो महीने के किराये तक सीमित रखने का सुझाव।
किराये में बढ़ोतरी साल में एक बार ही हो सके, हालांकि यह पूरी तरह एग्रीमेंट की शर्तों पर निर्भर करेगा।
किराया समझौते को 60 दिनों के भीतर पंजीकृत कराने का प्रावधान।
मकान मालिक को किरायेदार के घर में प्रवेश से पहले सूचना देना जरूरी होगा।
किराये से जुड़े विवादों के त्वरित निपटारे के लिए विशेष रेंट कोर्ट की व्यवस्था का प्रस्ताव।
ये प्रावधान खास तौर पर शहरी क्षेत्रों में किरायेदारों से जुड़े आम विवादों को ध्यान में रखकर तैयार किए गए हैं। लंबे समय से किरायेदार अधिक सिक्योरिटी डिपॉजिट, अचानक किराया बढ़ाए जाने और निजता के उल्लंघन जैसी समस्याओं की शिकायत करते रहे हैं।
वहीं मकान मालिकों की शिकायत रही है कि कई बार किराया समय पर नहीं मिलता, किरायेदार घर खाली करने से इनकार कर देते हैं और विवाद अदालतों में लंबे समय तक चलते रहते हैं। मॉडल टेनेंसी एक्ट इन दोनों पक्षों के बीच संतुलन बनाने की कोशिश करता है।
यदि राज्य इन प्रावधानों को लागू करते हैं तो...
किराये के सभी समझौते लिखित और स्पष्ट शर्तों के साथ तैयार किए जाएंगे और उन्हें स्थानीय रेंट अथॉरिटी के पास जमा करना होगा।
सिक्योरिटी डिपॉजिट को आवासीय संपत्तियों के लिए अधिकतम दो महीने और व्यावसायिक संपत्तियों के लिए छह महीने के किराये तक सीमित किया जा सकता है।
किराया बढ़ाने की प्रक्रिया अधिक स्पष्ट होगी। मकान मालिक मनमाने तरीके से बीच में किराया नहीं बढ़ा सकेंगे और इसके लिए पहले से सूचना देना जरूरी होगा।
किरायेदार को बेदखल करने के नियम स्पष्ट होंगे। किराया न देना, संपत्ति को नुकसान पहुंचाना, गलत उपयोग करना या बिना अनुमति सबलेट करना बेदखली का आधार बन सकता है, लेकिन इसके लिए कानूनी प्रक्रिया जरूरी होगी।
बिना मकान मालिक की लिखित अनुमति के किसी और को घर किराये पर देना यानी सबलेट करना संभव नहीं होगा।
एग्रीमेंट खत्म होने के बाद भी यदि किरायेदार घर खाली नहीं करता है तो उस पर पेनल्टी किराया लगाया जा सकता है, जो सामान्य किराये से कई गुना तक हो सकता है।
विवादों के निपटारे के लिए रेंट अथॉरिटी, रेंट कोर्ट और रेंट ट्रिब्यूनल जैसी तीन स्तर की व्यवस्था प्रस्तावित है, हालांकि यह राज्यों के लागू करने के तरीके पर निर्भर करेगा।

फोटो: एआई जनरेटेड
राज्यों में पुराने रेंट कंट्रोल कानून अभी भी लागू
हालांकि किराये से जुड़े कानून पूरी तरह राज्यों के अधिकार क्षेत्र में आते हैं। इसलिए हर राज्य अपने नियम तय कर सकता है और कई जगह पुराने रेंट कंट्रोल कानून अभी भी लागू हैं।
तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश और असम जैसे कुछ राज्यों ने इस ढांचे के आधार पर अपने कानूनों में बदलाव किए हैं, जबकि कई अन्य राज्य अभी भी पुराने नियमों के तहत ही व्यवस्था चला रहे हैं।
मुंबई जैसे शहरों में तो पहले से ही किराये के समझौते काफी हद तक औपचारिक हो चुके हैं और वहां आम तौर पर लीव एंड लाइसेंस एग्रीमेंट के जरिए मकान किराये पर दिए जाते हैं, भले ही नया ढांचा पूरी तरह लागू न हुआ हो।
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