थिएटर की सीट से परेशान थी मां, बेटे ने कार को ही बना दिया सिनेमाघर; दिलचस्प है Drive-In Theater की कहानी
ड्राइव-इन थिएटर कोई आज का ट्रेंड नहीं है, बल्कि इसकी शुरुआत 1933 में एक बेटे ने अपनी मां के लिए की थी। ...और पढ़ें

कैसे बना था दुनिया का पहला ड्राइव-इन थिएटर? (AI Generated Image)
HighLights
रिचर्ड हॉलिंग्सहेड ने मां की परेशानी पर बनाया ड्राइव-इन थिएटर
पहला ड्राइव-इन थिएटर 1933 में न्यू जर्सी में खुला
शुरुआत में असफल, पर बाद में लोकप्रिय हुआ ड्राइव-इन थिएटर
लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। आज के दौर में खुली हवा में अपनी गाड़ी में बैठकर फिल्म देखना यानी ड्राइव-इन थिएटर को काफी पसंद किया जा रहा है। फिल्में देखने का यह तरीका आपको भले ही आज का ट्रेंड लग रहा हो, लेकिन असल में इसकी शुरुआत करीब 93 साल पहले 1933 में हुई थी।
जी हां, ड्राइव-इन थिएटर कोई आज का ट्रेंड नहीं है, बल्कि काफी पुराना है। सबसे दिलचस्प बात यह है कि सबसे पहली बार ड्राइव-इन थिएटर एक बेटे ने अपनी मां के लिए बनाया था। आइए जानते हैं दुनिया के सबसे पहले ड्राइव-इन थिएटर की कहानी।
मां की परेशानी से आया आइडिया
यह कहानी है अमेरिका के न्यू जर्सी के कैमडेन शहर में रहने वाले रिचर्ड हॉलिंग्सहेड की। उनकी मां को सिनेमाघरों की सीटों पर बैठने में असहजता महसूस होती थी। अपनी मां की इसी परेशानी को देखते हुए रिचर्ड ने सोचा कि ऐसा रास्ता निकाला जाए, ताकि मां बिना किसी तकलीफ के फिल्मों का मजा ले सकें।
यहीं से उन्हें ड्राइव-इन थिएटर का आइडिया आया और उन्होंने अपने घर के ड्राइववे में कई तरह के प्रयोग शुरू कर दिए। उन्होंने गाड़ियों और स्क्रीन के बीच की दूरी और ऊंचाई का ऐसा तालमेल बैठाया, जिससे हर कार में बैठे व्यक्ति को स्क्रीन बिल्कुल साफ दिखाई दे। काफी मेहनत के बाद मई 1933 में रिचर्ड को इस अनोखे आइडिया का पेटेंट मिला।
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दुनिया की पहली ड्राइव-इन स्क्रीनिंग
पेटेंट मिलने के बाद रिचर्ड ने दुनिया का पहला ड्राइव-इन थिएटर शुरू किया। इस थिएटर में लगभग 400 कार्स पार्क करने की जगह थी। 6 जून 1933 को इस ड्राइव-इन मूवी थिएटर में पहली फिल्म वाइव्स बिवेयर स्क्रीन की गई, जो कि 1932 में आई एक कॉमेडी फिल्म थी।
महंगा था टिकट, फिर भी मिली खास आजादी
उस समय के हिसाब से इस ड्राइव-इन थिएटर का टिकट थोड़ा महंगा था। जहां फिल्म देखने के लिए हर कार 25 सेंट और साथ ही कार में मौजूद हर व्यक्ति के लिए एक्स्ट्रा 25 सेंट की कीमत तय कई गई थी।
हालांकि, यहां का टिकट लोगों की जेब पर थोड़ा भारी था, लेकिन यहां उन्होंने वो आजादी मिल रही थी, जो पारंपरिक सिनेमाघरों में नहीं थी। यहां वे अपनी कार में आराम से बैठकर फिल्म का आनंद ले सकते थे, मनपसंद खाना खा सकते थे और बिना किसी रोक-टोक के स्मोकिंग भी कर सकते थे।
सिर्फ 3 साल में लग गया ताला
ड्राइव-इन थिएटर का आइडिया बेहद शानदार था, लेकिन बिजनेस के मामले में उतना सफल नहीं रहा। फायदा न होने के कारण इस थिएटर को सिर्फ 3 साल में ही बंद करना पड़ा, लेकिन यह आइडिया मनोरंजन जगत में इतिहास रच चुका था। भले ही पहला ड्राइव-इन थिएटर बंद हो गया, लेकिन यह कॉन्सेप्ट लोगों को इतना पसंद आया कि देखते ही देखते कई नए ड्राइन-इन थिएटर्स खुलने शुरू हो गए।