'भूलने की बीमारी कोई पागलपन नहीं', 120 साल पहले डॉक्टर एलोइस ने सुलझाई थी अल्जाइमर की सबसे बड़ी गुत्थी
डॉ. एलोइस अल्जाइमर ने दुनिया को पहली बार बताया कि याददाश्त का कमजोर होना बुढ़ापे का नहीं, बल्कि मस्तिष्क की एक गंभीर बीमारी है। ...और पढ़ें

वैज्ञानिक जिन्होंने दुनिया को बताई 'अल्जाइमर' रोग की असली सच्चाई (Image Source: X)

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। हम अक्सर सोचते हैं कि उम्र बढ़ने के साथ याददाश्त का कमजोर होना एक आम बात है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि दुनिया को पहली बार यह किसने बताया कि यह महज बुढ़ापे का असर नहीं, बल्कि मस्तिष्क की एक बेहद गंभीर बीमारी है?
इसका श्रेय जाता है जर्मनी के एक प्रतिष्ठित मनोचिकित्सक और न्यूरोपैथोलॉजिस्ट, डॉ. एलोइस अल्जाइमर को। जी हां, 20वीं सदी की शुरुआत में उनकी इसी क्रांतिकारी खोज के कारण आज दुनिया इस रहस्यमयी बीमारी को 'अल्जाइमर रोग' के नाम से जानती है।

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दिमागी उलझनों में थी गहरी दिलचस्पी
14 जून 1864 को जर्मनी के मार्कब्रेट शहर में जन्मे एलोइस बचपन से ही पढ़ाई-लिखाई में बेहद होशियार थे। जीव विज्ञान में उनकी गहरी रुचि थी। जर्मनी के नामी विश्वविद्यालयों से चिकित्सा की पढ़ाई पूरी करने और डॉक्टरेट की डिग्री हासिल करने वाले डॉ. अल्जाइमर का रुझान हमेशा से इंसानी दिमाग की बनावट और मानसिक बीमारियों की असल वजहों को समझने की तरफ रहा।
भूलने की बीमारी का पहला दर्ज मामला
साल 1901 की बात है, जब जर्मनी के फ्रैंकफर्ट के एक अस्पताल में 51 साल की ऑगस्टे डेटर नाम की एक महिला मरीज को भर्ती किया गया। वह अक्सर चीजें भूल जाती थीं, अपने ही घरवालों को नहीं पहचान पाती थीं और बिना किसी वजह के लोगों पर शक किया करती थीं। डॉ. अल्जाइमर ने इस मामले को गंभीरता से लिया और लंबे समय तक उन पर बारीकी से अध्ययन किया। हालत यह थी कि जब डॉक्टर ने उनसे उनका और उनके पति का नाम पूछा, तो उन्होंने दोनों ही सवालों के जवाब में सिर्फ 'ऑगस्टे' कहा। यह असामान्य मामला आगे चलकर मेडिकल इतिहास में 'केस ऑगस्टे डी' के नाम से मशहूर हुआ।
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मौत के बाद खुला मस्तिष्क का सबसे गहरा राज
साल 1906 में जब ऑगस्टे डेटर का निधन हो गया, तब डॉ. अल्जाइमर ने उनके मस्तिष्क को सुरक्षित रख लिया। जब उन्होंने माइक्रोस्कोप से इसका सूक्ष्म अध्ययन किया, तो हैरान करने वाले नतीजे सामने आए। उन्होंने देखा कि मस्तिष्क की तंत्रिका कोशिकाएं असामान्य रूप से सिकुड़ चुकी थीं और उनके बीच अजीबोगरीब प्रोटीन जमे हुए थे।
इससे पहले दुनिया में ऐसी कोई संरचना दर्ज नहीं की गई थी। डॉ. अल्जाइमर ने दुनिया को पहली बार वैज्ञानिक प्रमाणों के साथ बताया कि याददाश्त का खोना केवल बढ़ती उम्र या पागलपन का नतीजा नहीं है, बल्कि यह मस्तिष्क की कोशिकाओं के धीरे-धीरे नष्ट होने वाली एक विशिष्ट बीमारी है। इसके अलावा उन्होंने मस्तिष्क की रक्त वाहिकाओं से जुड़ी बीमारियों के असर पर भी खूब रिसर्च की थी।
मंच पर मिली खामोशी, लेकिन नहीं मानी हार
नवंबर 1906 में डॉ. अल्जाइमर ने ट्यूबिंगन में दक्षिण-पश्चिम जर्मन मनोचिकित्सकों और वैज्ञानिकों की एक बड़ी बैठक में अपनी इस ऐतिहासिक खोज की रिपोर्ट पेश की। उन्हें पूरी उम्मीद थी कि इस नई बीमारी पर जोरदार चर्चा होगी, लेकिन हैरानी की बात यह रही कि उनके व्याख्यान के बाद पूरा सभागार पूरी तरह शांत रहा, किसी ने उनसे एक भी सवाल नहीं पूछा। दरअसल, उस दौर में वैज्ञानिक मानसिक बीमारियों को सिर्फ 'पागलपन' से ही जोड़कर देखते थे। बिना किसी प्रतिक्रिया या सराहना के उन्हें मंच से उतरना पड़ा।
दुनिया भले ही उस वक्त उनकी इस महान खोज का महत्व नहीं समझ पाई, लेकिन डॉ. एलोइस अल्जाइमर ने कभी हार नहीं मानी। उन्होंने लगातार वैज्ञानिक पत्रिकाओं में अपना यह अहम शोध प्रकाशित करवाया। 19 दिसंबर 1915 को उनके निधन के बाद, दुनिया ने धीरे-धीरे उनके काम की अहमियत को समझा। उनके इसी अमूल्य योगदान के कारण आज दुनिया भर में इस दिमागी बीमारी को उन्हीं के नाम पर 'अल्जाइमर' कहा जाता है।