विचार: सभी समझें संविधान का सामर्थ्य, न होने पाए मनमानी व्याख्या
प्रधानमंत्री मोदी ने 2015 में संविधान दिवस की शुरुआत की, ताकि लोग इसके महत्व को समझें। संविधान एक जीवंत दस्तावेज है, जिसमें संशोधन की गुंजाइश है, पर विपक्ष इसे खतरे में बता रहा है। अतीत में इसका दुरुपयोग हुआ है, जैसे आपातकाल में। आरक्षण सामाजिक न्याय का माध्यम है, पर इसे वोट बैंक नहीं बनाना चाहिए। नागरिकों को अपने अधिकारों और कर्तव्यों के प्रति सचेत रहना चाहिए।
HighLights
संविधान दिवस का महत्व
संविधान: एक जीवंत दस्तावेज
नागरिकों के कर्तव्य
संजय गुप्त। पिछले दिनों संसद के सेंट्रल हाल से लेकर अन्य स्थानों पर जो संविधान दिवस मनाया गया, उसकी शुरुआत प्रधानमंत्री मोदी ने 2015 से की थी। उन्होंने संविधान दिवस मनाना इसलिए आवश्यक समझा, ताकि देशवासी उसके मूल्यों और महत्ता से परिचित हो सकें। आज यदि भारत एक सफल लोकतंत्र के रूप में जाना जाता है तो इसके पीछे एक बड़ा योगदान हमारे संविधान का है।
संविधान की शक्ति ने ही देश को एकसूत्र में बांधकर रखा है। संविधान एक लंबी और श्रमसाध्य प्रक्रिया का परिणाम था। संविधान एक जीवंत दस्तावेज है और उसमें देश, काल और परिस्थितियों के अनुरूप संशोधन करने की गुंजाइश है। इसीलिए उसमें अब तक सौ से अधिक संशोधन किए जा चुके हैं। ये संशोधन सभी दलों की सरकारों ने किए हैं। यह स्पष्ट ही है कि आगे भी आवश्यकतानुसार संशोधन होते रहेंगे, लेकिन यह विचित्र है कि पिछले कुछ समय से कई विपक्षी नेता उसे पत्थर की लकीर की तरह पेश करने में लगे हुए हैं।
वे संविधान खतरे में है का शोर मचाते हैं। सबसे अधिक शोर कांग्रेस नेता राहुल गांधी मचा रहे हैं। वे संकीर्ण राजनीतिक कारणों से ऐसा कर रहे हैं। संविधान को खतरे में दिखाने के लिए वे जब-तब उसकी प्रति लहराते रहते हैं। यह एक शिगूफा ही है, क्योंकि वे उसी संविधान की ताकत से सांसद और नेता विपक्ष हैं, जिसे खतरे में बताते हैं।
वे संवैधानिक संस्था चुनाव आयोग को भी निशाने पर लिए हुए हैं, जो मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआइआर का अपना संवैधानिक काम कर रहा है। सच तो यह है कि यह राहुल गांधी ही हैं, जो संविधान को नुकसान पहुंचाने का काम कर रहे हैं।
संविधान की सार्थकता तब सिद्ध होती है, जब उसका उपयोग उसकी भावना के अनुरूप किया जाता है। इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती कि अतीत में संविधान का दुरुपयोग और उसका मनमाना इस्तेमाल किया गया। 1975 में जब देश पर आपातकाल थोपा गया तो न केवल उसका निरादर किया गया, बल्कि उसका मनचाहा इस्तेमाल भी किया गया।
जब भी संविधान का इस्तेमाल मनमाने तरीके से किया जाएगा, उसकी शक्ति क्षीण होगी। यदि राजनीतिक दल अपने स्वार्थों के लिए संविधान का इस्तेमाल करेंगे तो इससे कहीं न कहीं जनता के हितों की भी अनदेखी होगी। यह किसी से छिपा नहीं कि इंदिरा गांधी ने अपने राजनीतिक हितों की पूर्ति के लिए संविधान की अनदेखी कर जो आपातकाल लगाया, उसके दुष्परिणाम आम जनता को भी भोगने पड़े।
संविधान की सार्थकता बढ़ाने के लिए यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि सभी कार्य संविधानसम्मत ढंग से हों। यह भी आवश्यक है कि संविधान के प्रविधानों की मनमानी व्याख्या को रोका जाए। अपने देश में किस तरह संवैधानिक मामलों की मनचाही व्याख्या होती रहती है, इसका एक उदाहरण है आरक्षण। आरक्षण सामाजिक रूप से कमजोर-पिछड़े तबके के उत्थान के लिए संविधानप्रदत्त व्यवस्था है।
इस तबके के उत्थान और उसे मुख्यधारा में लाने के लिए आरक्षण को आगे भी जारी रखने की आवश्यकता है, लेकिन उसे वोट बैंक का हथियार नहीं बनाया जाना चाहिए और न ही समाज को अगड़े-पिछड़े में बांटने वाली वैमनस्य की राजनीति की जानी चाहिए। दुर्भाग्य से आज ऐसा ही हो रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने कुछ समय पहले एससी-एसटी आरक्षण में उपवर्गीकरण को मान्यता देते हुए यह सुझाव दिया था कि सरकारों को इन वर्गों में क्रीमी लेयर की पहचान कर उन्हें आरक्षण से बाहर करने की नीति विकसित करनी चाहिए।
कुछ राज्यों ने एससी-एसटी आरक्षण में उपवर्गीकरण को तो लागू किया, लेकिन कोई सरकार क्रीमी लेयर की नीति बनाने के लिए तैयार नहीं दिख रही है। सुप्रीम कोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश बीआर गवई ने कुछ दिन पहले एक बार फिर इसकी आवश्यकता जताई तो इसीलिए, क्योंकि यह ठीक नहीं कि आरक्षण का लाभ ले चुके लोग आगे भी उसका निरंतर लाभ उठाते रहें। यह सामाजिक न्याय के भी खिलाफ है और संविधान की भावना के खिलाफ भी।
प्रधानमंत्री मोदी ने संविधान की शक्ति रेखांकित करते हुए यह सही कहा कि उसके कारण ही उनके जैसा साधारण व्यक्ति प्रधानमंत्री पद तक पहुंचा। यह बात अन्य अनेक लोगों पर भी लागू होती है। विभिन्न क्षेत्रों में सामान्य लोग शीर्ष पद तक पहुंचते रहते हैं। ऐसा उन्हें मिले संवैधानिक अधिकारों के चलते संभव हो पाता है।
देश में आज जो प्रगति दिखती है, वह भी संविधान की देन है। संविधान इसे सुनिश्चित करता है कि हर योग्य और सक्षम व्यक्ति को आगे बढ़ने का अवसर मिले, वह चाहे जिस क्षेत्र में सक्रिय हो। राजनीतिक दल भी संविधान की ताकत के चलते ही सत्ता तक पहुंचते हैं। जनता संवैधानिक अधिकारों के तहत मिली वोट की अपनी ताकत से ही किसी को सत्ता में लाती है या फिर बाहर करती है।
संवैधानिक प्रविधानों से कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका के लोग ही नहीं बंधे हैं। आम जनता भी संवैधानिक मूल्यों से बंधी है। संविधान लोगों को अधिकार देता है तो उनके कर्तव्य भी सुनिश्चित करता है। इसीलिए अधिकारों के साथ-साथ कर्तव्यों से भी परिचित होना आवश्यक है। केवल संविधान दिवस के अवसर पर ही नहीं, अन्य मौकों पर भी जनता को उसके संवैधानिक दायित्वों से परिचित कराना चाहिए, ताकि सभी अपने हिस्से के दायित्वों का पालन कर सकें।
उसे अपने कर्तव्यों के प्रति सचेत रहने के साथ ही सामाजिक समरसता का भी ध्यान रखना होगा, क्योंकि देश को आगे ले जाने के लिए यह आवश्यक है। यह देखने में आता है कि औसत जनता न तो अपने अधिकारों के प्रति सचेत है और न ही नागरिक के रूप में अपने कर्तव्यों से। यह अज्ञानता जरूरी जानकारी से वंचित करने के साथ ही लोगों की समस्याएं भी बढ़ाती है। नियम-कानूनों के खिलाफ कुछ काम इसीलिए होते रहते हैं, क्योंकि लोग अपने अधिकारों और कर्तव्यों से अनजान होते हैं।
यह सही समय है कि स्कूलों और कालेजों में संविधान की बारीकियों को सरल रूप में पढ़ाया जाए। लोगों को संविधान की बारीकियों से परिचित कराने का काम केवल स्कूलों और कालेजों को ही नहीं, राजनीतिक दलों और सामाजिक संस्थाओं को भी अपने हाथ में लेना चाहिए।













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