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    जयललिता ने बैन की थी Vijay की फिल्म, अब उन्हीं की कुर्सी पर बैठे 'थलाइवा'; सालों पहले दिए थे राजनीति में आने के संकेत

    Updated: Sun, 17 May 2026 09:11 AM (IST)

    तमिलनाडु में जोसफ विजय (Joseph Vijay) की जीत अनायास ही नहीं, बरसों की मेहनत से बुना हुआ करिश्मा है। उनके पूर्ववर्ती एमजीआर और करुणानिधि की तरह इसकी इब ...और पढ़ें

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    जयललिता ने विजय की फिल्म को कर दिया था बैन

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    विनोद अनुपम, मुंबई। कुछ आंकड़े समय के साथ हम भूल जाते हैं, लेकिन कभी कभी धुंध को साफ करने के लिए उन्हें याद करना आवश्यक हो जाता है। यह महत्वपूर्ण है कि द्रमुक और अन्ना द्रमुक यानी करुणानिधि (Karunanidhi) और एम. जी. रामचंद्रन के परिवारों के मध्य बारी-बारी से झूलती तमिलनाडु की सत्ता स्वतंत्रता के बाद पहली बार एक कथित गैर राजनीतिक पृष्ठभूमि वाले व्यक्ति जोसफ विजय चंद्रशेखर तक पहुंची है।

    मुख्यमंत्री बनने वाले चौथे अभिनेता विजय

    तमिलनाडु की 234 विधानसभा सीटों के लिए पहली बार चुनाव लड़ रही विजय (Vijay) की पार्टी TVK (तमिलगा वेत्री कड़गम) 108 सीटें जीतकर विधानसभा में सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी। उल्लेखनीय है कि किसी भारतीय राज्य में मुख्यमंत्री पद तक पहुंचने वाले वे चौथे अभिनेता हैं। पहले अभिनेता जिन्होंने मुख्यमंत्री पद तक पहुंचने में सफलता पाई थी, वे एम. जी. रामचंद्रन थे।

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    1977 में तमिलनाडु विधानसभा के लिए पहली बार चुनाव लड़ रही उनकी पार्टी एआइएडीएमके ने स्पष्ट बहुमत की सरकार बनाई थी। तमिलनाडु में ही 1991 के विधानसभा चुनाव में अभिनेत्री रही जयललिता (Jayalalitha) के एआइएडीएमके के अलायंस ने दो तिहाई से भी अधिक बहुमत से सरकार बनाई।

    ऐसा ही चमत्कार 1983 में आंध्र प्रदेश में अभिनेता एन. टी. रामाराव ने कर दिखाया था,जब मात्र 9 महीने पहले गठित उनकी तेलगु देशम पार्टी ने 280 सदस्यों की विधानसभा में 201 सीटें हासिल कर सरकार बनाई।

    पिता ने किया था विजय को लॉन्च

    आज जोसफ विजय तमिल सिनेमा के सबसे लोकप्रिय कलाकारों में शुमार किए जाते हैं। उन्हें भारत में सबसे अधिक फीस लेने वाले अभिनेता भी कहा जाता है। उनके फैन क्लब पूरे तमिलनाडु में सक्रिय हैं। उनकी फिल्में 500-600 करोड़ तक की कमाई कर रही हैं। विजय के पिता एस. ए. चंद्रशेखर तमिल सिनेमा के प्रतिष्ठित निर्देशक थे, उन्होंने 1992 में 18 वर्ष की उम्र में ‘नालैया थिरुपु’ के साथ बेटे को लांच किया, मगर क्रिटीक्स और दर्शकों ने पूरी तरह फिल्म को नकार दिया।

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    इस फिल्म से मिली सफलता

    पिता ने उन्हें अभिनेता विजयकांत के साथ ‘सेंथूरपंडी’ में एक बार फिर मौका दिया, लेकिन यह फिल्म भी नकार दी गई। एक के बाद एक एस. ए. चंद्रशेखर विजय को मुख्य भूमिका में लेकर ‘रासिगन’, ‘देवा’, ‘विष्णु’ जैसी फिल्में बनाते गए। मगर विजय को सफलता बाहर के बैनर में मिलनी थी, जो उन्हें 1996 में सी. रंगनाथन के निर्देशन में बनी रोमांटिक कामेडी ‘कोयम्बटूर मैप्पिलाई’ से मिली और फिर विजय ने पीछे मुड़कर नहीं देखा।

    फिल्मों से ही देते रहे राजनीति में आने का हिंट

    तमिलनाडु में जहां हर कलाकार अपनी सिनेमाई सफलता को वोट में बदलने की इच्छा रखता है, चाहे वे एमजीआर, करुणानिधि, जयललिता हों या रजनीकांत और कमल हासन; जोसफ विजय के लिए भी यह महत्वाकांक्षा अस्वभाविक नहीं थी और हां, विजय को जब गैर-राजनीतिक कहा जाता है, तो स्वीकार करने में मुश्किल होती है, क्योंकि विजय के राजनीति में आने की लंबी तैयारी उनकी फिल्मों में ही दिख जाती है।

    फिल्मों में दिखाई भ्रष्ट राजनीति और आम लोगों की छवि

    ‘बदरी’, ‘कुशी’, ‘प्रियमानावले’, ‘फ्रेंड्स’, ‘शाहजहां’, ‘यूथ’, ‘वासीगारा’, ‘थारुमलाई’ जैसी मसाला फिल्मों की सफलता के बाद विजय ने अपनी फिल्मों में आम लोगों की छवि उतारने की कोशिश शुरू कर दी। एमजीआर और करुणानिधि की तरह उनकी फिल्मों में भी तमिलनाडु की भ्रष्ट राजनीति और एक उद्धारक की कहानी बार बार दोहराई जाने लगी।

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    अलग-अलग भूमिकाओं में विजय

    2004 के बाद विजय ने अधिकांश किरदार गरीब मजदूर, किसान के निभाए जिससे समाज के सबसे निचले तबके के लोग रिलेट कर सकते थे। 2005 में आई ‘सिवकासी’ में उन्होंने एक वेल्डर की भूमिका निभाई, जो आत्मसम्मान के लिए भ्रष्ट और आततायी विधायक से मुकाबला करता है। ‘थिरुपाची’ में उन्होंने लोहार की भूमिका निभाई, जो शहर आता है और अपराधियों के सफाए में लग जाता है।

    विजय के निभाए किरदारों की यह खासियत रही कि अधिकांश गरीब कमजोर होते हुए भी ताकतवर अत्याचारी से लड़ते हैं और जीत हासिल करते हैं। यह भी गौरतलब है कि उनके निभाए पात्र के सामने अत्याचारी भ्रष्ट व्यक्ति के रूप में हमेशा राजनेता ही दिखता था। 2010 में बनी ‘सुरा’ में विजय गांव में मदद करने वाले चहेते युवा बनते हैं तो उनके सामने होता है भ्रष्ट निरंकुश मंत्री, जिसके खिलाफ वे प्रतिरोध की आवाज बन कर खड़े होते हैं।

    जयललिता ने लगा दी थी विजय की फिल्म पर रोक

    ‘वेलायुधम’ में उनका मुकाबला भ्रष्ट गृहमंत्री से होता दिखता है तो ‘थेरी’ में श्रममंत्री से। आश्चर्य नहीं कि उनकी फिल्में ‘थलापति’ यानी कमांडर या ‘थलाइवा’ (नेता) के टायटल से आती है। ‘थलाइवा’ के राजनीतिक संदेश कितने स्पष्ट थे, इसी से समझ सकते हैं कि तत्कालीन जयललिता सरकार ने तमिलनाडु मे इसके रिलीज पर रोक लगा दी थी।

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    विजय की फिल्म 'थलाइवा' में 'Time to Lead' टैगलाइन का इस्तेमाल किया गया था। इससे AIADMK और उसकी नेता जयललिता इतनी नाराज हो गईं कि फिल्म को तमिलनाडु में बैन कर दिया गया।

    जन नायकन की रिलीज का इंतजार कर रहे दर्शक 

    विजय की आखिरी फिल्म ‘जन नायकन’ तो रिलीज नहीं हो पाई, लेकिन 2018 में आई ‘सरकार’ में उनके राजनीतिक हस्तक्षेप की इच्छा मुखर होते दिखती है। एनआरआइ उद्योगपति सुंदर के वोट के अवैध पड़ जाने से कहानी की शुरुआत होती है। व्यवस्था में सुधार के लिए सुंदर अपनी कंपनी छोड़कर अपने समर्थकों के साथ तमिलनाडु की सभी सीटों पर चुनाव लड़ने का निर्णय लेता है। अंततः बहुमत हासिल करता है, लेकिन जब मुख्यमंत्री बनने की बारी आती है तो स्वयं के बजाय अपने एक योग्य समर्थक को मुख्यमंत्री बनाने का निर्णय लेता है।

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    615 कमाने वाली ‘लियो’ (Leo) उनके करियर की सबसे कामयाब फिल्म है। लगभग 32 वर्षों की सिनेमाई यात्रा में विजय ने लियो (2023), वारिसु (2023), मास्टर(2021), बिगिल(2019), सरकार (2018), मर्सल (2017), थेरी (2016), कत्थी(2014), थुप्पाक्की(2012),पोक्किरी(2007) और घिल्ली (2004) जैसे कई मील के पत्थर खड़े किए। विजय ने 2025 में ‘जन नायकन’ (Jana Nayagan) के साथ फिल्मों से संन्यास की घोषणा कर दी।

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