61 साल पहले आया बॉलीवुड का वो गाना जो आजतक है अधूरा, मोहम्मद रफी की आवाज में बना कालजयी गीत
मोहम्मद रफी द्वारा 61 साल पहले बिना कभी शराब को हाथ लगाए एक ऐसा नशीला गाना गाया था जो आज तक लोगों को मदहोश करता आ रहा है। यह गाना सिर्फ दो शेरों से बन ...और पढ़ें
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समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
एंटरटेनमेंट डेस्क, नई दिल्ली। अगर हम आपसे कहें कि एक सिंगर जिसने कभी शराब को छुआ तक नहीं था उसने बॉलीवुड का सबसे आइकॉनिक और नशीला गाना गाया तो क्या आप विश्वास करेंगे? हम बात कर रहे हैं साल 1965 में आई फिल्म काजल (Kajal) के गीत छू लेने दो नाजुक होठों को (Chu Lene Do Najuk Hothon Ko) की।
दो लाइन की शायरी से बना गाना
इस सदाबहार गीत को जब मोहम्मद रफी ने गाया तो मानों उनकी उस मखमली, खनकती हुई आवाज ने दिल के तार हिला दिए। इस गीत के पीछे का एक और दिलचस्प किस्सा है कि ये गाना आज तक अधूरा है।
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दरअसल छू लेने दो नाजुक होठों को गाना सिर्फ एक गाना नहीं जादू के समान है। इसके बनने की कहानी किसी थ्रिलर से कम नहीं है। डायरेक्टर राम माहेश्वरी को एक सीन के लिए सिर्फ दो लाइन की शायरी चाहिए थीं। ये वो सीन था जिसमें राज कुमार, मीना कुमारी को शराब ऑफर करते हैं।
रवि साहब की धुन ने किया कमाल
महान शायर साधिर लुधियानवी ने अपनी कलम का जादू चलाया और दो बेहतरीन शेर लिख दिए। सबकुछ तय था कि ये सिर्फ एक डायलॉग होगा। लेकिन फिर स्टूडियो में कुछ ऐसा हुआ जिसने हमेशा के लिए इतिहास बदल दिया। म्यूजिक डायरेक्ट रवि साहब उन दो लाइनों के लिए एक बैकग्राउंड तैयार कर रहे थे। तभी अचानक उनके दिमाग में एक ऐसी मेलोडी आई जो सीधे रूह में उतरने वाली थी।
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उन्होंने डायरेक्टर से जिद की कि इसे सिर्फ शायरी न रहने दिया जाए। ये एक बेहतरीन गाना बन सकता है। डायरेक्टर को हिचकिचाहट महसूस हुई क्योंकि उन्हें लगा कि राजकुमार पर कोई रोमांटिक गाना सूट नहीं करेगा। उन्होंने शर्त रखी कि ठीक है गाना बना लो लेकिन सिर्फ इन्हीं दो शेरों का इस्तेमाल करना।
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माइक के सामने रफी जी ने कर दिया कमाल
रिकॉर्डिंग का दिन आया और माइक के सामने खड़े थे मोहम्मद रफी साहब। जैसे ही मोहम्मद रफी ने माइक पर अपनी आवाज का जादू बिखेरा स्टूडियो में मौजूद हर एक शख्स सन्न रह गया। रफी साहब की आवाज में जो दर्द, कशिश और मदहोशी थी वो किसी चमत्कार से कम नहीं थी। जैसी ही दो लाइनें खत्म हुईं स्टूडियो में बैठे प्रोड्यूसर्स और डिस्ट्रीब्यूटर्स तड़प उठे ऐसा लगा कि इसे और सुना जाए। उन्होंने डायरेक्टर को घेर लिया और कहा कि इतना सुंदर गाना और सिर्फ दो लाइने। हमें तीसरा अंतरा चाहिए।
साहिर लुधियानवी की खोज की वो तीसरी लाइन लिख दें लेकिन उस समय वो कही नहीं मिले। इस तरह इस गाने को ऐसे ही अधूरा रिकॉर्ड किया। रफी साहब ने बड़े ही स्टाइल से इसका अंत किया कि किसी को समझ ही नहीं आया कि ये अधूरा है। ऐसा लगा कि हीरो पर्दे पर नशे में डूबते हुए इसको गा रहा है। किसी को इसकी भनक भी नहीं लगी। क्या आपको कभी ऐसा महसूस हुआ?