40's की सबसे महंगी सिंगर, हैवान पति करता था मारपीट, खून के आंसू रोकर गाए गाने; 'कन्नड़ कोकिला' की दर्दभरी दास्तां
40 के दशक की 'क्वीन ऑफ मेलोडी' अमीरबाई कर्नाटिकी (Amirbai Karnataki) सिनेमा के उस दौर से आती हैं, जहां महिलाओं को कला के क्षेत्र में काम करने पर तवायफ ...और पढ़ें

40 के दशक की सुपरस्टार सिंगर की अनकही दास्तां
एंटरटेनमेंट डेस्क, नई दिल्ली। सिनेमा की चकाचौंध के पीछे इतने गहरे दर्द होते हैं कि शायद उस दर्द को बांटने वाले भी कम पड़ जाते हैं। आज हम आपको एक ऐसी ही दास्तां सुनाने जा रहे हैं, जहां टैलेंट ने उनके आगे सिर झुकाया पर अपनों की दर्दभरी बेड़ियों ने उन्हें ऐसा गिरफ्त में लिया कि उनकी जिंदगी बद्तर हो गई।
ये कहानी है 40 के दशक की 'क्वीन ऑफ मेलोडी' अमीरबाई कर्नाटिकी की, जो लता मंगेशकर से पहले सुपरस्टार थीं औऱ जिनकी आवाज पर उस दौर का पूरा हिंदुस्तान फिदा था, लेकिन कैसे उनकी जिंदगी घर की चारदीवारी में ही कैद होकर रह गई, आइए जानते हैं...
कौन थीं अमीरबाई कर्नाटिकी?
अमीरबाई कर्नाटिकी (amirbai karnataki) 40 के दशक की वो सिंगर थीं, जिन्हें सुपरस्टार सिंगर्स में से एक माना जाता था। 'कन्नड़ कोकिला' के नाम से मशहूर अमीरबाई का जन्म कर्नाटक में 1912 में हुआ था। हालांकि उनके जन्म का कोई ऑफिशियल रिकॉर्ड नहीं है, पर हां कहा जाता है कि वो कर्नाटक के बीजापुर में जन्मीं थीं।
यह भी पढ़ें- 3 दिन तक सड़ती रही लाश... छोटी बहन से पति का था अफेयर; दर्दनाक है 700 फिल्मों वाली पहली हीरोइन की कहानी
-1772543070313.jpeg)
बताया जाता है कि, उनकी बहन गौहरबाई भी एक मशहूर गायिका थीं। उनके माता-पिता थिएटर से जुड़े थे। ऐसे में सिनेमा और कला का माहौल उन्हें बचपन से ही मिल गया था। पांच भाई-बहनों में से अमीरबाई और उनकी बहन गौहरबाई ने भारतीय शास्त्रीय संगीत की बाकायदा शिक्षा ली थी। आगे चलकर गौहरबाई ने 'बाल गंधर्व नाटक मंडली' में काम किया और बाद में उन्हीं (बाल गंधर्व) से शादी कर ली। गौहरबाई के नाम कई सुपरहिट मराठी गाने भी दर्ज हैं।
अमीबाई के करियर का वो सुनहरा दौर
अमीरबाई 1930 के दशक में बीजापुर से मुंबई आ गईं, जहां गौहरबाई ने उनकी मदद की और 1935 में आई फिल्म 'विष्णु भक्ति' में उन्हें रोल दिलवाया। इसके बाद अमीरबाई ने 'सरदार' (1940), 'दर्शन' (1941) और 'स्टेशन मास्टर' (1942) जैसी कई फिल्मों में बतौर एक्ट्रेस काम किया। इन फिल्मों में एक्टिंग करने के बाद किसी को नहीं लगा कि अमीरबाई इतना अच्छा अभिनय कर सकती हैं। हालांकि इन फिल्मों से उन्हें कोई बड़ी शोहरत नहीं मिली। इस बीच उन्होंने साल 1936 में फिल्म जमाना के लिए गाना गाया और इसी से उन्हें बड़ा ब्रेक भी मिला।
-1772543105954.jpeg)
फिर साल 1943 में उनकी 'किस्मत' बदली। अशोक कुमार और मुमताज शांति की फिल्म 'किस्मत' में अमीरबाई को गाने का मौका मिला। फिल्म 'किस्मत' के सभी गाने जबरदस्त हिट रहे और आखिरकार अमीरबाई को वह नाम, शोहरत और लोकप्रियता मिल गई, जिसकी वे हकदार थीं। ये फिल्म हिंदी सिनेमा की पहली ब्लॉकबस्टर फिल्म मानी गई। इसी फिल्म से अशोक कुमार भी स्टार बने।
फिल्म का गाना 'दूर हटो ऐ दुनियावालों' काफी हिट रहा और इस गाने को ब्रिटिश हुकूमत ने हटाने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगाया था। कहा तो यह भी जाता है कि इस फिल्म ने उस दौर में 1 करोड़ कमाए थे।
-1772543156009.jpeg)
सबसे महंगी गायिका बनीं
40 के दशक में अमीरबाई का सिक्का चल पड़ा था। उन्होंने फिल्मों में अभिनय तो इसके अलावा उन्होंने कई गानों को भी अपनी आवाज दी। कहा जाता है कि वो उस दौर की सबसे महंगी गायिकाओं में से एक थीं। ओ जाने वाले बालमवा', 'धीरे-धीरे आ रे बादल' जैसे गानों ने उन्हें उस दौर की सबसे महंगी गायिका बना दिया था। अगर कुछ जानकारों की मानें तो उस दौर में अमीरबाई एक गान के लिए एक हजार रुपए लिया करती थीं, जो कि वाकई में एक बड़ी रकम थी।
लता मंगेशकर के आने के बाद ढलान पर आया करियर
अमीरबाई के करियर का सुनहरा दौर चल ही रहा था। इसी बीच सिनेमा में आईं लता मंगेशकर। 1950 के दशक तक आते-आते हिंदी फिल्मों में अमीरबाई का बतौर प्लेबैक सिंगर करियर लगभग खत्म हो चुका था। इसके बावजूद उन्होंने फिल्मों में अभिनय करना जारी रखा, हालांकि अब उन्हें मुख्य भूमिकाओं के बजाय फिल्मों में कैरेक्टर रोल्स मिलने लगे थे। वो छोटे-छोटे रोल्स करने लगीं थीं।
लता मंगेशकर (Lata Mangeshkar) ने 'महल' और 'अंदाज़' जैसी फिल्मों से धमाका किया, तो अमीरबाई जैसी भारी और शास्त्रीय गायिकाओं (Lata Mangeshkar Songs) की मांग भी कम होने लगी। संगीत बदल रहा था और अमीरबाई ने खुद को धीरे-धीरे गायकी से दूर कर लिया।
हालांकि वो एक्टिंग में जरूर रमी रहीं। एक अभिनेत्री के रूप में उन्होंने 'लव कुश' (1951), 'दीवाना' (1952), 'वीर अर्जुन' (1952), 'आंसू' (1953), 'सुबह का तारा' (1954), 'शहीद-ए-आजम भगत सिंह' (1954), 'डार्क स्ट्रीट' (1961) और 'जादुई अंगूठी' (1964) जैसी कई फिल्मों में काम किया। बड़ी बात यह है कि इनमें से कई फिल्मों में उन्होंने गाना भी गाया।
शादी के बाद बर्बाद हुई जिंदगी
अमीरबाई ने उस दौर में लड़कियों के हक के लिए लड़ाई लड़ी। उस दौर में जो भी महिलाएं सिनेमा में गायिकी या एक्टिंग करने आती थीं, उन्हें वैश्या मान लिया जाता था लेकिन अमीरबाई उनके लिए लड़ीं। पर किस्मत का जोर तो देखिए उनकी खुद की जिंदगी शादी के बाद नर्क बन गई। उन्होंने 1940 के दशक के मशहूर विलेन हिमालयवाला (अफजल कुरैशी) से शादी की थी। वो उस दौर में कई फिल्मों में विलेन का किरदार निभाते थे। पर्दे पर विलेन का किरदार निभाने वाले हिमालयवाला अमीरबाई के जीवन के पति से ज्यादा विलेन ही निकले।
अमीरबाई का जीवन शादी के बाद सिर्फ तकलीफों से भरा रहा। पति उनके साथ रोज मारपीट करता। इसके अलावा अमीरबाई के पैसों पर हिमालयवाला अपनी जिंदगी जीने लगा। अमीरबाई ने तंग आकर अपने पति को एक ऑफर दिया और कहा कि, 'सुनो तुम पैसे ले लो और एक कार ले लो, लेकिन मुझे छोड़ दो।' पति भी अमीरबाई की ये बात मान गया। इसके बाद अमीरबाई को लगा कि अब उनकी जिंदगी सुकून से बीतेगी मगर ऐसा नहीं हुआ।
एक दिन अमीरबाई स्टूडियों में गाने पहुंचीं तो उनका पति भी वहीं पहुंच गया और स्टूडियो से उनका अपहरण करके घर ले आया और फिर उन्हें कमरे में बंद करके बहुत मारा। आखिरकार में अमीरबाई ने अदालत का सहारा लिया और पति से तलाक लिया। इसके बाद अमीरबाई ने बद्री कांचनवाला दूसरी शादी की। उधर उनका एक्स पति हिमालयवाला विभाजन के बाद पाकिस्तान चला गया और वहां की फिल्मों में बड़ा स्टार बना।
महात्मा गांधी भी थे अमीरबाई के मुरीद
कम ही लोग जानते हैं कि अमीरबाई की सिंगिंग के राष्ट्रपिता महात्मा गांधी भी फैन थे। दरअसल अमीरबाई ने अपने करियर में कई भजन भी गाए थे और इन्हीं में से उनका एक भजन था 'वैष्णवजन तो तेने कहिए'। इस गाने को अमीरबाई ने ही अपनी आवाज दी थी। ये भजन गांधी जी के पसंदीदा भजनों में से एक था और वह इसे खूब सुनते थे। यही वजह है कि उन्होंने अमीरबाई की सराहना भी की थी। इसके अलावा उन्होंने खुद इसे कई मौकों पर भी गाया था।
गुमनामी में हुई अमीरबाई की मौत
अमीरबाई ने अपने गृहक्षेत्र बीजापुर में एक टॉकीज भी बनवाया था। गायिकी में जब उनका करियर नहीं चला तो उन्होंने सिनेमा से दूरी बना ली। धीरे-धीरे वो गुमनाम होती गईं। साल 1965 में उन्हें पैरालिसिस अटैक आया। इसके बाद वो कई दिनों तक इससे लड़ती रहीं। आखिरकार 3 मार्च को अमीरबाई का निधन हो गया। वो सिंगर, जो कभी सुपरस्टार रहीं, महंगी फीस ली, महिलाओं को सम्मान दिलाया, फिल्मों में भी काम किया, आखिरकार वो गुमनामी के अंधेरे में खो गईं और उनका महज 55 साल की उम्र में निधन हो गया।
आज हिमालय की चोटी से फिर हम ने ललकारा है,
— आरती सिंह (@AarTee33) January 26, 2026
दूर हटो ऐ दुनिया वालों, हिन्दुस्तान हमारा है..!!#गणतंत्र_दिवस 🇮🇳 #लेखनी ✍️#RepublicDay
🎬 क़िस्मत (1943)
🖋️ कवि प्रदीप 🎵 अनिल बिस्वास
🎤 अमीरबाई कर्नाटकी । ख़ान मस्ताना
🎞️ मुमताज़ शांति । अशोक कुमार@madhuleka… pic.twitter.com/sGa2bvb0yg
अमीरबाई ने अपने करियर में करीब कुल 150 फिल्में (Old Bollywood Movies) कीं और करीब 380 से ज्यादा (Old Songs) गाने गाए। अमीरबाई ने उस दौर के दिग्गज संगीतकारों के साथ-साथ गुमनाम कंपोजर्स के साथ भी काम किया। उनकी सबसे प्रमुख जोड़ी नौशाद और खेमचंद प्रकाश के साथ रही, जिन्होंने उनके लिए कई बेहद सुरीले और यादगार गाने तैयार किए।
धीरे धीरे आ रे बादल धीरे आ रे बादल धीरे धीरे जा मेरा बुलबुल सो रहा है शोर-गुल न मचा
— ashish bhatt (@ashishb15531661) February 6, 2025
फ़िल्म-किस्मत (1943)
स्वर-अरुण कुमार, अमीरबाई कर्नाटकी
गीत-प्रदीप
संगीत-अनिल बिस्वास#कवि_प्रदीप #जन्मजयंती#लेखनी @AarTee33 @arorafbd @Jagdarshan1 pic.twitter.com/StPVoyNVmy
हालांकि, उनके करियर की पहली बड़ी सफलता संगीतकार अनिल विश्वास के साथ आई, जिन्होंने साल 1943 में उनके हुनर को पूरी दुनिया के सामने चमकाया। बाद में उन्होंने एस. डी. बर्मन, सी. रामचंद्र और गुलाम मोहम्मद जैसे कई दिग्गज संगीतकारों के लिए भी अपनी आवाज़ दी।
उनके गाए कुछ गाने आज भी लोगों की जुबान पर हैं, तो कुछ वक्त के साथ भुला दिए गए। लेकिन आज भी उनके ज्यादातर गाने अगर जीवित हैं और सुने जाते हैं, तो उसका श्रेय अमीरबाई की गायकी के उस खास अंदाज़ और उनकी परफेक्शन को जाता है। आज इसीलिए सालों बाद भी अमीरबाई (Amirbai Songs) की बनाई विरासत सिनेमा में आज भी शान से खड़ी है।
कमेंट्स
सभी कमेंट्स (0)
बातचीत में शामिल हों
कृपया धैर्य रखें।