Prahaar Review: कसाब को फांसी दिलाने की जंग, 'प्रहार' में राजकुमार राव ने फूंकी जान; कहां चूकी फिल्म?
Prahaar Film Review: अजमल कसाब को फांसी दिलाने वाले वकील उज्ज्वल निकम की बायोपिक 'प्रहार' में राजकुमार राव मुख्य भूमिका ...और पढ़ें

राजकुमार राव की प्रहार फिल्म का रिव्यू
HighLights
उज्ज्वल निकम की बायोपिक है प्रहार
26/11 हमले के इर्द-गिर्द घूमती है कहानी
राजकुमार की परफॉर्मेंस है शानदार
एंटरटेनमेंट डेस्क, नई दिल्ली। मुंबई में हुए 26/11 आतंकी हमले की कहानी कई बार पर्दे पर दिखाई गई है, कभी इसे पुलिस की जांबाजी के चश्मे से दिखाया गया, तो कभी डॉक्टर्स के संघर्ष के जरिए। अब एक बार फिर 26/11 के दर्द को कोर्टरूम के जरिए पेश किया गया है।
18 साल पहले हुए 26/11 आतंकी हमले में अजमल कसाब (Ajmal Kasab) इकलौता आतंकी था, जिसे जिंदा पकड़ा गया था। उसे फांसी की सजा दिलाने के लिए वकील उज्ज्वल निकम (Ujjwal Nikam) ने एड़ी चोटी का दम लगा दिया था।
अब इस कहानी को बड़े पर्दे पर अविनाश अरुण धवारे लेकर आए हैं। सिनेमाघरों में रिलीज होने वाली 'प्रहार: द अनटोल्ड स्टोरी ऑफ उज्ज्वल निकम' (Prahaar: The Untold Story of Ujjwal Nikam Review) कैसी है, यहां पढ़ें रिव्यू...

क्या है 'प्रहार' फिल्म की कहानी?
'प्रहार: द अनटोल्ड स्टोरी ऑफ उज्ज्वल निकम' की कहानी की शुरुआत 26/11 के हमले से होती है और फिर आतंकी अजमल कसाब (ललित प्रभाकर) को गिरफ्तार कर लिया जाता है। इसके बाद शुरू होती है कसाब (Kasab) को फांसी दिलाने के लिए कानूनी लड़ाई लड़ी।
अजमल कसाब को फांसी के फंदे तक पहुंचाने के लिए मशहूर वकील उज्ज्वल निकम (राजकुमार राव) कानूनी लड़ाई शुरू करते हैं लेकिन यह इतना आसान नहीं होता है। कसाब अपने बयानों से गुमराह करता है। कभी खुद की उम्र 17 वर्ष बताता है तो कभी कहता है कि वह मुंबई एक्टर बनने आया था। वह अपने बयानों से गुमराह करने की कोशिश करता है।

फिल्म में उज्ज्वल निकम की प्रोफेनल लाइफ के साथ-साथ उनकी निजी जिंदगी भी दिखाई जाती है। निकम की राह पर चल रहे उनके बेटे से उनकी अनबन चल रही होती है वहीं उनकी पत्नी कैंसर से जूझ रही होती है। निजी जिंदगी के संघर्षों के साथ-साथ क्या उज्ज्वल कैसे कसाब को फांसी के फंदे तक पहुंचाते हैं कहानी इसी इर्द-गिर्द घूमती है।
कैसा है फिल्म का निर्देशन और स्क्रीनप्ले?
फिल्म की कहानी अच्छी है, लेकिन इसे दिखाने का तरीका और बेहतर हो सकता था। 'पाताल लोक' और 'प्रीतम एंड पेड्रो' जैसी सीरीज का निर्देशन कर चुके अविनाश अरुण धवारे कहानी में इमोशन नहीं ला पाए, खासकर पहले हाफ में। 26/11 की घटना का दर्द सीधे दिल में नहीं उतर पाता जिससे कहानी से इमोशनल कनेक्शन नहीं जुड़ता।

पहला हाफ बहुत स्लो है और वह सीधे कोर्ट की प्रोसीडिंग से शुरू हो जाता है। 26/11 आतंकी हमले की दर्दनाक घटना को दूसरे हाफ में दिखाई जाता है। दूसरे हाफ में फिल्म सही ट्रैक पर चलती है। फिल्म का संगीत खास असरदार नहीं है, लेकिन डायलॉग्स ठीक-ठाक हैं।
राजकुमार-वामिका ने जीता दिल
राजकुमार राव उज्ज्वल निकम की भूमिका को जीया है। वह जब भी पर्दे पर आते हैं तो उनकी आंखों में 26/11 का गुस्सा साफ दिखता है। उन्होंने इस किरदार में जान फूंक दी है। उज्ज्वल निकम की पत्नी की भूमिका में नजर आईं वामिका गब्बी (Wamiqa Gabbi) ने भी शानदार काम किया है।
वहीं, जयदीप अहलावत जब-जब स्क्रीन पर आते हैं वो अपना प्रभाव छोड़कर जाते हैं। सिकंदर खेर समेत बाकी सह-कलाकारों ने भी अपने किरदारों के साथ न्याय किया है।
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कहां रह गई कमी?
फिल्म के डायरेक्शन से लेकर, स्क्रीनप्ले, सिनेमैटोग्राफी, बैकग्राउंड म्यूजिक, और डायलॉग्स इन सबको मिलाकर कहानी को और दमदार बनाया जा सकता था जिससे ऐतिहासिक घटना पर बनी यह फिल्म और प्रभावशाली लगती। क्योंकि सिर्फ एक अच्छी कहानी और अच्छे एक्टर्स होने के साथ-साथ उसे उतने ही प्रभावशाली अंदाज में पर्दे पर उतारना भी जरूरी होता है।
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फाइनल वर्डिक्ट
अगर आप राजकुमार राव के फैन हैं और आपको पर कोर्ट रूम ड्रामा देखना पसंद है वहीं आपके पास देखने के लिए कोई दूसरा बेहतर विकल्प नहीं है, तो आप उज्ज्वल निकम की कहानी प्रहार देख सकते हैं। लेकिन अगर आप इस फिल्म से 26/11 जैसी ऐतिहासिक घटना की एक दमदार और दिल को झकझोरने वाली कहानी की उम्मीद कर रहे हैं, तो शायद आपको थोड़ी निराशा हो सकती है।
