80 साल पुराना विवाद खत्म... क्या है किशाऊ बांध परियोजना, जिससे हरियाणा को मिलेगा पानी और हिमाचल के बचेंगे ₹2000 करोड़?
हरियाणा और हिमाचल के लिए किशाऊ बहुउद्देशयी बांध परियोजना से काफी फायदा होगा। जहां हिमाचल के करीब दो हजार करोड़ रुपये बचेंगे। वहीं, हरियाणा को पर्याप्त यमुना का जल मिलेगा।

कुशाऊ बांध परियोजना को लेकर मंगलवार को हुई बैठक (जागरण ग्राफिक्स)
HighLights
अमित शाह के साथ हुई 6 मुख्यमंत्रियों की बैठक
हरियाणा को खेती और बिजली के लिए पर्याप्त यमुना का जल मिलेगा
टोंस नदी पर 233 मीटर ऊंचा कंक्रीट का ग्रेविटी डै बनाया जाएगा
डिजिटल डेस्क, पंचकूला। नई दिल्ली में मंगलवार को छह राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह के साथ किशाऊ बांध परियोजना (Kishau Dam Agreement) को लेकर बैठक की। इस मीटिंग में 80 वर्षों से लंबित जल विवाद पर चर्चा हुई और सभी नेताओं ने एक निष्कर्ष पर पहुंचकर इसका हल निकाला।
मीटिंग में क्या हुआ, केंद्रीय मंत्री से किन-किन राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने मुलाकात की। हिमाचल और हरियाणा (Haryana Water Project) के लिए यह परियोजना क्यों आवश्यक है और सबसे जरूरी यह किशाऊ बांध परियोजना क्या है?
इन सभी सवालों के जवाब आज हम इस लेख के जरिए जानेंगे। इसके साथ ही यह भी जानेंगे कि हिमाचल और हरियाणा के अलावा राजधानी दिल्ली को इस प्रोजेक्ट से क्या फायदा होगा।

नई दिल्ली में छह राज्यों के मुख्यमंत्रियों के साथ हुई बैठक
परियोजना को लेकर मंगलवार को नई दिल्ली में आयोजित इस बैठक में केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह एवं केंद्रीय जल शक्ति मंत्री सीआर पाटिल के साथ उत्तराखंड मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी, दिल्ली मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता, राजस्थान मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और हिमाचल मुख्यमंत्री सुखविंद्र सिंह सुक्खू व हरियाणा के मुख्यमत्री नायब सिंह ने हिस्सा लिया।
क्या है किशाऊ बांध परियोजना?
किशाऊ एक बहुउद्देशयी बांध परियोजना है। इसका उद्देश्य यमुना और उसकी सहायक नदियों के पानी को राज्यों के बीच वितरण करना था।
सभी राज्यों को उनकी जरूरत के अनुसार पर्याप्त पानी मिल सके, इसलिए बैठक का आयोजन हुआ। साल 2008 में ही इस परियोजना को राष्ट्रीय प्रोजेक्ट घोषित कर दिया गया था, लेकिन राज्यों की असहमतियों के बीच यह परियोजना लंबित रही।
80 वर्षों से था विवाद...
किशाऊ प्रोजेक्ट की परिकल्पना आजादी से पहले साल 1940 में की गई थी। सन् 1945 में तत्कालीन पंजाब सरकार ने इसका सर्वे भी करवाया। लेकिन बाद में इसे रोक दिया गया।
कुछ समय बाद परियोजना से जुड़ी फाइल तैयार की गई। लेकिन मामला फिर ठंडे बस्ते में चला गया और तब से लेकर अब तक कभी राज्यों का विभाजन तो कभी कोई असहमतियां... इस परियोजना को अमलीजामा पहनाया ही नहीं जा सका।

अब बैठक में क्या हुआ?
मंगलवार को आयोजित बैठक में तय हुआ कि किशाऊ बांध परियोजना के अंतर्गत दिल्ली को यमुना के जरिए पानी दिया जाएगा। इसके साथ ही 97 हजार हेक्टेयर जमीन पर सिंचाई होगी और 148 करोड़ यूनिट पन-बिजली का उत्पादन किया जाएगा।
वहीं, हिमाचल और उत्तराखंड बॉर्डर के पास टोंस नदी पर 233 मीटर ऊंचा कंक्रीट का ग्रेविटी डै बनाया जाएगा। इसमें 156 करोड़ घन मीटर पानी स्टोर किया जा सकेगा। इसके तहत पानी को राज्यों के बीच वितरित कर दिया जाएगा। जिसका इस्तेमाल राज्य अपने अनुसार सिंचाई, बिजली बनाने और अन्य गतिविधियों में कर सकेंगे।
इस परियोजना के खर्च का 90 प्रतिशत वित्तीय भार केंद्र द्वारा और शेष राज्यों द्वारा वहन किया जाएगा।
हरियाणा के लिए क्या है परियोजना का महत्व?
हरियाणा के लिए इन परियोजनाओं का महत्व इसलिए अधिक है क्योंकि राज्य ऊपरी यमुना में भंडारण बढ़ाने की मांग करता रहा है।
साल 2018 में लखवार परियोजना पर राज्यों में सहमति बनी। रेणुकाजी परियोजना के क्रियान्वयन के लिए 2019 में समझौता हुआ। दोनों परियोजनाओं से यमुना में पानी बढ़ने की उम्मीद है। साल 2026 में हरियाणा-राजस्थान में 1994 के यमुना जल समझौते को लागू करने को अलग एमओयू हुआ था।

मुख्यमंत्री नायब सैनी ने कहा कि यमुना में हरियाणा की हिस्सेदारी 48 प्रतिशत है। इसलिए यमुना बेसिन में पानी की उपलब्धता बढ़ने का सीधा लाभ प्रदेश को मिलेगा।
किशाऊ के साथ रेणुकाजी और लखवार परियोजनाएं भी हरियाणा के लिए महत्वपूर्ण हैं। रेणुकाजी और लखवार पर काम पहले बांट दिया गया और नदी के लिए कुछ नहीं छोड़ा गया।
अब किशाऊ परियोजना समझौते से 25 फीसदी से चल रहा है, जबकि अब किशाऊ परियोजना के निर्माण का रास्ता भी साफ हो गया है। तीनों परियोजनाओं से कुल 2676 क्यूसेक पानी की उपलब्धता बढ़ेगी, जिसमें 1280 क्यूसेक हरियाणा के हिस्से में आएगा। इन परियोजनाओं से हरियाणा को करीब 1143 एमसीएम पानी मिलेगा।
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हिमाचल के लिए क्या है परियोजना का महत्व?
किशाऊ बहुउद्देशीय परियोजना में हिमाचल ने बिना निवेश बड़ा आर्थिक लाभ हासिल किया है। परियोजना में अपने हिस्से की बिजली के लिए हिमाचल को करीब 2000 करोड़ रुपये खर्च करने थे, लेकिन अब यह लागत दिल्ली, राजस्थान और हरियाणा वहन करेंगे। हिमाचल को परियोजना से सालाना करीब 1000 मिलियन यूनिट बिजली (अनुमानित कीमत 1200 करोड़ रुपये से अधिक) मिलेगी।

केंद्रीय गृह मंत्री की अध्यक्षता में हुई उच्चस्तरीय बैठक में केंद्र ने सैद्धांतिक रूप से दिल्ली, राजस्थान और हरियाणा द्वारा लागत वहन करने पर सहमति दी थी।
पिछली सरकार ने राज्य के हिस्से के रूप में 800 करोड़ रुपये देने पर सहमति जताई थी, लेकिन वर्तमान सरकार ने प्रदेश के सीमित संसाधनों और विस्थापित होने वाले लोगों के हितों को देखते हुए इसे स्वीकार नहीं किया।
मुख्यमंत्री के अनुसार परियोजना बनने के बाद हिमाचल को बिजली घटक से सालाना 1000 मिलियन यूनिट बिजली मिलेगी, जिसकी अनुमानित कीमत 1200 करोड़ रुपये से अधिक है।
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