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मंगल मुद्दा: नदी पर पुल नहीं, खतरे में नौनिहालों की जिंदगानी; शिक्षा और सड़क के लिए संघर्ष करते ग्रामीण

Published: Tue, 08 Sep 2026 02:50 PM (IST)

झारखंड के ग्रामीण इलाकों में बुनियादी सुविधाओं की कमी से विकास के दावे खोखले साबित हो रहे हैं, जहां बच्चों ...और पढ़ें

विकास के दावों की पोल खोलती झारखंड की जमीनी हकीकत। तस्वीर तरा के उललवार गांव में छोटकी नदी की।

विकास के दावों की पोल खोलती झारखंड की जमीनी हकीकत। तस्वीर तरा के उललवार गांव में छोटकी नदी की।

HighLights

  1. चतरा के उललवार गांव में पुल न होने से बच्चे जान जोखिम में।

  2. झारखंड के ग्रामीण इलाकों में सड़क, स्वास्थ्य, पेयजल का अभाव।

  3. प्रशासनिक उदासीनता से विकास के दावे कागजी, ग्रामीण संघर्षरत।

जागरण टीम, चतरा/रांची। झारखंड के सुदूर ग्रामीण और आदिवासी बहुल इलाकों में विकास के तमाम दावे कागजी साबित हो रहे हैं। राज्य के विभिन्न जिलों की जमीनी तस्वीरें प्रशासनिक तंत्र और व्यवस्था की पोल खोल रही हैं।

चतरा जिले के कुंदा प्रखंड अंतर्गत नवादा पंचायत के उललवार गांव की घटना इसका ताजा और ज्वलंत उदाहरण है, जहां आज भी बुनियादी सुविधाओं का घोर अभाव है। प्रशासनिक अधिकारियों व स्थानीय जनप्रतिनिधियों को पहल करनी चाहिए।

उललवार गांव की बानगी और बच्चों का संघर्ष

चतरा के उललवार गांव में छोटकी नदी पर पुल न होने के कारण उत्क्रमित प्राथमिक विद्यालय के छोटे-छोटे बच्चों को रोजाना अपनी जान जोखिम में डालकर स्कूल पहुंचना पड़ता है। बरसात के दिनों में जब नदी का जलस्तर बढ़ जाता है, तब स्थिति और भी भयावह हो जाती है।

इसके अलावा, गांव तक आज तक पक्की सड़क का निर्माण नहीं हो पाया है, जिससे आपातकालीन स्थिति में एम्बुलेंस या अन्य वाहन गांव तक नहीं पहुंच पाते। ग्रामीणों की बार-बार गुहार के बावजूद प्रशासन और जनप्रतिनिधियों की ओर से अब तक इस समस्या का कोई स्थायी समाधान नहीं निकाला गया है।

झारखंड के अन्य जिलों में बुनियादी सुविधाओं का हाल

  • दुमका (शिकारीपाड़ा और कांटाजोर क्षेत्र): कई ग्रामीण इलाकों में पुल-पुलियों के अभाव में स्कूली बच्चों को उफनती नदियों और बरसाती नालों को तैरकर या लकड़ी के अस्थायी चंचले पुलों के सहारे पार करना पड़ता है। बारिश के दिनों में कई स्कूलों में बच्चों की उपस्थिति नगण्य हो जाती है।
  • गढ़वा (भंडरिया और रंका प्रखंड): पहाड़ी और दुर्गम भौगोलिक स्थिति वाले इन क्षेत्रों के दर्जनों गांवों में आज भी सड़कों का जाल नहीं बिछ पाया है। स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली का आलम यह है कि गर्भवती महिलाओं और गंभीर मरीजों को मुख्य सड़क तक लाने के लिए खाट या डोली का सहारा लेना पड़ता है।
  • गुमला और सिमडेगा के सुदूरवर्ती इलाके: शंख और दक्षिण कोयल नदी के तटवर्ती कई गांवों में पुल के अभाव में लोग जान हथेली पर लेकर नाव से सफर करने को मजबूर हैं। पुल के अभाव में उच्च शिक्षा के लिए जाने वाले विद्यार्थियों को भी रोजाना भारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।
  • पलामू और लातेहार: जंगली और पहाड़ी इलाकों की पंचायतों में आज भी कई ऐसे बसावटें हैं जहां पेयजल, बिजली और सड़क जैसी मूलभूत सुविधाएं नदारद हैं। चुनाव के वक्त वादे तो बड़े-बड़े किए जाते हैं, लेकिन धरातल पर स्थिति जस की तस बनी रहती है।

बोकारो के भी ऐसी तस्वीर आई थी। यह स्थिति सिर्फ एक गांव या एक जिले की नहीं, बल्कि पूरे झारखंड के ग्रामीण विकास मॉडल पर एक बड़ा और गंभीर सवालिया निशान लगाती है। राज्य के प्रशासनिक अधिकारियों को इन बुनियादी समस्याओं पर ध्यान देना होगा। 

आखिर कब तक झारखंड के नौनिहाल शिक्षा हासिल करने के नाम पर अपनी जिंदगी दांव पर लगाते रहेंगे? डिजिटल और विकसित भारत के दौर में उललवार जैसे गांवों की ये तस्वीरें व्यवस्था के माथे पर एक गहरा कलंक हैं, जिस पर त्वरित और ठोस कार्रवाई की सख्त जरूरत है।

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