स्पेस स्टेशन, सर्विसिंग, फ्यूलिंग… हर मिशन में सहायक होगा NIT जमशेदपुर का ROBOTIC फार्मूला
एनआईटी जमशेदपुर के छात्रों ने एक रोबोटिक फार्मूला बनाया है, जो अंतरिक्ष स्टेशन पर सर्विसिंग और फ्यूलिंग जैसे कार्यों में मदद करेगा। यह आविष्कार अंतरिक्ष मिशनों को आसान बनाएगा और अंतरिक्ष अनुसंधान को बढ़ावा देगा। मैकेनिकल इंजीनियरिंग विभाग के छात्रों ने इसे विकसित किया है, जो अंतरिक्ष में विभिन्न कार्य करने में सक्षम है।

फाइल फोटो ।
धरती पर किसी भी मशीन को स्थिर आधार मिलता है, लेकिन अंतरिक्ष में पैर जमाने की जगह नहीं होती। न्यूटन के नियम के अनुसार, जब भी स्पेसक्राफ्ट का रोबोटिक हाथ किसी दिशा में चलता है, तो यान विपरीत दिशा में हिलने लगता है। इसे बेस डिस्टर्बेंस कहा जाता है।
एनआईटी के शोध में दो आधुनिक तकनीकों का समावेश किया गया
2 जेनेटिक एल्गोरिदम (GA) - प्रकृति में पीढ़ियों के साथ आने वाले सुधार की तरह यह सिस्टम खुद सीखकर अपना प्रदर्शन बेहतर करता चलता है।
इन स्मार्ट एल्गोरिदम की मदद से रोबोटिक हाथ यह समझ पाता है कि किस रास्ते, किस गति और किस दिशा में चलते हुए लक्ष्य तक पहुंचना है, ताकि स्पेसक्राफ्ट के संतुलन को कोई नुकसान न पहुंचे। शोध में पाया गया कि यह नया तरीका पुराने PID सिस्टम की तुलना में कई गुना ज्यादा स्थिर और ऊर्जा-कुशल है।
इसरो के भविष्य के मिशनों के लिए क्यों खास है यह तकनीक?
भारत आने वाले वर्षों में अपना खुद का स्पेस स्टेशन बनाने, पुराने उपग्रहों की कक्षा में मरम्मत करने और स्पेस-सेवा मिशनों को अंजाम देने की तैयारी कर रहा है। ऐसे मिशनों में कई बार दो या अधिक रोबोटिक हाथों को एक साथ मिलकर बेहद जटिल कार्य करने पड़ते हैं।
उदाहरण के लिए एक रोबोटिक हाथ सैटेलाइट का नट खोलता है, दूसरा पार्ट बदलता है और तीसरा ईंधन टैंक में नोजल सेट करता है।
एनआईटी की नई तकनीक Co-operative Redundant Space Manipulators यानी मिल-जुलकर काम करने वाले बहुआर्म रोबोट सिस्टम को नियंत्रित करने में विशेष रूप से उपयोगी है। इससे मिशन की सुरक्षा और गति दोनों में भारी सुधार होगा।
जब रोबोटिक हाथ के हलचल से यान विचलित नहीं होगा, तो उसे खुद को सीधा करने के लिए बार-बार थ्रस्टर्स चालू नहीं करने पड़ेंगे।
इसका सीधा फायदा यह हाेगा कि मिशन का ईंधन बचेगा, यान की उम्र बढ़ेगी, लागत कम होगी और जोखिम घटेगा।
इस तकनीक का उपयोग अंतरिक्ष में बड़े ढांचे जोड़ने (असेंबली), स्वत: संचालित स्पेस मिशनों (ऑटोनॉमस ऑपरेशंस), पुराने सैटेलाइट में दोबारा ईंधन भरने और जटिल मरम्मत अभियानों में किया जा सकता है।

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