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    स्पेस स्टेशन, सर्विसिंग, फ्यूलिंग… हर मिशन में सहायक होगा NIT जमशेदपुर का ROBOTIC फार्मूला

    Updated: Sat, 29 Nov 2025 06:24 PM (IST)

    एनआईटी जमशेदपुर के छात्रों ने एक रोबोटिक फार्मूला बनाया है, जो अंतरिक्ष स्टेशन पर सर्विसिंग और फ्यूलिंग जैसे कार्यों में मदद करेगा। यह आविष्कार अंतरिक्ष मिशनों को आसान बनाएगा और अंतरिक्ष अनुसंधान को बढ़ावा देगा। मैकेनिकल इंजीनियरिंग विभाग के छात्रों ने इसे विकसित किया है, जो अंतरिक्ष में विभिन्न कार्य करने में सक्षम है।

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    फाइल फोटो ।

    जागरण संवाददाता, जमशेदपुर। भारत के बढ़ते अंतरिक्ष मिशनों को अब एनआईटी जमशेदपुर की नई तकनीक और मजबूत बनाएगी। संस्थान के शोधार्थी सरफराज अहमद ने ऐसा अभिनव समाधान विकसित किया है, जो अंतरिक्ष में गुरुत्वाकर्षण न होने के बावजूद रोबोटिक हाथों को अत्यंत सटीकता के साथ काम करने में सक्षम बनाएगा। 
     
    विजय कुमार डल्ला और नरेश प्रसाद के निर्देशन में तैयार यह शोध भविष्य में इसरो के मिशनों को न केवल सुरक्षित करेगा, बल्कि ऊर्जा और खर्च दोनों की बचत भी सुनिश्चित करेगा। यह तकनीक उन परिस्थितियों के लिए बनाई गई है, जहां अंतरिक्ष यान तैरते रहते हैं और थोड़े से भी दबाव में अपने संतुलन से बाहर जा सकते हैं। 
     
    ऐसे में रोबोटिक हथियार से किया गया छोटा-सा काम भी पूरे यान को हिलाकर मिशन खतरे में डाल सकता है। एनआईटी जमशेदपुर का यह शोध इसी समस्या को दूर करता है। 

    धरती पर किसी भी मशीन को स्थिर आधार मिलता है, लेकिन अंतरिक्ष में पैर जमाने की जगह नहीं होती। न्यूटन के नियम के अनुसार, जब भी स्पेसक्राफ्ट का रोबोटिक हाथ किसी दिशा में चलता है, तो यान विपरीत दिशा में हिलने लगता है। इसे बेस डिस्टर्बेंस कहा जाता है।  

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    यही गड़बड़ी उपग्रह-servicing, फ्यूलिंग और मरम्मत जैसे मिशनों के दौरान सबसे बड़ी चुनौती बनती है। सरफराज के शोध में बॉन्ड ग्राफ मॉडलिंग और प्रकृति से प्रेरित उन्नत एल्गोरिदम का उपयोग कर ऐसी तकनीक विकसित की गई, जो रोबोटिक हाथ के हर मूवमेंट को इस तरह नियंत्रित करती है कि उसका उल्टा प्रभाव यान पर न पड़े। 
     
    यानी रोबोटिक आर्म अपना काम पूरी सटीकता से करेगा और स्पेसक्राफ्ट स्थिर अवस्था में रहेगा। अब तक रोबोटिक सिस्टम को नियंत्रित करने के लिए पारंपरिक PID कंट्रोलर का उपयोग होता रहा है, जो सीमित परिस्थितियों में ही प्रभावी साबित होता है।
     

    एनआईटी के शोध में दो आधुनिक तकनीकों का समावेश किया गया

     
    1 पार्टिकल स्वॉर्म ऑप्टिमाइजेशन (PSO) - ठीक वैसे जैसे पक्षियों का झुंड बिना टकराए एक दिशा में उड़ता है।

    2 जेनेटिक एल्गोरिदम (GA) - प्रकृति में पीढ़ियों के साथ आने वाले सुधार की तरह यह सिस्टम खुद सीखकर अपना प्रदर्शन बेहतर करता चलता है।

    इन स्मार्ट एल्गोरिदम की मदद से रोबोटिक हाथ यह समझ पाता है कि किस रास्ते, किस गति और किस दिशा में चलते हुए लक्ष्य तक पहुंचना है, ताकि स्पेसक्राफ्ट के संतुलन को कोई नुकसान न पहुंचे। शोध में पाया गया कि यह नया तरीका पुराने PID सिस्टम की तुलना में कई गुना ज्यादा स्थिर और ऊर्जा-कुशल है।

    इसरो के भविष्य के मिशनों के लिए क्यों खास है यह तकनीक? 

    भारत आने वाले वर्षों में अपना खुद का स्पेस स्टेशन बनाने, पुराने उपग्रहों की कक्षा में मरम्मत करने और स्पेस-सेवा मिशनों को अंजाम देने की तैयारी कर रहा है। ऐसे मिशनों में कई बार दो या अधिक रोबोटिक हाथों को एक साथ मिलकर बेहद जटिल कार्य करने पड़ते हैं।

    उदाहरण के लिए एक रोबोटिक हाथ सैटेलाइट का नट खोलता है, दूसरा पार्ट बदलता है और तीसरा ईंधन टैंक में नोजल सेट करता है।

    एनआईटी की नई तकनीक Co-operative Redundant Space Manipulators यानी मिल-जुलकर काम करने वाले बहुआर्म रोबोट सिस्टम को नियंत्रित करने में विशेष रूप से उपयोगी है। इससे मिशन की सुरक्षा और गति दोनों में भारी सुधार होगा।

    जब रोबोटिक हाथ के हलचल से यान विचलित नहीं होगा, तो उसे खुद को सीधा करने के लिए बार-बार थ्रस्टर्स चालू नहीं करने पड़ेंगे। 
    इसका सीधा फायदा यह हाेगा क‍ि मिशन का ईंधन बचेगा, यान की उम्र बढ़ेगी, लागत कम होगी और जोखिम घटेगा।

    इस तकनीक का उपयोग अंतरिक्ष में बड़े ढांचे जोड़ने (असेंबली), स्वत: संचालित स्पेस मिशनों (ऑटोनॉमस ऑपरेशंस), पुराने सैटेलाइट में दोबारा ईंधन भरने और जटिल मरम्मत अभियानों में किया जा सकता है।

    एनआईटी का दावा- भारत के आत्मनिर्भर स्पेस मिशन में होगा बड़ा योगदान 

    मैकेनिकल इंजीनियरिंग विभाग के हेड पी. कुमार ने इस शोध को रोबोटिक्स के क्षेत्र में मील का पत्थर बताया। उन्होंने कहा कि विश्व की स्पेस एजेंसियां तेजी से रोबोटिक तकनीकों पर निर्भर हो रही हैं। 
     
    ऐसे समय में एनआईटी जमशेदपुर का यह नवाचार भारत को आत्मनिर्भर स्पेस मिशनों की दिशा में एक महत्वपूर्ण बढ़त देगा। यह तकनीक न केवल सटीकता को बढ़ाती है, बल्कि जटिल अंतरिक्ष अभियानों को सरल, सुरक्षित और कम खर्चीला भी बनाती है।