ठगी के साए से अलग आस्था की लौ, अयोध्या दीपोत्सव को जगमग करेंगे जामताड़ा के मिट्टी के दीये
जामताड़ा का भैयाडीह गांव अपनी साइबर ठगी की पहचान से अलग, आस्था की एक अनूठी मिसाल पेश कर रहा है। ...और पढ़ें

अयोध्या दीपोत्सव को जगमग करेंगे जामताड़ा के मिट्टी के दीये
HighLights
जामताड़ा के भैयाडीह गांव के कुम्हार बनाते हैं दीये।
पिछले 35 वर्षों से अयोध्या दीपोत्सव को रोशन करते हैं।
यह परंपरा आस्था और आजीविका का संगम है।
कौशल सिंह, जामताड़ा। जामताड़ा का नाम सुनते ही अक्सर ऑनलाइन ठगी करने वाले साइबर अपराधियों की तस्वीर उभरती है। देशभर में साइबर ठगी के एक बड़े ठिकाने के रूप में चर्चित इस जिले का एक उजला पक्ष भी है। इसकी एक पहचान ऐसी भी है, जो मन में श्रद्धा और उजास भर देती है।
यहां के भैयाडीह गांव में कुम्हारों के हाथों गढ़े मिट्टी के दीये प्रतिवर्ष अयोध्या की दीपावली को रोशन करते हैं। मिट्टी को आकार देने वाले इन हाथों की साधना में प्रभु श्रीराम के प्रति ऐसी आस्था रची-बसी है कि पिछले 35 वर्षों से गांव के लोग दीये लेकर रामनगरी पहुंच रहे हैं। कुछ ही दिनों में दीपावली आने वाली है।
अयोध्या में दीपोत्सव की तैयारियों के बीच भैयाडीह के कुम्हार भी दीये और कलश तैयार करने में जुटे हैं। उनके लिए यह महज बिक्री का अवसर नहीं, अपनी कला, परंपरा और आराध्य के प्रति समर्पण को जीवंत रखने का पर्व है।
गांव का जुड़ाव 300 वर्षों से भी पुराना
भैयाडीह से श्रद्धालुओं की टोली की अगुआई करने वाले राजेश मिश्रा बताते हैं कि अयोध्या के श्री दिव्य कला कुंज से गांव का जुड़ाव 300 वर्षों से भी पुराना है। उनके पूर्वज भी इस परंपरा से जुड़े रहे हैं, लेकिन करीब 35 वर्ष पहले अयोध्या के दिव्य कला कुंज के पीठाधीश्वर महंत परमार्थ कलाजी महाराज के गांव आगमन के बाद यह जुड़ाव और व्यापक हुआ। उनके प्रवास के दौरान आसपास के जिलों के सैकड़ों लोग उनसे दीक्षित हुए।
राजेश के पिता महंत नवल किशोर शरण जी महाराज और दिनेश मिश्रा भी पहले से दिव्य कला कुंज से जुड़े थे। उन्होंने करीब तीन दशक पहले कार्तिक मास में अयोध्या जाकर दीप जलाने की परंपरा शुरू की थी। धीरे-धीरे गांव के दूसरे श्रद्धालु भी इससे जुड़ते गए।

कुंभकार समाज के साथ अन्य लोग भी अपने साथ कार्तिक मास में दीया और सुसज्जित कलश साथ लेकर दिव्य कलाकुंज नयाघाट अयोध्या धाम पहुंचते हैं। प्रत्येक व्यक्ति अपनी आस्था के अनुरूप 11 और 21 या सामर्थ्य के अनुसार इससे अधिक दीया और दीप कलश लेकर अयोध्या पहुंचता है।
प्रतिवर्ष दो बार जत्थे पहुंचते हैं अयोध्या
अब प्रतिवर्ष दो बार जत्थे अयोध्या पहुंचते हैं। सावन में बुजुर्ग श्रद्धालु झूलनोत्सव और पंचकोसी परिक्रमा में शामिल होते हैं, जबकि कार्तिक में युवा और नवदंपती चौदह कोसी परिक्रमा तथा दीपोत्सव के लिए पहुंचते हैं।
अयोध्या में गुरुजी के आश्रम में इनके रहने का इंतजाम होता है और प्रभु के श्रीचरणों में प्रज्ज्वलित दीयों की लौ को देख पाने की सुखद अनुभूति महसूस कर पाते हैं।

दीपक ने बताया कि प्रभु के प्रति आस्था का प्रभाव है कि गांव के कुम्हारों समेत सैकड़ों अन्य लोगों ने दशकों पहले से शाकाहार को जीवनशैली के रूप में अपना लिया। इस वर्ष सावन में 75 श्रद्धालु अयोध्या गए थे और कार्तिक में 70 से अधिक लोगों के जाने की तैयारी है।
मिट्टी के दीयों में आस्था के साथ आजीविका का उजास
दीयों और कलश को अंतिम रूप दे रहे कुंभकार दीपक पंडित और अवध पंडित बताते हैं कि उनके परिवारों की आजीविका माटी कला पर निर्भर है। सालभर दीये, घड़े और कलश बनाए जाते हैं। दीपावली पर इनकी मांग बढ़ जाती है। हालांकि, अयोध्या से जुड़ाव कारोबार से कहीं आगे आस्था का विषय है।
दीपक बताते हैं कि गांव के लोग तब भी अयोध्या जाकर दीये जलाते थे, जब वहां भव्य राम मंदिर नहीं बना था। मंदिर निर्माण के बाद श्रद्धालुओं का उत्साह और बढ़ा है। धनबाद के कारोबारी भी गांव से दीये खरीदकर अयोध्या ले जाने लगे हैं। पिछले वर्ष गांव में बने करीब 2.5 लाख दीये अयोध्या भेजे गए थे।
अवध पंडित के अनुसार, पीएम विश्वकर्मा योजना से कुंभकार समाज को भी लाभ मिला है। धार्मिक स्थलों पर अनुष्ठानों का विस्तार होने से माटी कला की मांग बढ़ी है। इससे कुम्हारों की आमदनी को सहारा मिला है और नई पीढ़ी भी इस परंपरागत कला से जुड़ रही है।
पीढ़ियों से चली आ रही श्रद्धा की डोर
अयोध्या के दिव्य कला कुंज नया घाट के पुजारी कृष्ण गोपाल जी महाराज कहते हैं कि रामनगरी में रोजाना हजारों श्रद्धालु पहुंचते हैं, लेकिन भैयाडीह के लोगों की आस्था विशिष्ट है।
पीढ़ी दर पीढ़ी उनका यहां आना और प्रभु श्रीराम के चरणों में अपने हाथों से बनाए दीये अर्पित करना इस जुड़ाव की गहराई बताता है। वह बताते हैं कि गुरुजी के समय से इन श्रद्धालुओं का आगमन देख रहे हैं। समय के साथ उनकी संख्या और श्रद्धा दोनों बढ़ी हैं।
भैयाडीह से प्रतिवर्ष सावन में झूलनोत्सव और कार्तिक में चौदह कोसी परिक्रमा के लिए श्रद्धालुओं के दो जत्थे अयोध्या पहुंचते हैं। करीब 35 वर्ष पहले कुछ लोगों ने इस परंपरा की गहराई से शुरुआत की थी। अब कुम्हार समाज के साथ गांव के दूसरे परिवार भी इससे जुड़ चुके हैं। प्रति वर्ष श्रद्धालुओं की संख्या बढ़ रही है।- नवल किशोर शरण जी महाराज, भैयाडीह, जामताड़ा
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