असम में JMM को नहीं मिला 'हाथ' का साथ, 19 सीटों पर हेमंत सोरेन उतारेंगे उम्मीदवार
झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) असम विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के साथ गठबंधन न होने के बाद अकेले 19 सीटों पर चुनाव लड़ेगा। सीट बंटवारे पर लंबी बातचीत व ...और पढ़ें
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हेमंत सोरेन। (फाइल फोटो)

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
राज्य ब्यूरो, रांची। झारखंड में मिलकर सत्ता चला रहे झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) और कांग्रेस असम विधानसभा चुनाव में एक-दूसरे के आमने-सामने होंगे। असम विधानसभा चुनाव को लेकर सियासी तस्वीर रविवार को स्पष्ट हो गई है।
झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) ने कांग्रेस के साथ गठबंधन की संभावनाएं खत्म होने के बाद अकेले चुनाव मैदान में उतरने का फैसला किया है। पार्टी अब 19 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारेगी, जबकि एक सीट बिहाली वामदलों के लिए छोड़ी गई है।
झामुमो और कांग्रेस के बीच लंबे समय से सीट बंटवारे को लेकर बातचीत चल रही थी, लेकिन यह प्रयास अंततः बेनतीजा रहा। उल्लेखनीय है कि इस संदर्भ में मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन से बातचीत करने असम कांग्रेस के प्रभारी भंवर जितेंद्र सिंह और अध्यक्ष गौरव गोगोई रांची आए थे।
मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन खुद दिल्ली जाकर कांग्रेस नेतृत्व से मिले, वहीं पार्टी महासचिव विनोद पांडेय असम में सक्रिय रहकर जमीन तैयार करते रहे।
नहीं बनी सहमति
इसके बावजूद दोनों दलों के बीच सम्मानजनक सीट शेयरिंग पर सहमति नहीं बन सकी, जिसके बाद झामुमो ने स्वतंत्र रूप से चुनाव लड़ने का निर्णय लिया।
यह फैसला चुनावी रणनीति के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि इससे विपक्षी वोटों के बंटवारे की संभावना भी बढ़ सकती है।
झामुमो की चुनावी रणनीति स्पष्ट रूप से सामाजिक समीकरणों पर आधारित है। पार्टी असम के आदिवासी और चाय बागान (टी-ट्राइब) समुदायों को साधने की कोशिश कर रही है, जो राज्य की राजनीति में निर्णायक भूमिका निभाते हैं।
126 सदस्यीय असम विधानसभा में 19 सीटें अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित हैं। झामुमो इन्हीं सीटों पर अपनी मजबूत दावेदारी पेश कर रही है। पार्टी का मानना है कि झारखंड में आदिवासी राजनीति के अनुभव को वह असम में भी भुना
सकती है।
झामुमो को असम में भी मिला तीर-कमान चुनाव चिह्न
असम विधानसभा चुनाव के लिए निर्वाचन आयोग से झामुमो को उसका पारंपरिक चुनाव चिह्न तीर-कमान मिल चुका है। यह
चिह्न न केवल पार्टी की पहचान है, बल्कि आदिवासी समाज से उसके जुड़ाव का प्रतीक भी माना जाता है।
बाहरी राज्य में चुनाव लड़ते समय प्रतीक और पहचान का महत्व और बढ़ जाता है, ऐसे में तीर-कमान झामुमो के लिए मनोवैज्ञानिक बढ़त दिला सकता है।
असम में फिलहाल भाजपा की सरकार है और कांग्रेस मुख्य विपक्ष की भूमिका में है। ऐसे में झामुमो का अकेले चुनाव लड़ना सीधे तौर पर भाजपा को चुनौती देने का प्रयास माना जा रहा है। पार्टी नेताओं का दावा है कि वे मजबूती से चुनाव लड़ेंगे और राज्य में अपनी उपस्थिति दर्ज कराएंगे।
इसके साथ ही यह चुनाव झामुमो के लिए राष्ट्रीय स्तर पर विस्तार और भविष्य में राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा हासिल करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम भी माना जा रहा है। झामुमो का यह कदम न सिर्फ असम की राजनीति में नए समीकरण बनाएगा, बल्कि विपक्षी एकता की रणनीति पर भी सवाल खड़े करेगा।
अब यह देखना दिलचस्प होगा कि झामुमो की एकला चलो नीति उसे राजनीतिक लाभ दिलाती है या विपक्षी वोटों के
बंटवारे का कारण बनती है।
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