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    झारखंड हाई कोर्ट: महिला सुपरवाइजरों के शत-प्रतिशत आरक्षण पर हुई सुनवाई, न्याय मित्र नियुक्त

    Updated: Thu, 12 Feb 2026 02:45 AM (IST)

    रांची हाई कोर्ट ने महिला सुपरवाइजरों की नियुक्ति में शत-प्रतिशत आरक्षण के मामले में अधिवक्ता अनूप कुमार मेहता को न्याय मित्र नियुक्त किया है। चीफ जस्ट ...और पढ़ें

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    सुपरवाइजर पद महिलाओं के लिए आरक्षित करने के मामले में न्याय मित्र नियुक्त

    स्मार्ट व्यू- पूरी खबर, कम शब्दों में

    राज्य ब्यूरो, रांची। हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस एमएस सोनक और जस्टिस राजेश शंकर की अदालत में महिला सुपरवाइजरों की नियुक्ति में शत प्रतिशत सीटें महिलाओं को आरक्षित करने के मामले पर बुधवार को सुनवाई हुई।

    सुनवाई के बाद अदालत ने मामले में हाई कोर्ट ने अधिवक्ता अनूप कुमार मेहता को न्याय मित्र नियुक्त किया। सुनवाई के दौरान वह कोर्ट को सहयोग करेंगे। अदालत ने सभी पक्षों को मामले में लिखित बहस प्रस्तुत करने का निर्देश दिया है। मामले में अगली सुनवाई 18 मार्च को होगी।

    इस मामले की पहले हाई कोर्ट की एकल पीठ में सुनवाई हुई थी। एकल पीठ ने यह महत्वपूर्ण प्रश्न उठाते हुए मामला खंडपीठ को भेज दिया था कि क्या किसी पद को शत-प्रतिशत महिलाओं के लिए आरक्षित किया जा सकता है।

    इसके बाद चीफ जस्टिस की अध्यक्षता वाली खंडपीठ इस मामले की सुनवाई कर रही है। इस संबंध में अंजू कुमारी सहित अन्य की ओर से हाई कोर्ट की एकल पीठ में याचिका दाखिल की गई है।

    एकल पीठ के समक्ष महाधिवक्ता राजीव रंजन ने कहा था कि महिला सुपरवाइजर का पद केवल महिला कैडर के लिए ही निकाला गया है, क्योंकि इस पद का कार्यक्षेत्र गर्भवती महिलाओं, नवजात शिशुओं की माताओं और अन्य महिला समूहों से जुड़ा है।

    उन्होंने कहा था कि महिला सुपरवाइजरों का कार्य मुख्य रूप से महिलाओं से संबंधित है, इसलिए यह पद केवल महिलाओं के लिए निर्धारित किया गया है। देश के अन्य राज्यों में भी ऐसी व्यवस्था लागू है।

    प्रार्थी की ओर से अधिवक्ता अजीत कुमार और अधिवक्ता चंचल जैन की ओर से कहा गया था कि नियुक्ति प्रक्रिया में किसी वर्ग को शत-प्रतिशत आरक्षण देना संविधान के अनुरूप नहीं है। उन्होंने आपत्ति जताई कि इस विज्ञापन में केवल महिलाओं से आवेदन मांगे गए, जो विधिसम्मत नहीं है।

    मामला बाल कल्याण विभाग में महिला सुपरवाइजर के 421 पदों पर नियुक्ति से जुड़ा है। जेएसएससी ने इन पदों के लिए विज्ञापन जारी किया था। प्रार्थी भी परीक्षा में शामिल हुए थे, लेकिन आयोग ने यह कहते हुए उनका चयन नहीं किया कि उनकी शैक्षणिक योग्यता विज्ञापन की शर्तों के अनुरूप नहीं है।

    प्रार्थियों के पास विज्ञापन में निर्धारित मुख्य विषय की डिग्री के बजाय सहायक विषयों की डिग्री है, जबकि नियुक्ति नियमावली में ऐसी बाध्यता स्पष्ट रूप से उल्लेखित नहीं है। सुनवाई के दौरान यह मुद्दा भी उठाया गया कि क्या नियुक्ति प्रक्रिया में किसी वर्ग को शत-प्रतिशत आरक्षण दिया जा सकता है।