एक ही सावन पूर्णिमा, पर अलग-अलग रस्में! रक्षाबंधन के दिन निभाई जाने वाली ये परंपराएं शायद नहीं सुनी होंगी आपने
सावन पूर्णिमा के दिन अकेले रक्षाबंधन नहीं अनेकों परंपराएं सदियों से निभाई जा रही हैं।

सावन पूर्णिमा पर निभाई जाने वाली अलग-अलग रस्में (Image Source: AI Generated)

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नई दिल्ली, लाइफस्टाइल डेस्क। भारत विविधताओं वाला देश है जहां हर त्योहार पर राज्यों में अलग-अलग परंपराओं और रस्मों को निभाया जाता है। ऐसे में रक्षाबंधन इसमें कैसे अछूता रह सकता है, भाई-बहन के इस त्योहार पर भी अनेकों रस्में और परंपराएं देखने को मिलती हैं, जो सिर्फ राखी बांधने तक तो सीमित नहीं है।
चलिए आपको बताते हैं एक ही सावन पूर्णिमा पर कौन सी अलग-अलग रस्में राज्यों में निभाई जाती हैं।
नारली पूर्णिमा
भारत के पश्चिमी तटीय क्षेत्रों महाराष्ट्र, गोवा और गुजरात में रक्षाबंधन के दिन मछुआरों का बड़ा त्योहार मनाया जाता है, जिसे नारली पूर्णिमा कहते हैं। इस दिन सभी मछुआरे समुद्र की पूजा करने के बाद नारियल अर्पित करते हैं। मान्यता है कि समंदर की पूजा करने से समुद्र देव शांत होते हैं जिससे जल यात्रा सुविधाजनक हो पाती है।
संस्कृत दिवस
रक्षाबंधन के दिन श्रावण मास की पूर्णिमा होती है और इस दिन संस्कृत दिवस भी मनाया जाता है। दरअसल, सावन की पूर्णिमा भारतीय शिक्षा परंपरा से खासतौर से जुड़ी हुई है। ऐसी मान्यता है कि इसी पूर्णिमा से ऋषि-मुनि वेदों और पुराणों का दोबारा अध्ययन शुरू करते थे।
लुम्बा राखी
राजस्थान की मारवाड़ी संस्कृति में लुम्बा राखी का त्योहार मनाए जाने की विशेष परंपरा हैं, जिसमें भाई नहीं बल्कि भाभी को राखी बांधी जाती है। बहनें अपनी भाभी को सजावटी राखी कलाई की जगह चूड़ी और कंगन पर बांधती हैं, इसलिए इसे लुम्बा राखी नाम दिया गया है। वैसे तो इसके पीछे कोई खास मान्यता नहीं है पर इसे मनाने का उद्देश्य भाई के जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाली स्त्री का सम्मान करना है।
पवित्रोपना
हम सभी जानते हैं कि सावन भगवान शिव का पावन महीना है और इस पावन महीने की पूर्णिमा को गुजरात में पवित्रोपना मनाया जाता है। गुजरात में इस दिन भगवान शिव की विशेष पूजा और साधना की जाती है। यह दिन आध्यात्मिक ऊर्जा को जगाने और नकारात्मक शक्तियों को दूर भगाने के लिए बेहद खास होता है।
उपाकर्म संस्कार
इस दिन श्रावण उपाकर्म मनाए जाने की भी परंपरा है, जिसे उत्तर भारत में ‘ऋषि तर्पण' तो दक्षिण भारत में 'अवनि अवित्तम' कहा जाता है। यह सनातन धर्म का एक महत्वपूर्ण संस्कार है, जिसमें वेदों के अध्ययन की शुरुआत होती है। बता दें कि पूर्णिमा का यह दिन जनेऊ धारण करने और ऋषियों के प्रति सम्मान प्रकट करने के लिए मनाया जाता है।
