देवी दुर्गा को देखकर क्यों बढ़ता है आत्मविश्वास? कलाकारों ने बताया कला और शक्ति का रिश्ता
दुर्गा पूजा के अवसर पर देवी के विविध रूप, उनकी आंखों की दृढ़ता, चेहरे का तेज और महिषासुर पर विजय ...और पढ़ें

कलाकारों की नजर में देवी दुर्गा: शक्ति, सृजन और आत्मविश्वास का अटूट रिश्ता (Picture Credit- AI Generated)
HighLights
कलाकार देवी दुर्गा में निर्भीकता और जुनून की शक्ति पाते हैं
देवी दुर्गा जीवन की बाधाओं से लड़ने की प्रेरणा देती हैं
स्त्री ऊर्जा और सृजनशीलता को देवी दुर्गा से जोड़कर देखते हैं
सीमा झा, नई दिल्ली। कहीं ढोलों की थाप मन में उमंग भर रही है तो कहीं शंखों की ध्वनि वातावरण में एक अलग ही भाव जगा रही है। काश के फूलों (कांस के फूलों) की सफेदी और हरसिंगार की महक के बीच दुर्गा पूजा का उल्लास हर ओर छाया है। दुर्गा पूजा केवल आस्था का अवसर नहीं, भावनाओं, कल्पनाओं और सृजन को नए अर्थ देने का भी समय है। खासकर कलाकारों के लिए देवी का स्वरूप महज एक धार्मिक छवि नहीं, बल्कि जीवन को देखने का नजरिया, मन की शक्ति और अभिव्यक्ति का माध्यम भी है।
कोई उनकी निर्भीकता में अपनी प्रेरणा खोजता है तो कोई उनके रूपों में जीवन के अनगिनत रंगों को उकेरता है। आखिर देवी दुर्गा कलाकारों की सृजन यात्रा में किस तरह शामिल होती हैं और उनकी कला के माध्यम से कौन से भाव आकार लेते हैं? यह जानने के लिए हमने देश की जानी-मानी कलाकारों से बात की। अपने अनुभवों को वे किस तरह से शब्द देती हैं, आइए जानते हैं।
आश्विन माह में जब देवी कुछ दिनों के लिए मायके आती हैं तो उनके स्वागत में कोई कसर नहीं छोड़ी जाती। वो अपने साथ गणेश, कार्तिकेय, लक्ष्मी और सरस्वती को भी लाती हैं, जो संसार को उमंग, उत्साह और नई आस से भर देते हैं। यह कहते हुए रमा कुछ पल के लिए ठहर जाती हैं, मानो आगे कहने के लिए शब्द कम पड़ गए हों। फिर सहसा कह उठती हैं, 'देवी दुर्गा हमारे लिए एक इमोशन हैं। वह हमारे भीतर बहती हैं और हम जो कुछ भी करते हैं, उसमें शामिल रहती हैं। इससे अधिक क्या कहूं।' एमए की छात्रा रमा कलाकार हैं।

हाल ही में दिल्ली हाट में आयोजित दुर्गा पूजा प्रदर्शनी में उनकी कलाकृतियों को देखकर आगंतुक अचरज में पड़ रहे थे, लेकिन हाथोंहाथ खरीद भी रहे थे। रमा के बनाए गहने, क्राफ्ट वर्क और दुर्गा की छवियों व उनसे जुड़े प्रतीकों पर आधारित कलाकृतियां उनकी इसी आस्था की अभिव्यक्ति हैं। खास बात यह है कि उन्होंने इसके लिए कोई पेशेवर शिक्षा या प्रशिक्षण नहीं लिया। वह कहती हैं, 'यह सही है कि मैं पैसे के लिए इतनी मेहनत करती हूं, लेकिन उससे भी अधिक यह मेरा पैशन है, जिसमें देवी दुर्गा की ऊर्जा भरी है।' निश्चित ही, सच्चा कलाकार वही होता है, जो प्रसिद्धि या पैसे से बढ़कर अपने भीतर बहती प्रेरणा और गहरी भावना से कलाकृतियों का सृजन करता है। यही उसकी जीवन यात्रा है और इसी में उसे वास्तविक आनंद मिलता है।
हर रूप में बसी है प्रेरणा
चित्रकार नुपूर कुंडू कहती हैं, मेरी अमूर्त कलाकृतियों में जिन रंगों का प्रयोग होता है, उनमें लाल रंग मेरा प्रिय है। इसे मैं अपने व्यक्तित्व के सबसे करीब पाती हूं यानी निर्भीकता, जुनून और वो शक्ति जो देवी दुर्गा का प्रतीक है। मैं देवी दुर्गा को इसलिए भी करीब पाती हूं, क्योंकि इसी संस्कृति में बचपन से रही हूं। दिल्ली का चितरंजन पार्क मेरा घर है। यहां बंगाल की वही संस्कृति रची-बसी है, जहां दुर्गा पूजा को स्त्री शक्ति के उत्सव के तौर मनाया जाता है। इस पूरे उत्सव के दौरान एक खास किस्म का भाव माहौल में घुला रहता है।

ऐसे जैसे हर व्यक्ति किसी विराट शक्ति से जुड़ाव महसूस कर रहा हो। ऐसी आध्यात्मिकता एक कलाकार के तौर पर मुझे मजबूती देती है। एक कलाकार कभी सीमा में नहीं बंधना चाहता, क्योंकि यह सृजन की राह की सबसे बड़ी बाधा है, लेकिन देवी दुर्गा की अनंत शक्ति इस बाधा को दूर कर देती है। यह सही है कि कलाकार के लिए सृजन की राहें बड़ी उबड़-खाबड़ होती हैं, लेकिन देवी दुर्गा पर आस्था से मैं ऐसी किसी भी प्रकार की बाधा चाहे वह पारवारिक दायित्व की हो या सांसारिक समस्याओं से जुड़ी, उनसे लड़ सकती हूं। देवी का हर रूप मुझे प्रेरणा देता है। मेरे लिए देवी को अपने भीतर बसाकर कैनवस पर अपनी कल्पनाओं को उतारना आसान हो जाता है।
जीवंत रहे यह ऊर्जा
चित्रकार व शिल्पकार पूजा क्षत्रिय कहती हैं कि मैं देवी दुर्गा को मल्टीटास्कर मानती हूं। ठीक उस स्त्री की तरह जो अपने बहुआयामी कर्तव्य का निर्वहन करती है। मेरे लिए वो जिस दानव महिषासुर का दमन करती हैं वह केवल दानव नहीं है। वह जीवन की वही बाधा है, जो हर व्यक्ति के जीवन में आती है। कला की तरह ही जीवन भी है या यूं कहें अलग नहीं कला व जीवन, जिसमें कई प्रकार के उतार-चढ़ाव होते हैं। कैनवस पर कल्पनाओं को कई बार उतारना आसान नहीं होता, लेकिन यदि महिषासुर का अंत जैसे देवी दुर्गा ने किया उस तरह की शक्ति अपने भीतर महसूस करें तो यह असंभव नहीं।

जैसे देवी ने एकाग्र भाव से अपने लक्ष्य को देखा और हर बाधा से ऊपर उठकर, उनसे जूझकर उसका वध कर दिया। मैं उसी शक्ति को अपने भीतर पाती हूं। जीवन की तरह सृजन यात्रा में ऐसे क्षण आते हैं जब आगे बढ़ना कठिन जान पड़ता है तो थोड़े समय के लिए उससे हट जाती हूं। ठीक उसी तरह जब कोई किताब पढ़ें और कुछ समय के लिए उससे स्वयं को दूर कर दें तो वह अधिक फलदायी होती है। जब हम तटस्थ भाव से आगे बढ़ते हैं तो कलाकृति भी अच्छी बनती है और जीवन में भी राह मिलने लगती है। दरअसल, देवी दुर्गा वह ऊर्जा हैं जिन्हें भीतर ज्वलंत रखना है। इसे बचाए रखना है ताकि जीवन के कैनवस पर भी हम अच्छा गढ़ते रहें।
निरंतर सृजनशील हैं देवी
शिल्पकार व चित्रकार सीमा कोहली के अनुसार, स्त्री शक्ति को अभिव्यक्त करने की मेरी सृजनात्मक यात्रा वर्षों पुरानी है। स्त्री ऊर्जा परिवर्तनशील है, जिसे किसी एक रूप में समाहित नहीं किया जा सकता। इसी असीम ऊर्जा को विभिन्न प्रतीकात्मक और पौराणिक रूप में मैं अपनी कला में उतारती हूं। हमारी एक कृति है द गोल्डन वाम्ब यानी स्वर्ण गर्भ। यह एक ऐसी सीरीज है, जो जन्म, पुर्नजन्म व ब्रह्मांडीय उत्पत्ति की खोज से जुड़ी है। यह निरंतर सृजनशील रहती है। यह सृजन हमारी सारी चिंताओं, दुखों, सभी प्रकार की निराशा को दूर करने के लिए है। देवी दुर्गा को देखते ही प्रेरणा मिलती है।

उनकी आंखें, उनके देखने का अंदाज हो या शेर पर सवारी करने का उनका तरीका पूरा व्यक्तित्व भयमुक्त कर देता है। ऐसा लगता है कि एक ऐसी शक्ति है, जो हमारे अंग संग यानी हमेशा साथ रहने वाली है। इससे आत्मविश्वास आता है और जीवन में आगे बढ़ने की समझ बढ़ती है और कला यात्रा में भी। इस राह में बाधाएं जो भी आएं उनका सामना करने से ही वे दूर हो सकती हैं। आगे बढ़ते रहें तो राह मिलती जाती है और उलझनें भी सुलझने लगती हैं। महिषासुर कोई पशु या असुर नहीं, बल्कि हमारे मन का प्रतीक है, जो हमें इधर-उधर दौड़ाता-भटकाता रहता है, पर देवी दुर्गा की तरह जैसे-जैसे हम उस पर नियंत्रण करना शुरू करते हैँ तो उस पर विजय प्राप्त कर सकते हैं।
मन में बसी छवि, बन गई कृति

पश्चिम बंगाल की दुर्गा पूजा विशेष है और यूनेस्को ने भी इसे अमूर्त सांस्कृतिक विरासत की सूची में शामिल किया है। यूनेस्को ने इसके समावेशी स्वरूप व इसमें महिलाओं की सक्रिय भागीदारी की भी सराहना की है। इसकी स्पष्ट झलक दिखी देश की राजधानी के दिल्ली हाट में आयोजित दुर्गा पूजा प्रदर्शिनी में। इसमें पश्चिम बंगाल से आए कारीगरों ने भाग लिया जिसमें महिलाओं की बड़ी संख्या थी। यहां आई फैशन डिजाइनर लोपा भट्टाचार्य व भास्वती नंदी के अनुसार, दुर्गा हमारे लिए देवी तो हैं, पर हम उन्हें बेटी मानते हैं, जो जीवन के हर रंग में शामिल हैं।

भास्वती के अनुसार, जब घर से निकलते हैं तो मां बस दुग्गा, दुग्गा कहकर सकुशल वापसी की प्रार्थना करती हैं। बेटियों को ऐसा मान बचपन से मिलता है, जो हमारी कलाकृतियों में झलकता है, क्योंकि हम उसे अपने भीतर जीते हैं। टेराकोटा आर्टिस्ट व ज्वेलरी डिजाइनर सोनिया सरकार की कहानी अलग है। बचपन में मां के देहांत के बाद छोटी उम्र में उनकी शादी हो गई।

कई उतार-चढ़ाव आए, लेकिन उन्होंने इस क्रम में अपना पैशन नहीं छोड़ा। उनकी हर कलाकृति में दुर्गा के रूप और पूजा से जुड़े प्रतीकों का प्रयोग होता है। वह कहती हें, जैसे एक पहाड़ ऊंचा और दृढ़ रहता है, उसी तरह मां दुर्गा ने मुझे अपने विश्वासों और मूल्यों पर अडिग रहना सिखाया है।
