यमुना के खराब पानी से बचने के लिए बनी थी निहारी और चाट! पढ़ें दिल्ली के जायकों की सालों पुरानी कहानी
दिल्ली का खानपान सिर्फ स्वाद नहीं, बल्कि सदियों का इतिहास समेटे हुए है। आज हम जानेंगे दिल्ली के जायकों की 400 साल पुरानी कहानी के बारे में। ...और पढ़ें

दिल्ली के जायकों का 400 साल पुराना इतिहास (Picture Credit- AI Generated)

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लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। दिल वालों की दिल्ली महज कॉन्क्रीट से बना कोई आम शहर नहीं है; यह तो महकते मसालों, सदियों पुरानी संस्कृतियों और लजीज जायकों की एक जीती-जागती दास्तान है।
यहां की तंग गलियों में पकने वाला खाना सिर्फ भूख नहीं मिटाता, बल्कि हर निवाले के साथ उन सुल्तानों, मुसाफिरों और आम लोगों के किस्से सुनाता है, जिन्होंने इस शहर को अपनी रूह में बसाया। तो चलिए स्वाद और इतिहास के इस खूबसूरत सफर पर एक साथ निकलते हैं!
हर संस्कृति का स्वाद है दिल्ली की थाली में
दिल्ली के खानपान की सबसे बड़ी खूबी यह है कि यह किसी एक समुदाय का नहीं है। सदियों से दिल्ली सत्ता का केंद्र रही है और जो भी यहां आया, अपना स्वाद यहीं छोड़ गया।
- यहां के खानपान में आपको तुर्क और अफगानों के गोश्त और कबाब के तरीके मिलेंगे।
- राजपूत और चौहानों के पारंपरिक राजस्थानी और उत्तर भारतीय मसालों की महक मिलेगी।
- इसके साथ ही, इस शहर ने पंजाबी, खत्री, कायस्थ, जाट और गुर्जर समुदायों के देसी, तीखे और शुद्ध घी वाले खानों को भी अपने भीतर बड़ी खूबसूरती से समेटा है।
यमुना का पानी और चाट-निहारी का जन्म
दिल्ली के खानपान का एक बड़ा हिस्सा पुरानी दिल्ली (शाहजहांनाबाद) से जुड़ा है। जब मुगल बादशाह शाहजहां ने शाहजहांनाबाद बसाया, तो पीने के लिए यमुना नदी के पानी इस्तेमाल होने लगा। ऐसा कहा जाता है कि उस समय यमुना के पानी से लोगों का हाजमा खराब होने लगा था।
इससे बचने के लिए शाही हकीमों ने सलाह दी कि खाने में तीखे मसालों और घी-तेल का इस्तेमाल बढ़ाया जाए, ताकि पानी के बुरे असर को काटा जा सके। इसी जरूरत से जन्म हुआ दिल्ली की मशहूर मसालेदार चाट और मटन/बीफ से बनने वाली निहारी का।
निहारी और खमीरी रोटी

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'निहारी' शब्द अरबी के 'नहार' से बना है, जिसका मतलब होता है सुबह। आज से करीब 400 साल पहले पुरानी दिल्ली के मटिया महल इलाके से इसकी शुरुआत हुई थी। इसे रात भर धीमी आंच पर पकाया जाता था और सुबह खाया जाता था। इसके साथ परोसी जाने वाली मोटी और मुलायम खमीरी रोटी का स्वाद आज भी लोगों को पुरानी दिल्ली खींच लाता है।
दवा के तौर पर हुई चाट की शुरुआत

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मांसाहार खाने वाले लोगों ने यमुना के पानी से बचने के लिए जहां निहारी को अपनाया, तो वहीं शाकाहारी लोगों ने चाट को दवा के तौर पर इस्तेमाल किया। यमुना के पानी से खराब हो रहे हाजमे के लिए तीखे मसालों और घी-तेल वाले किसी व्यंजन की जरूरत थी और इसे पूरा करने के लिए जन्म हुआ मशहूर चाट का, जिसका स्वाद आज सिर्फ दिल्ली ही नहीं, बल्कि पूरा देश चख रहा है।
पुरानी दिल्ली के वो स्वाद, जो आज भी कायम हैं
- मटन इष्टू (Mutton Ishtew): यह मुगलों के दौर का एक और नायाब तोहफा है। खड़े मसालों, ढेर सारे प्याज और दही के साथ धीमी आंच पर पके गोश्त (मटन इष्टू) को जब खमीरी रोटी के साथ खाया जाता है, तो उसका स्वाद लाजवाब होता है।
- बेड़मी पूरी: सिर्फ नॉन-वेज ही नहीं, दिल्ली का शाकाहारी नाश्ता भी बहुत ऐतिहासिक है। उड़द दाल की पिट्ठी भरकर बनाई गई करारी बेड़मी पूरी और उसके साथ परोसी जाने वाली तीखी आलू की सब्जी दिल्ली वालों की सुबह के नाश्ते की पहली पसंद है।
- दौलत की चाट: दिल्ली का चाट से रिश्ता काफी पुराना है। सर्दियों के मौसम में पुरानी दिल्ली की गलियों में एक बेहद खास चीज मिलती है, जिसे दौलत की चाट कहा जाता है। इसका नाम सुनकर लगता है कि यह पारंपरिक चाट की ही तरह कोई तीखी-चटपटी चीज होगी, लेकिन असल में यह दूध के झाग से बनी एक बेहद हल्की और मीठी डिश है।
कहा जाता है कि सदियों पहले दौलत नाम का एक व्यक्ति इसे पुरानी दिल्ली की गलियों में बेचा करता था और उसी के नाम पर इस अनोखे व्यंजन का नाम 'दौलत की चाट' पड़ गया।
मुगलों का पतन और नए जायकों का जन्म
जैसे-जैसे मुगलिया सल्तनत का पतन होने लगा, शाही रसोई में काम करने वाले रसोइए दिल्ली छोड़कर देश के दूसरे हिस्सों में बसने लगे। वे जहां भी गए, अपने साथ मुगलिया खाने की तकनीक ले गए।

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इन्हीं रसोइयों ने लखनऊ जाकर अवधी खानपान को जन्म दिया, हैदराबाद में निजामी क्विजीन की नींव रखी और रामपुर में रामपुरी जायकों को ईजाद किया। यह कहना गलत नहीं होगा कि ये तीनों ही क्विजीन (अवधी, निजामी और रामपुरी) असल में पुराने मुगलिया खाने का ही अक्स हैं, जिन्हें स्थानीय मसालों और तौर-तरीकों के साथ नया रूप दिया गया।
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