कभी सिर्फ मुगल बादशाहों की रसोई में बनती थी 'नान', जानिए कैसे पहुंची यह आपकी थाली तक?
गरमा-गरम नान, जो कभी सिर्फ मुगल बादशाहों की रसोई की शान थी, आज हर थाली का हिस्सा है। ...और पढ़ें
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मुगल दरबार से निकलकर आम जनता की थाली तक कैसे पहुंची नान? (AI Generated Image)

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। गरमा-गरम, मुलायम और मक्खन से चुपड़ी हुई नान का नाम सुनते ही मुंह में पानी आ जाता है। चाहे गाढ़ी पनीर की ग्रेवी हो या चटपटा बटर चिकन, बिना नान के हर दावत अधूरी सी लगती है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि आज हर गली-नुक्कड़ के रेस्टोरेंट में मिलने वाली यह नान कभी मुगल बादशाहों की रसोई में ही बनाई जाती थी।
मुगल शाही रसोई से निकलकर नान आम जनता की थाली तक कैसे पहुंची इसका सफर काफी दिलचस्प है। आइए जानें इस सफर की कहानी।
फारस से शुरू हुआ सफर
नान की जड़ें प्राचीन फारस (आज का ईरान) से जुड़ी मानी जाती हैं। नान शब्द भी मूल रूप से फारसी भाषा से आया है, जिसका मतलब रोटी होता है। शुरुआत में इसे आटे और पानी के मिश्रण से बनाया जाता था और गर्म पत्थरों पर सेंका जाता था। भारत में इसका आगमन 13वीं से 16वीं शताब्दी के बीच दिल्ली सल्तनत के शासकों के साथ हुआ। ये शासक अपने साथ तंदूर और खाना पकाने की नई तकनीकें लेकर आए और इसी तरह नान फारस से भारत पहुंची।

(Picture Courtesy: Freepik)
शाही रसोइयों की शान
उस दौर में नान कोई आम खाना नहीं था। इसे बनाने के लिए खमीर का इस्तेमाल किया जाता था, जो उस समय एक दुर्लभ और महंगी चीज थी, जिसका इस्तेमाल सिर्फ शाही बावर्ची ही किया करते थे। नान को और भी ज्यादा नरम और फूला हुआ बनाने के लिए शाही रसोइयों ने गूंधने की खास तकनीक भी अपनाई जाती थी। इन्हीं कारणों से नान सिर्फ शाही रसोईयों में ही पकाई जाती थी।
प्राचीन अभिलेखों में दो तरह की नान का जिक्र मिलता है-
- नान-ए-तनुक- जो बहुत पतली और नाजुक होती थी।
- नान-ए-तनूरी- जो तंदूर में पकी हुई मोटी और फूली हुई रोटी होती थी।
मुगल काल के दौरान भी नान का जलवा बरकरार रहा। रसोइयों ने इसके साथ कई प्रयोग किए। जैसे परतों वाली नान-ए-वरकी और छोटे आकार वाली नान-ए-तंगी, जो ग्रेवी को अच्छे से सोख लेती थी।
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(Picture Courtesy: Freepik)
कैसे बनी आम आदमी की पसंद?
ब्रिटिश शासन के दौरान नान धीरे-धीरे विदेशों तक पहुंचने लगी। समय के साथ इसे बनाने की जटिल तकनीकें आसान होती गईं। मैदे, दही और खमीर के मिश्रण से बनने वाली यह रोटी धीरे-धीरे शाही महलों से निकलकर आम जनता के ढाबों और रेस्टोरेंट तक पहुंच गई। आज इसे हाथों से थपथपाकर गर्म तंदूर में तब तक सेंका जाता है जब तक कि इस पर भूरे निशान न पड़ जाएं और फिर ब्रश से इस पर घी या मक्खन लगाया जाता है।
आधुनिक दौर और नए स्वाद
आज की नान केवल सादी नहीं रह गई है। दुनिया के बेहतरीन खानों की सूची में बटर गार्लिक नान और आलू नान जैसे विकल्पों ने अपनी जगह बनाई है। 90 के दशक के बाद से शेफ ने इसके साथ और भी प्रयोग किए हैं। अब आपको मशरूम, पनीर, पालक और यहां तक कि विदेशों में ट्रफल चीज़ नान जैसे आधुनिक अवतार भी देखने को मिलते हैं।
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(AI Generated Image)
नान सिर्फ एक रोटी नहीं है, बल्कि यह संस्कृतियों के मिलन की कहानी कहती है। यह कहानी है कि कैसे अलग-अलग परंपराएं मिलकर एक बेहतरीन स्वाद पैदा कर सकती हैं। आज नान न केवल दक्षिण एशिया बल्कि पूरी दुनिया में भारतीय पाक कला का बेहतरीन नमूना बन चुका है।
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