122 साल पहले एक मेले में हुई थी 'आइसक्रीम कोन' की शुरुआत, बर्तन खत्म होने पर दुकानदार ने किया था जुगाड़
गर्मियों के दिनों में जब हम मजे से आइसक्रीम खा रहे होते हैं, तो उसके नीचे का कुरकुरा 'कोन' उस स्वाद को दोगुना कर देता है, लेकिन क्या आपने कभी सोचा है ...और पढ़ें

कभी सोचा है कैसे हुई कोन में Ice Cream भरने की शुरुआत? (Image Source: AI-Generated)

समय कम है?
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लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। सोचिए, चिलचिलाती गर्मी का दिन है और आपके हाथ में आपकी फेवरेट आइसक्रीम है। आप उसे मजे से खा रहे हैं और फिर उस आखिरी कुरकुरे, क्रंची हिस्से तक पहुंचते हैं... मजा एकदम दोगुना हो जाता है, है ना?
लेकिन जरा सोचिए, अगर यह 'कोन' न होता तो क्या आइसक्रीम खाने का वह एहसास उतना ही खास होता? आपको जानकर शायद हैरानी होगी कि आइसक्रीम को थामने वाला यह साधारण-सा कोन रातों-रात वजूद में नहीं आया था।
यह एक ऐसी अनोखी कहानी है, जिसमें जरूरत के वक्त किया गया एक शानदार जुगाड़ और एक अनसुलझी पहेली छिपी है। आइए, इस आर्टिकल में जानते हैं कि आखिर यह क्रंची कोन हमारी आइसक्रीम का साथी कैसे बन गया।

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न्यूयॉर्क की सड़कों से आया पहला दावा
कोन के आविष्कार की कहानी में जो सबसे पहला नाम सामने आता है, वह है इटालो मार्चिओनी। दरअसल, मार्चिओनी न्यूयॉर्क शहर में एक ठेले पर 'लेमन आइस' बेचा करते थे।
उनका दावा था कि उन्होंने ही 1896 में दुनिया का सबसे पहला आइसक्रीम कोन तैयार किया था। अपनी इस बात को पुख्ता करने के लिए, उन्होंने 1903 में कोन बनाने वाले सांचे का आधिकारिक पेटेंट भी अपने नाम करवा लिया था।
1904 का वर्ल्ड्स फेयर और एक शानदार इत्तेफाक
भले ही मार्चिओनी के पास पेटेंट था, लेकिन आइसक्रीम कोन को रातों-रात पूरी दुनिया में मशहूर करने का श्रेय 1904 में हुए 'सेंट लुइस वर्ल्ड्स फेयर' को जाता है। इसी ऐतिहासिक मेले में एक ऐसी घटना घटी, जिसने आइसक्रीम परोसने का तरीका हमेशा के लिए बदल दिया।
हुआ कुछ यूं कि मेले में एक आइसक्रीम विक्रेता के पास ग्राहकों की भारी भीड़ आ गई और आइसक्रीम देने के लिए उसके पास बर्तन खत्म हो गए। उसी के स्टॉल के ठीक बगल में सीरियाई मूल के अर्नेस्ट ए. हमवी अपनी दुकान लगाए हुए थे। हमवी ग्राहकों के लिए 'जलाबिया' नाम का एक कुरकुरा वॉफल बना रहे थे।
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अपने पड़ोसी दुकानदार को मुसीबत में देख, हमवी ने एक बेहतरीन तरकीब निकाली। उन्होंने अपने गरमागरम वॉफल को गोल घुमाकर एक कोन का आकार दे दिया, ताकि उसमें आइसक्रीम रखकर ग्राहकों को दी जा सके। लोगों को यह नया तरीका इतना ज्यादा पसंद आया कि मेले में इसे "वर्ल्ड्स फेयर कॉर्नुकोपिया" का नाम दे दिया गया।
तो फिर उलझन क्या है?
इस शानदार इत्तेफाक ने कोन को मशहूर तो कर दिया, लेकिन इसके असली आविष्कारक को लेकर उलझनें और बढ़ा दीं। सेंट लुइस मेले के खत्म होने के बाद, वहां मौजूद कई अन्य दुकानदारों ने भी यह दावा करना शुरू कर दिया कि वाफल को कोन में बदलने का असल आइडिया उनका था।
कई लोगों के इस दावे की वजह से ही आइसक्रीम कोन का इतिहास आज भी थोड़ा धुंधला और विवादित माना जाता है।
भले ही हम आज तक यह तय नहीं कर पाए हैं कि आइसक्रीम कोन का असली आविष्कारक इटालो मार्चिओनी थे, अर्नेस्ट हमवी थे, या फिर मेले का कोई और दुकानदार, लेकिन एक बात तो पक्की है कि जिसने भी अपनी सूझबूझ से यह क्रंची आविष्कार किया, उसने दुनिया भर के लोगों के लिए आइसक्रीम खाने का तजुर्बा हमेशा के लिए मजेदार बना दिया।