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    बदलता मौसम और प्रदूषण मिलकर ट्रिगर कर रहे हैं आपका माइग्रेन, नई रिसर्च में चौंकाने वाला खुलासा

    Updated: Sat, 18 Apr 2026 09:29 AM (IST)

    हालिया शोध से पता चला है कि वायु प्रदूषण और मौसम में बदलाव माइग्रेन के दौरे को बढ़ा सकते हैं। ' ...और पढ़ें

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    प्रदूषण और बदलते मौसम से बढ़ सकता है आपका माइग्रेन: नई रिसर्च में हुआ खुलासा (Image Source: AI-Generated)

    प्रेट्र, नई दिल्ली। क्या आप भी अक्सर तेज सिरदर्द या माइग्रेन से परेशान रहते हैं? अगर हां, तो आपके लिए एक बेहद जरूरी जानकारी है। हाल ही में हुए एक शोध से यह साफ हुआ है कि वायु प्रदूषण के संपर्क में आने से माइग्रेन की समस्या काफी बढ़ सकती है।

    रिसर्च के अनुसार, चाहे आप प्रदूषण के संपर्क में थोड़े समय के लिए आएं या फिर लगातार इसके बीच रहें, दोनों ही स्थितियां आपके माइग्रेन को बढ़ाने का काम करती हैं।

    Weather change migraine symptoms

    (Image Source: AI-Generated)

    'न्यूरोलॉजी' पत्रिका में छपी अहम जानकारी

    यह महत्वपूर्ण निष्कर्ष मशहूर 'न्यूरोलॉजी' पत्रिका में प्रकाशित एक रिसर्च से सामने आया है। इस अध्ययन में यह भी बताया गया है कि केवल हवा की गंदगी ही नहीं, बल्कि मौसम के कुछ खास बदलाव भी इसमें बड़ी भूमिका निभाते हैं। गर्मी और हवा में नमी जैसे जलवायु कारक भी आपके सिरदर्द को गहराई से प्रभावित कर सकते हैं।

    पर्यावरण के कारक कैसे करते हैं असर?

    इस रिसर्च को इजरायल के बीर शेवा में स्थित 'बेन-गुरियन यूनिवर्सिटी ऑफ द नेगेव' के शोधकर्ताओं ने अंजाम दिया है। प्रमुख शोधकर्ता इडो पेलेस का कहना है कि इन नतीजों से हमें यह समझने में काफी मदद मिलती है कि माइग्रेन के दौरे आखिर कब और कैसे पड़ते हैं।

    पेलेस बताते हैं कि जिन लोगों को पहले से ही माइग्रेन की शिकायत रहती है, उनके लिए बाहरी पर्यावरण दो अलग-अलग तरह से काम करता है:

    • खतरा बदलने वाले कारक: गर्मी और नमी जैसे मौसम से जुड़े कारक माइग्रेन के दौरे के जोखिम को कम या ज्यादा कर सकते हैं।
    • ट्रिगर करने वाले कारक: हवा में प्रदूषण के स्तर का अचानक बढ़ना माइग्रेन के दर्द को तुरंत ट्रिगर कर सकता है (यानी दर्द शुरू कर सकता है)।

    10 सालों तक 7,000 मरीजों पर हुई स्टडी

    यह कोई छोटा अध्ययन नहीं था। नेगेव रेगिस्तान के बीर शेवा इलाके में रहने वाले माइग्रेन से पीड़ित 7,000 से अधिक लोगों पर औसतन 10 सालों तक नजर रखी गई। इस लंबे समय के दौरान, वैज्ञानिकों ने यह अध्ययन किया कि ये प्रतिभागी रोजाना गाड़ियों के धुएं, कारखानों और धूल से होने वाले प्रदूषण का कितना सामना कर रहे हैं। साथ ही उनके मौसम के संपर्क का भी डेटा रखा गया।

    अध्ययन के आखिर में, उन लोगों की संख्या और उनके अस्पताल जाने के समय का बारीकी से विश्लेषण किया गया, जिन्हें बहुत तेज माइग्रेन के दर्द के कारण चिकित्सा केंद्र जाना पड़ा था। इसी डेटा के आधार पर प्रदूषण और माइग्रेन के बीच का यह गहरा संबंध साबित हुआ है।

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