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रंग-बिरंगे धागों और कौड़ियों से बना ऊंट का वो गहना, जिससे निकला है राजस्थान का ‘गोरबंद लोकगीत’, रोचक है कहानी 

Updated: Thu, 27 Aug 2026 01:08 PM (IST)

राजस्थान का एक ऐसा भी लोकगीत है जो ऊंट की गहने से बना है।

राजस्थान के गोरबंद लोकगीत की कहानी (Image Source: AI Generated)

राजस्थान के गोरबंद लोकगीत की कहानी (Image Source: AI Generated)

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लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। राजस्थान का जिक्र जब भी होता है तो ऊंट सबसे पहले याद आता है, मानो वहां कुछ और इतना यादगार न हो। राज्य से ऊंट के जुड़ाव की इसी विशेषता ने गोरबंद नामक लोकगीत को जन्म दिया। हम आज इसी गोरबंद से जुड़े लोकगीत की बात करने वाले हैं, जो सिर्फ एक लोकगीत नहीं बल्कि ऊंट और उसके मालिक के बीच अटूट लगाव की एक दास्तान है। 

राजस्थान के गोरबंद लोकगीत की कहानी 

राजस्थान का गोरबंद लोकगीत ऊंट के शृंगार से जुड़ा हुआ है क्योंकि गोरबंद ऊंट के गले का हार होता है। यहां के ग्रामीण इलाकों में जब भी ऊंट को सजाया जाता है या फिर पुष्कर जैसे बड़े मेलों की तैयारी होती है तब इस गीत को गाए जाने की परंपरा है। 

खासकर महिलाएं अपने ऊंट को तैयार करते समय इसे बड़े चाव से गाती हैं। यह खासतौर से थार और शेखावाटी क्षेत्रों का एक प्रचलित लोकगीत है। इसके बोल इन क्षेत्रों में अक्सर सुनने को मिल जाएंगे : 

“लड़ली लूमा-झूमा ए, मारो गोरबंद नखरालो…”

इस गीत में एक महिला अपनी भावना को प्रदर्शित करती है, जब वो अपने ऊंट के लिए गोरबंद तैयार कर रही होती है। इसमें नखरालो का मतलब है नखरे वाला या बेहद आकर्षक। गोरबंद गीत गुनगुनाते हुए महिला उसे बनाने से जुड़ी मेहनत के बारे में भी बताती है कि कैसे जेठ और आषाढ़ के भयंकर गर्मी वाले मौसम में उन्होंने गोरबंद बनाया। इस तरह गोरबंद गीत गर्व और खुशी का भी प्रतीक है, जिसे एक पशुपालक अपने ऊंट को सजाते समय गहराई से महसूस करता है।

लोकगीत की तर्ज पर गोरबंद नृत्य 

ग्रामीण इलाकों में खास मौकों जैसे मेलों के आयोजन या त्योहारों पर गोरबंद लोकगीत पर नृत्य किए जाने की भी परंपरा है। इसमें नर्तकियां डांस करते समय ऊंट की चाल और उसे सजाने की मुद्राओं को परफॉर्म करती हैं। इस दौरान राजस्थानी की पारंपरिक पोशाक घाघरा-चोली पहनकर महिलाएं लोकगीत की धुन पर नाचती हैं। 

गोरबंद एक आभूषण नहीं परंपरा का प्रतीक

गोरबंद मरुस्थल की बड़ी पहचान है, क्योंकि यह महिलाओं की हस्तकला का प्रदर्शन करता है। इसे बनाने के लिए कांच के टुकड़े, कौड़ियों, मोतियों, रंग-बिरंगे धागों और बटन का उपयोग कर सुंदर कढ़ाई की जाती है। वहीं, यह कई हफ्तों की मेहनत के बाद बनकर तैयार होता है। जैसलमेर और बाड़मेर में तो ऊंट को इस तरह सजाना सम्मान की नजर से देखा जाता है।  

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