नृत्य एक, लेकिन अंदाज चार! क्या आप जानते हैं क्या होते हैं कथक के 'घराने' और क्यों इतने अलग हैं इनके तेवर?
कथक भारतीय शास्त्रीय नृत्य की एक प्राचीन शैली है, जिसके चार प्रमुख घराने हैं - बनारस, लखनऊ, जयपुर और रायगढ़।

कथक के घराने क्या होते हैं? (AI Generated Image)

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लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। अगर भारतीय शास्त्रीय नृत्य की बात करें, तो कथक का नाम सबसे पहले आता है। कथक की जड़ें काफी पुरानी हैं और कथावाचन परंपरा से जुड़ी है। कथक शब्द का मतलब भी कथा कहना होता है, यानी नृत्य के जरिए कहानी सुनाना।
समय के साथ यह नृत्य राजदरबारों तक पहुंचा और अलग-अलग क्षेत्रों में विकसित हुआ। इसी क्षेत्रीय विकास और गुरू-शिष्य परंपरा से कथक के अलग-अलग घराने बने। भारत में इस नृत्य के चार घराने हैं, लेकिन क्या आप जानते हैं घराने का मतलब क्या होता है? आइए जानें कथक के घराने क्या होते हैं और इसके कौन-कौन से प्रकार हैं।
घराना होता क्या है?
घराना शब्द घर से बना है। शास्त्रीय नृत्य में घराना का मतलब ऐसी खास शैली या परंपरा से है, जो किसी खास भौगोलिक क्षेत्र में किसी महान गुरु या कलाकार से शुरू की गई और पीढ़ी दर पीढ़ी गुरु और शिष्य के जरिए आगे बढ़ी।
कथक के चार घराने हैं, बनारस घराना, लखनऊ घराना, जयपुर घराना और रायगढ़ घराना। एक ही नृत्य होने के बावजूद इन चारों घरानों के बॉडी मूवमेंट, लयकारी, भाव-प्रदर्शन और संगीत काफी अलग-अलग हैं।
बनारस घराना
बनारस घराना कथक का सबसे पुराना घराना माना जाता है। इसकी शुरुआत पंडित जानकी प्रसाद जी ने की थी। इसलिए इसे जानकी प्रसाद घराना भी कहा जाता है। ये घराना अपनी सादगी और आध्यात्मिक गहराई के लिए जाना जाता है।
इस घराने की सबसे बड़ी पहचान इसके नटवरी बोल हैं। इसमें तबले या पखावज के बोलों का इस्तेमाल नहीं होता। साथ ही, पैरों की थाप में तालियां और उठान भी बहुत मुश्किल नहीं होते। इसकी एक और खास बात है कि इसमें तांडव और लास्य शैलियों का बैलेंस देखने को मिलता है।
लखनऊ घराना
लखनऊ घराना अवध के नवाबों के सरंक्षण में विकसित हुआ। इस घराने के संस्थापक महाराज ईश्वरी प्रसाद जी माने जाते हैं। अवध में विकसित होने के कारण ये घराना अपने नाजुक भाव-प्रदर्शन और नजाकत के लिए जाना जाता है।
इसमें शरीर के मूवमेंट्स की बारीकी और अभिनय पर खास ध्यान दिया जाता है। इस घराने में ठुमरी, गजल और ददरा संगीत शैली पर नृत्य किया जाता है। पंडित बिरजू महाराज इसी घराने के प्रतिनिधि रहे हैं।
जयपुर घराना
जयपुर घराना राजपूत राजाओं के दरबार में शुरू हुआ। इस घराने में लयकारी, तत्कार और चक्करों का जबरदस्त नियंत्रण होता है। यह बहुत तेज गति पर किया जाता है और इसमें पखावज के बोलों का इस्तेमाल होता है।
इस घराने में भावों को बहुत सटीकता से दिखाया जाता है। साथ ही, इसमें एक पैर पर जोर देकर चक्कर काटे जाते हैं, जो तांडव की झलक पेश करते हैं।
रायगढ़ घराना
यह कथक का सबसे नया घराना है, जिसे छत्तीसगढ़ के रायपुर रियासत के राजा चक्रधर सिंह ने विकसित किया था। उन्होंने देश के सबसे महान नर्तकों को अपने दरबार में बुलाया और इस तरह इस घराने की शुरुआत हुई।
रायगढ़ घराने में लखनऊ और जयपुर घराने का मेल देखने को मिलता है। इसमें नए बोलों और ताल के साथ नृत्य किया जाता है।
