सिर्फ डांस नहीं, समाजिक भेदभाव के खिलाफ क्रांति है पंथी नृत्य, छत्तीसगढ़ के सतनामी समुदाय से जुड़ा है इसका नाता
छत्तीसगढ़ का पंथी नृत्य वहां के सतनामी समुदाय से जुड़ा है। ये नृत्य बहुत ही दिलचस्प तरीके से किया जाता है।

छत्तीसगढ़ के पंथी नृत्य की दिलचस्प कहानी (AI Generated Image)

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लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। छत्तीसगढ़ की संस्कृति की बात करें, तो वहां के लोक नृत्यों के बारे में बात करना जरूरी है। यहां के लोक नृत्यों में पंथी नृत्य शामिल है, जो सतनामी समुदाय की पहचान माना जाता है।
ये नृत्य सिर्फ मनोरंजन के लिए नहीं किया जाता है। इस नृत्य की शुरुआत के पीछे कई दिलचस्प कारण छिपे हैं। आइए जानें क्यों किया जाता है पंथी नृत्य और इसका इतिहास क्या है।
पंथी नृत्य का इतिहास क्या है?
पंथी नृत्य छत्तीसगढ़ के सतनामी समुदाय और संत गुरु घासीदास जी से जुड़ा है। सतनाम पंथ की स्थापना गुरु घासीदास जी ने की थी। उन्होंने समाज में फैली कुप्रथाओं, ऊंच-नीच और भेदभाव के खिलाफ मनावता का संदेश दिया था।
ये नृत्य सदियों से चला आ रहा है और माघ पूर्णिमा के अवसह पर खासतौर से आयोजित किया जाता है। इस दिन एक ऊंचा जैतखंभ बनाया जाता है, जिसके चारों ओर इकट्ठा होकर सतनामी समुदाय के नर्तक पंथी नृत्य करते हैं। ये नृत्य सिर्फ मनोरंजन के लिए नहीं किया जाता। इस नृत्य के जरिए भक्ति, एकता और समानता का संदेश दिया जाता है।
क्या है पंथी नृत्य की खासियत?
पंथी नृत्य की अपनी खास शैली है, जो उसे दूसरे नृत्यों से अलग बनाती है। ये एक फास्ट स्टेपिंग डांस है, जिसमें नर्तक अपनी बॉडी फ्लेक्सिबिलिटी और बेहतरीन डांस स्टेप्स पेश करते हैं। इस नृत्य के दौरान नर्तक कई मुश्किल संरचनाएं बनाते हैं, जैसे ह्यूमन पिरामिड।
नृत्य के बीच में सीटी बजाना स्टेप्स में बदलाव का संकेत होता है। साथ ही, मुख्य नर्तक आहा, आहा की आवाज निकालकर साथियों का उत्साह बढ़ाता है। इस नृत्य को बैंजो, ढोलक और तबले जैसे पारंपरिक वाद्य यंत्रों की धुन पर किया जाता है।
इस नृत्य के लिए नर्तकों की भेशभूषा काफी साधारण होती है। नर्तक सफेद धोती, कमरबंद, घुंघरू और गले में माला पहनते हैं। हालांकि, अब इसमें कुछ बदलाव देखने को मिल रहा है और नर्तक रंगीन शर्ट या जैकेट पहनकर भी ये नृत्य करते हैं।
क्यों किया जाता है पंथी नृत्य?
पंथी नृत्य के जरिए ईश्वर और सतनाम पंथ के संस्थापक गुरु घासीदास जी के लिए श्रद्धा व्यक्त की जाती है। इसके गीतों के जरिए कबीर और संत रविदास जैसे गुरुओं का संदेश दर्शकों तक पहुंचाया जाता है।
ऐतिहासिक रूप से समाज में भेदभाव का सामना करने वाले समुदाय के लिए पंथी नृत्य अपना सम्मान बचाने का एक शांतिपूर्ण तरीका था। आज खास त्योहारों और सामुदायिक कार्यक्रमों में भी पंथी नृत्य किया जाता है।
