'परफेक्शन ट्रैप' में फंसकर बेहतरीन मौके गंवा देती हैं महिलाएं, अधूरी तैयारी पर भी पीछे नहीं हटते पुरुष
करियर हो, नई स्किल सीखनी हो या किसी बड़े मौके को पकड़ना- हर जगह महिलाओं पर तैयारी का जो ‘अदृश्य दबाव’ होता है, वह उनकी रफ्तार को धीमा कर देता है। कई शोध बताते हैं कि महिलाएं किसी अवसर को तभी अपनाती हैं, जब वे खुद को पूरी तरह तैयार महसूस करती हैं। इसके विपरीत पुरुष अक्सर आधी तैयारी या लगभग 60-70% भरोसे पर भी कदम बढ़ा लेते हैं। यही अंतर आगे चलकर नेतृत्व, प्रमोशन और अवसरों की उपलब्धता को प्रभावित करता है।

'परफेक्ट' बनने का इंतजार, महिलाओं को क्यों करवाता है बेहतरीन मौके से दूर? (Image Source: Freepik)
लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। कई बार ऐसा होता है कि कोई सुनहरा अवसर सामने खड़ा होता है- करियर में बड़ा प्रमोशन, नई जिम्मेदारी या कोई चैलेंजिंग प्रोजेक्ट। पुरुष अक्सर ऐसे मौके को तुरंत पकड़ लेते हैं, भले ही उन्हें भीतर से लगे कि शायद वे पूरी तरह तैयार नहीं हैं। पर दूसरी तरफ वही अवसर, जब किसी महिला के सामने आता है, तो वह पहले खुद को हर मानक पर परखती है, सोचती है- “क्या मैं पूरी तरह तैयार हूं? क्या मुझसे कोई गलती तो नहीं होगी?”
इस परफेक्ट बनने की प्रतीक्षा में कई महिलाएं उन मौकों को खो देती हैं जो उनके करियर की दिशा बदल सकते थे। दिलचस्प बात यह है कि जिन क्षमताओं पर वे शक करती हैं, वही क्षमताएं कई बार उन्हें औरों से ज्यादा मजबूत बनाती हैं, लेकिन आत्मविश्वास और सामाजिक अपेक्षाओं का दबाव उनकी गति को धीमा कर देता है।

जब तक 100% भरोसा न हो, महिलाएं कदम नहीं बढ़ातीं
हार्वर्ड बिजनेस स्कूल और फोर्ब्स की स्टडी बताती है कि महिलाएं अवसर लेने से पहले खुद को हर मानक पर परखती हैं। वे तब तक आगे नहीं बढ़तीं, जब तक उन्हें यह महसूस न हो जाए कि वे पूरी तरह तैयार हैं। दूसरी तरफ पुरुष अपूर्ण तैयारी के बावजूद अवसर को आजमा कर देखते हैं। इस ‘परफेक्शन ट्रैप’ के कारण कई सक्षम महिलाएं अपने करियर में जरूरत से ज्यादा इंतजार करती रह जाती हैं।
बचपन से शुरू होती है यह परफेक्शन ट्रेनिंग
मनोवैज्ञानिकों के अनुसार छोटी उम्र से ही लड़कियों को यह सिखाया जाता है कि वे गलती न करें और हर काम बिल्कुल सही हो। इससे उनके भीतर एक अदृश्य मानक बन जाता है- सब कुछ परफेक्ट होना चाहिए। इसके उलट लड़कों को अक्सर यह संदेश दिया जाता है कि कोशिश करना और गलती करना भी सीखने का हिस्सा है। यही अंतर आगे चलकर दोनों में जोखिम लेने की क्षमता को बदल देता है।
महिलाएं करती हैं मौका आने का इंतजार
नेतृत्व की भूमिकाओं में यह फर्क और भी गहरा दिखता है। महिलाएं अक्सर सोचती हैं कि जब वे पूरी तरह काबिल हो जाएंगी, तब आगे बढ़ेंगी। जबकि पुरुष कदम बढ़ाकर अपनी ‘बारी’ खुद बना लेते हैं। मैकिंजी-लीनइन की रिपोर्ट कहती है कि समस्या कौशल में नहीं, बल्कि आत्म-विश्वास में है। विशेषज्ञ इसे कॉन्फिडेंस गैप कहते हैं- जहां कमी क्षमता की नहीं, बल्कि भरोसे की होती है।
हार्वर्ड रिसर्च के अनुसार महिलाएं नेतृत्व पद के लिए आवेदन करने से पहले पुरुषों की तुलना में 30-40% ज्यादा तैयारी करना चाहती हैं। यही अतिरिक्त प्रतीक्षा उनकी गति को धीमा कर देती है।

आलोचना का डर भी रोकता है कदम
एक और पहलू है सामाजिक दंड। कई अध्ययन बताते हैं कि अगर महिलाएं अपने काम और उपलब्धियों के बारे में दृढ़ता से बोलती हैं, तो उन्हें पुरुषों की तुलना में अधिक आलोचना का सामना करना पड़ता है। यह प्रतिष्ठात्मक जोखिम उन्हें और सतर्क बना देता है। वे सोचने लगती हैं कि तभी आगे बढ़ना चाहिए, जब हर चीज बिल्कुल सही हो।
धीमी गति सपनों को नहीं, टाइमलाइन को धीमा करती है
हार्वर्ड की प्रोफेसर रॉबिन जे. एली कहती हैं कि महिलाओं की यह सावधानी उनके सपनों को नहीं रोकती, बल्कि उनकी टाइमलाइन को लंबा कर देती है। दिलचस्प बात यह है कि जब महिलाएं नेतृत्व में पहुँचती हैं तो उनका प्रदर्शन कई बार पुरुषों से बेहतर होता है। उनकी नेतृत्व शैली सहयोग, सहानुभूति और टीम-इन्क्लूजन पर आधारित होती है। यानी बाधा कभी योग्यता में नहीं होती—बाधा भरोसे में होती है।
सेल्फ-कॉन्फिडेंस को कमजोर करने वाले फैक्टर
अनेक शोध बताते हैं कि महिलाओं के आत्म-विश्वास पर कई छिपे कारक असर डालते हैं:
- महिलाओं में इम्पोस्टर सिंड्रोम पुरुषों की तुलना में 30% अधिक पाया जाता है।
- किसी निर्णय से पहले उनका दिमाग जोखिम को लगभग दोगुना स्कैन करता है।
- 76% महिलाओं को लगता है कि गलती करने पर उन्हें ज्यादा जज किया जाएगा।
- नेतृत्व विकास में स्पॉन्सरशिप की कमी एक बड़ी बाधा है।
- लेकिन सहयोगात्मक माहौल मिलते ही उनका प्रदर्शन तेजी से निखरता है।
तैयारी, परफेक्शन और आलोचना- ये तीन बड़े कारण महिलाओं के लिए निर्णय लेने की गति को धीमा कर देते हैं। जबकि सच्चाई यह है कि वे न केवल उतनी ही सक्षम हैं, बल्कि बेहतर नेतृत्व भी प्रदर्शित करती हैं। जरूरत सिर्फ उस अदृश्य दबाव को पहचानने और आत्म-विश्वास को आगे लाने की है, ताकि अवसरों का इंतजार न करना पड़े- उन्हें खुद बनाया जा सके।

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