रिसर्च का दावा- 15 सालों में 30% कम हुए हमारे शब्द, क्या गैजेट्स छीन रहे हैं इंसानों के बात करने की क्षमता?
क्या आपको भी लगता है कि आप पहले के मुकाबले कम बोल रहे हैं, शब्दों के बजाय संकेत या इमोजी ...और पढ़ें

क्यों कम होती जा रही है बातचीत? (Picture Courtesy: Freepik)

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। अभी आंख खुली भी नहीं थी कि कामवाली अम्मा के नहीं आने की खबर ने वसुधा को चिंता में डाल दिया। कई काम करने थे। पति ने सलाह दी कि एप से इंस्टेंट मेड बुक कर लें तो मुश्किल आसान होगी। पति को चाय देकर बसुधा मेड के इंतजार में फोन स्क्रॉल करने लगी। कॉलबेल बजी।
दरवाजा खोला तो सामने मेड को देखकर राहत मिली। अपना दुपट्टा कमर में खोंसते हुए मेड ने पूछा- मैडम क्या-क्या काम है? रसोई में बर्तन पड़े हैं और घर बिखरा पड़ा है। जाने कैसे एक घंटे में पूरा होगा? बसुधा की यह चिंता तब हैरत में बदल गयी जब मेड ने तपाक से कहा- अरे मैडम मैं है ना। आप बस देखती जाओ।
बसुधा हंसे बिना न रह सकीं और इस तरह बातों-बातों में कब एक घंटा निकल गया कि पता नहीं चला। उसने जाते हुए कहा- आप अच्छी हो मैम, वैसे मुझे कम ही लोग अच्छा कहते हैं, पर मैं जैसे को तैसा व्यवहार देती हूं, अच्छा करती हूं न? मेड का यह अंदाज बसुधा के दिल को छू गया था। क्या एक अपरिचित भी इतना गहरा प्रभाव छोड़ सकता है? वह इस प्रश्न में डूब गईं।
यह आधुनिक शहरी जीवन की एक सामान्य सी तस्वीर है। यहां फुर्सत के पल और उसमें यूं बातचीत करना महंगी चीज हो गई है। लोग ऐसी बातचीत के लिए विशेष तौर पर प्रयास करते हैं। किटी पार्टी हो या रनिंग क्लब इनका सदस्य बनना होता है।
पता पूछने के बहाने ही रास्ते में अजनबियों से जुड़ जाया करते थे कभी, पर अब ऐसा कम होता है, क्योंकि आज गूगल मैप हर फोन में मौजूद है। हम दफ्तर में रहें या फिर घर पर आपस में पहले से कम बातचीत करते हैं। इन दिनों 'बात नहीं कर सकते, मैसेज करो' जैसे वाट्सएप स्टेटस बताते हैं कि लोग इमोजी और संकेतों में बात को अधिक प्राथमिकता दे रहे हैं।
अधिकांश समय अब अपने गैजेट, फोन या कंप्यूटर के साथ बीत रहा है। जहां बात तो होती है हमेशा, पर अपनों से हो या अजनबियों से मिलकर होने वाली बात अधिक महत्वपूर्ण है, क्योंकि यहां शब्द अधिक खर्च होते हैं और आपसी जुड़ाव भी बढ़ता है।
ताकि गलतफहमियों की गुंजाइश न रहे
रोजाना कोशिश रहती है तय किए गए काम पूरे हो जाएं। दिनभर मजबूती से मोर्चे पर जुटे रहने के लिए वॉक करें, जिम जाएं, पर ज्यादातर लोग इस दौरान हेडफोन लगाए पॉडकास्ट या संगीत सुन रहे होते हैं। साथ वालों से कोई बातचीत नहीं करते।
परिवार संग कहीं बाहर घूमने जाना हो तो गाड़ी में बैठते ही संगीत चालू किया जाता है, तो सामने बैठकर भी बात नहीं करते। आस-पड़ोस में आने-जाने का समय तो अब गाहे-बगाहे ही निकल पाता है और घर पर लैपटाप या फोन थामे हुए किसी से बात वास्तविक संवाद नहीं कहला सकता।
दरअसल, संवाद का अर्थ ठीक से सुनना भी होता है और काम करते हुए आप यह पूरी तरह नहीं कर पाते। इन स्थितियों को लेकर वरिष्ठ साइकोथेरेपिस्ट नयामत बावा कहती हैं, ज्यादातर लोग फोमो यानी फियर ऑफ मिसिंग आउट के शिकार हैं। उन्हें लगता है कि उनसे कुछ मिस न हो जाए। घर हो या दफ्तर आपसी बातचीत को अहमियत नहीं देते या इससे बचना चाहते हैं।
बावा के अनुसार, स्क्रीन पर लगातार सक्रिय रहने व काम के दबाव से मानसिक थकान हावी रहता है। ऐसे में जब किसी से दिल की बात साझा नहीं कर पाते तो वही तनाव अंदर ही अंदर बढ़ता रहता है। जब हम किसी से सीधे नहीं मिलते, बात नहीं करते तो उनके हावभाव और भावनाओं को समझने की क्षमता भी खोने लगते हैं। इससे गलतफहमियां उपजती हैं, जो इन दिनों रिश्ते खराब होने का बड़ा कारण हैं।
अनुभव होंगे तो शब्द भी
हर वर्ग जूझ रहा है। गुस्सा, असंतोष बढ़ता जा रहा है। इसका बड़ा कारण है वास्तविक दुनिया से कटना। लोग अधिकांश समय बनावटी दुनिया यानी इंटरनेट मीडिया से जुड़े रहते हैं। इससे जीवन के अनुभव कम मिलते हैं। जब अनुभव कम होने लगते हैं तो शब्द भी खोने लगते हैं।
नयामत बावा, साइकोथेरेपिस्ट
इस जुड़ाव का विकल्प नहीं
बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी की समाजशास्त्र की प्रोफेसर डॉ. प्रतिमा गोंड के अनुसार, बदलता हुआ समाज अपने तौर-तरीके को भी बदलता है। आज जहां एक साथ रहना कठिन हो रहा है, वहां डिजिटल संवाद इसकी एक बड़ी जरूरत है अन्यथा दूर-दूराज में रह रहे अपनों से कैसे बात होती? जिन बच्चों के आने से ही अब होली-दीवाली त्योहार होते हैं, उन मां-बाप की खुशी का क्या होता? पर क्या डिजिटल माध्यम संवाद की आत्मा बन सकती है? एक इमोजी गले लगने या मुस्कुराना वाला वही वास्तविक एहसास दे सकता है?
डॉ. प्रतिमा के अनुसार, आपस में मिल-बैठने, बात करने का विकल्प तकनीकी साधन नहीं बन सकता। लोग स्क्रीन के सामने घंटों बिताने के आदी हो चुके हैं और धीरे धीरे सामाजिक आयोजनों और मेल-मिलाप से भी कटने लगे हैं। इससे सामाजिक दायरा भी सिकुड़ रहा है, जो कि सामाजिक सेहत के लिए सही नहीं।
गैजेट का दुरुपयोग न हो
आपस में मिलना-जुलना आज लक्ष्य आधारित हो गया है। कोई काम हो तभी मिलते हैं। ऐसे में प्रयास करें कि जब मिलें फोन, गैजेट से दूर रखें। गुणवत्तापूर्ण बातचीत हो अन्यथा इसे गैजेट का दुरुपयोग ही कहा जाएगा, जहां आप रिश्तों को अपनी गलती से दूर कर रहे हैं।
डॉक्टर प्रतिमा, समाजशास्त्री, बीएचयू, वाराणसी
लाइफस्टाइल ब्रांड योगिनी की फाउंडर व सीईओ कशिका मल्होत्रा यहां अपना अनुभव साझा करती हैं- मेरे कजिन कनाडा में रहते हैं। मेरे ज्यादातर दोस्त विदेश में ही हैं। उनसे कनेक्ट रहने के लिए वीडियोकाल, मैसेज, वॉइस नोट अच्छे साधन हैं, पर इसके बाद भी मुझे हमेशा उनके मिलने का इंतजार रहता है।
कशिका कहती हैं कि कोई आपको फोन पर कहे कि हां, वह ठीक है तो जरूरी नहीं कि यह सही हो। जब उसी व्यक्ति से मिलते हैं तो स्थिति इसके उलट भी हो सकती है। इसलिए मैं हमेशा अपनी ऑफिस टीम हो या घर पर पर्सनल मिलने-बात करने में भरोसा करती हूं। इससे समझ बढ़ती है और एक-दूसरे पर भरोसा भी।
सुकून के लिए
एक मैसेज लिखना या किसी को काल कर लेना आसान है, पर किसी के सामने बैठकर बात करना अधिक सार्थक होता है। हर कोई किसी न किसी परेशानी से जूझ रहा है। अनजान भी मिले तो उससे मिलें-बात करें। यह आपको एक अलग स्तर का सुकून देगा।
कशिका मल्होत्रा, फाउंडर व सीईओ, योगिनी
एक औसतन आदमी सोलह हजार शब्द रोजाना बोलता है, जो कम होता जा रहा है। अमेरिका की यूनिवर्सिटी ऑफ एरिजोना और यूनिवर्सिटी ऑफ मिसौरी के अनुसार, वर्ष 2005 से 2019 के बीच प्रतिदिन बोले जाने वाले शब्दों की संख्या तेजी से घटी है। इसमें लगभग 30 प्रतिशत की कमी आ गई है।
कुछ नियम तय करें
- दिन में कुछ समय स्क्रीन से दूर रहें।
- घर में नो गैजेट जोन बनाएं, जहां गैजेट का प्रवेश न हो।
- दोस्तों-रिश्तेदारों से मिलने का दिन तय करें।
- अच्छे श्रोता बनें।
