रात हो गई, अकेले मत जाओ…हर बार लड़कियों को ही क्यों दी जाती है ये सलाह? साइकोलॉजिस्ट ने बताई असली वजह
आमतौर पर महिलाओं को ही हमेशा सावधान रहने की सलाह दी जाती है। ऐसा क्यों होता है, इसके बारे में जानने के लिए हमने एक्सपर्ट से बात की। आइए जानते हैं इसके ...और पढ़ें

महिलाओं को ही क्यों मिलती है हमेशा सावधान रहने की सलाह (Picture Credit- AI Generated)

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। "रात हो गई है, अब बाहर मत जाओ," "अकेले सफर मत करना, किसी को साथ ले जाओ," "ऐसे कपड़े मत पहना करो।" अगर आप भी एक लड़की या महिला हैं, तो आपने अपने घर, परिवार या दोस्तों की ये बातें न जाने कितनी ही बार सुनी होगी।
आमतौर पर लोग इन बातों को सलाह का नाम देते हैं और इसे लड़कियों की भलाई के लिए बरती जाने वाली सावधानी बताकर हर छोटी-बड़ी बात के लिए रोक-टोक करते हैं। जमाना चाहे कितना भी बदल गया हो, लेकिन आज भी एक अजीब सा रिवाज चला आ है। जब भी सुरक्षा या क्राइम की बात आती है, तो सारे नियम- कायदे और 'सावधान' रहने की हिदायतें सिर्फ महिलाओं के ही हिस्से में आती हैं।
सवाल यह उठता है कि आखिर हमेशा सावधान रहने की यह हिदायत सिर्फ महिलाओं को भी क्यों दी जाती है। इस बारे में जानने के लिए हमने सीनियर साइकोलॉजिस्ट मोनिका शर्मा से बातचीत की और ऐसे 5 कारणों के बारे में जाना, जो बताते हैं कि क्यों महिलाओं को ही हमेशा सावधान रहने की सलाह दी जाती है।
'सॉफ्ट टारगेट' समझने वाली मानसिकता
यह तो सच है कि महिलाओं की शारीरिक बनावट पुरुषों की तुलना में काफी अलग और कोमल होती है। यही वजह है कि किसी भी अपराध या अन्य मुश्किलों वाले हालातों में महिलाओं 'सॉफ्ट टारगेट' या आसान शिकार मान लिया जाता हैं। आज भी कुछ लोगों का यह सोचना है कि वे पलटकर ज्यादा विरोध नहीं कर पाएंगी। इसी डर से घर-परिवार वाले अक्सर महिलाओं को ज्यादा अलर्ट रहने की सलाह देते हैं।
खबरें और भी
डराने वाले आंकड़े
देश में महिला सुरक्षा को लेकर एनसीआरबी (NCRB) के आंकड़े सच में डराने वाले हैं। छेड़छाड़, एसिड अटैक और यौन उत्पीड़न जैसे गंभीर अपराधों में मुख्य रूप से महिलाएं ही शिकार होती हैं। हर दिन अखबारों में आने वाली खबरें परिवार के मन में खौफ पैदा कर देती हैं। यही डर उन्हें मजबूर करता है कि वे अपराधियों से लड़ने के बजाय अपनी बेटियों को ही हमेशा 'सावधान' रहने का पाठ पढ़ाएं।
'विक्टिम ब्लेमिंग' की पुरानी बीमारी
आज ही हमारे समाज में कई लोग ऐसे हैं, तो 'विक्टिम ब्लेमिंग' यानी पीड़ित लड़की को ही दोषी ठहराते हैं। कोई भी घटना होने पर अक्सर सवाल लड़की पर ही उठते हैं। "वह इतनी रात में बाहर क्यों गई थी?" या "उसने ऐसे कपड़े क्यों पहने थे?" दोषियों की परवरिश पर सवाल उठाने या उन्हें सजा दिलाने के बजाय, समाज लड़कियों की आजादी पर लगाम लगाना ज्यादा आसान और सुरक्षित समझता है।
यौन हिंसा का ज्यादा खतरा
सड़क से लेकर दफ्तर तक, महिलाओं को स्टॉकिंग, गंदे कमेंट्स सुनने और यौन शोषण जैसे हालातों का सामना पुरुषों की तुलना में कई गुना ज्यादा करना पड़ता है। इस जेंडर-स्पेसिफिक खतरे की वजह से ही सुरक्षा की सारी गाइडलाइन्स विशेष रूप से सिर्फ महिलाओं के लिए ही तैयार की जाती हैं।
'लड़कियों को सुरक्षा चाहिए' वाली सोच
पुराने समय से ही हमारी परवरिश ऐसे माहौल में की गई है, जहां मान लिया जाता है कि महिलाएं नाजुक हैं या उन्हें सुरक्षा चाहिए। जबकि आज भी लोग मर्द को दर्द नहीं होता वाली बातों पर यकीन करते हैं। इसी रूढ़िवादी सोच के कारण, हर बुरी घटना के बाद हालात बदलने की कोशिश करने के बजाय, लड़कियों को ही घर में जल्दी वापस आने या एक्स्ट्रा सावधान रहने की घुट्टी पिलाई जाती है।
क्या है इसका असली समाधान?
आज समय कितना भी बदल गया हो, लेकिन आज भी कई लोग इसी सोच में जीते आ रहे हैं। यह सही नजरिया बिल्कुल नहीं है। अब समय आ गया है कि जिम्मेदारी का यह बोझ सिर्फ लड़कियों के कंधों पर न डाला जाए। अपनी बेटियों को 'बचकर रहने' की नसीहत देने से ज्यादा जरूरी है कि बेटों को 'सम्मान करना' सिखाया जाए। तभी महिलाएं इन बेवजह की हिदायतों से आजाद होकर सही मायनों में खुलकर जी पाएंगी।
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