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पंजाब के खेतों से शुरू हुई इस लोकगीत की कहानी, आज भी पहले प्यार की याद दिला देते हैं इसके बोल

Updated: Thu, 27 Aug 2026 01:11 PM (IST)

इस लोकगीत में बाजरे की बाली को हथेली पर रगड़ने की तुलना रूठे हुए प्रेमी को मनाने की जद्दोजहद से की गई है।

जब बाजरे की बाली बनी इश्क की गवाह, दिलचस्प है इस पंजाबी लोकगीत की कहानी (Image Source: AI-Generated)

जब बाजरे की बाली बनी इश्क की गवाह, दिलचस्प है इस पंजाबी लोकगीत की कहानी (Image Source: AI-Generated) 

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लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। दोस्तों की महफिल हो, ढोलक की थाप पर सजता संगीत का मंच हो या फिर वायरल रील्स का ट्रेंड- "बाजरे दा सिट्टा" के बिना आज हर जश्न अधूरा सा लगता है।

हालांकि, जिस मॉडर्न रैप और बीट्स पर आज पूरी जनरेशन झूम रही है, उसके हर शब्द में पंजाब की संस्कृति की खुशबू बसी है। जी हां, यह सिर्फ एक ट्रेंडिंग गाना नहीं, बल्कि बाजरे की लहराती बालियों, हथेलियों की कड़ी मेहनत और प्यार में रूठने-मनाने की एक बेहद सुरीली दास्तान है। आइए, डिटेल में इस लोकगीत की गहराई को समझते हैं।

Punjabi folk song

(Image Source: AI-Generated) 

'बाजरे दा सिट्टा' का असल मतलब

यह गाना पंजाब के ठेठ देहाती जीवन और वहां की लोक संस्कृति का एक खूबसूरत हिस्सा है। 'बाजरे दा सिट्टा' का सीधा-सा मतलब होता है- 'बाजरे का भुट्टा' या 'बाजरे की बाली'। पुराने समय में जब फसल कटती थी, तो महिलाएं हाथों से अनाज को अलग किया करती थीं।

गाने की मशहूर लाइन "बाजरे दा सिट्टा, वे असां तल्ली ते मरोड़या" का असल अर्थ है- 'मैंने बाजरे की बाली (सिट्टा) को अपनी हथेली (तल्ली) पर रखकर मरोड़ा (ताकि उसमें से दाने निकल आएं)।'

सीधे-सादे बोलों में छिपी हैं गहरी भावनाएं

इस लोकगीत के बोल भले ही बहुत आसान और खेती-किसानी से जुड़े लगते हों, लेकिन इनके पीछे प्यार और मनुहार के जज्बात बहुत मजबूती से पिरोए गए हैं। इस गाने की अगली पंक्ति है:

"रुठड़ा जांदा माहिया, वे असां गली विचों मोड़ेया..."

इन लाइनों का मतलब है, "मेरा प्रेमी मुझसे रूठ कर जा रहा था, और मैंने उसे अपनी गली से ही मनाकर वापस लौटा लिया।"

यहां बाजरे की बाली को हथेली पर रगड़ने की तुलना रिश्ते की उस नाजुक मेहनत से की गई है, जहां अपने रूठे हुए प्यार को मनाने में थोड़ी जद्दोजहद और मीठी-सी तकरार लगती है। जिस तरह हथेली की मेहनत से बाजरे के दाने निकलते हैं, वैसे ही प्यार से मनाने पर रूठा हुआ साथी वापस आ जाता है।

महिलाओं की महफिल और जश्नों का अहम हिस्सा

इस गाने की धुन इतनी साधारण और शब्द इतने मीठे हैं कि यह तुरंत जुबान पर चढ़ जाता है। पुराने वक्त में जब पंजाब के गांवों में महिलाएं चरखा कातने या पारिवारिक समारोहों में एक साथ बैठती थीं, तो ढोलकी की थाप पर अक्सर ऐसे गीत गाए जाते थे।

यह गीत सिर्फ मनोरंजन के लिए नहीं गाया जाता था, बल्कि यह महिलाओं के लिए अपनी भावनाएं, प्यार की तकरार और रोजमर्रा की जिंदगी की कहानियों को एक-दूसरे के साथ साझा करने का एक बेहद खास जरिया था।

खेतों से लेकर इंस्टाग्राम रील्स तक का सफर

एक वक्त था जब यह गीत सिर्फ पंजाब के गांवों और शादियों में ढोलकी तक ही सीमित था, लेकिन आज के दौर में यह बड़े शहरों के महंगे पब और हर युवा के स्मार्टफोन में जमकर बजता है।

इसे नई पीढ़ी के बीच मशहूर करने में 2021 में आए इसके रीमिक्स वर्जन का बड़ा हाथ रहा है। रश्मीत कौर, दीप कलसी और इक्का ने इस पारंपरिक लोकगीत को एक ऐसा मॉडर्न और हिप-हॉप टच दिया कि यह हर तरफ छा गया। इस गाने के बाद से ही यह युवाओं की पार्टियों की शान बन गया और आज भी लोगों को उसी उत्साह के साथ नचाता है।

मिट्टी से जोड़े रखता है ये सदाबहार लोकगीत

आज भले ही दुनिया बहुत मॉडर्न हो गई है और तौर-तरीके बदल गए हैं, लेकिन 'बाजरे दा सिट्टा' जैसी लोक धुनें हमें हमेशा अपनी जड़ों से जोड़कर रखती हैं। यह गीत हमें बताता है कि प्यार की मीठी तकरार और अपनों को मनाने की अहमियत कभी कम नहीं होती। चाहे किसी गांव का आंगन हो या सोशल मीडिया का वायरल ट्रेंड, यह धुन हमेशा ऐसे ही लोगों के दिलों पर राज करती रहेगी और उन्हें थिरकाती रहेगी।

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