कला और अदब की पहचान थीं तवायफें, 1857 के बाद अंग्रेजों ने तबाह कर दिया इनका रुतबा; पढ़ें अनसुनी कहानी
मुगल और नवाबों के दौर में तवायफें कला, संस्कृति और तहजीब की संरक्षक थीं, जिन्हें समाज में काफी इज्जत दी जाती थी। ...और पढ़ें

कभी नवाबों को 'तहजीब' सिखाती थीं तवायफें (AI Generated Image)

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। आज हम तवायफ शब्द सुनते ही इसे प्रॉस्टिट्यूशन से जोड़कर देखते हैं। फिल्मों में भी तवायफों को ऐसी महिलाओं की तरह दिखाया जाता है, जिन्हें समाज में सम्मान नहीं मिलता, लेकिन क्या सचमुच तवायफों की कहानी यही है?
इतिहास के पन्नों को पलटकर देखें, तो तवायफों की असलियत इससे बिल्कुल अलग थी। मुगल काल और नवाबों के दौर में, तवायफों को कला, संस्कृति और तहजीब का संरक्षक माना जाता था। आइए जानें राजाओं और नवाबों के समय महफिल की शान कहलाने वाले इन कलाकारों की कहानी क्या है।
राजाओं और नवाबों के दौर में तवायफों का रुतबा
मुगल काल और अवध के नवाबों के समय में तवायफों का रुतबा काफी ऊंचा हुआ करता था। तवायफें शिक्षित, कवयित्री, संगीतकार और नृत्यांगनाएं हुआ करती थीं। इनके कोठे को अदब और तहजीब का केंद्र माना जाता था और उस दौर के रईस और नवाब अपने बेटों को बातचीत का सलीका, उठने-बैठने का तरीका और उर्दू शायरी सीखने के लिए तवायफों के पास भेजा करते थे।
ये कथक से लेकर ठुमरी, दादरा, गजल जैसे हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत की कस्टोडियन हुआ करती थीं। समाज में इनका इतना मान-सम्मान हुआ करता था कि किसी अमीर परिवार की महफिल में इनका शामिल होना, बड़े शान की बात मानी जाती थी।
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तवायफों के पास कला के साथ-साथ दौलत का भी भंडार था। कहा जाता है कि वे सबसे ज्यादा कर चुकाने वालों की सूची में शामिल होती थीं। कई बार तो ऐसा भी हुआ कि अगर किसी रईस के पास पैसों की कमी हो जाए, तो तवायफों ने उनकी मदद की है। कला और पैसों की धनी होने की वजह से इनका राजनीतिक और कूटनीतिक दबाव भी काफी गहरा था।
अंग्रेजों के दौर में बदला नजरिया
भारत में जब ब्रिटिश राज आया, तो तवायफों की जिंदगी और पहचान पूरी तरह से बदल गई। अंग्रेजों ने उन्हें नॉच गर्ल्स का नाम दिया और यहीं से तवायफों के पतन की कहानी शुरू होती है। अंग्रेज अपने साथ विक्टोरियन मोरैलिटी लेकर आए। उस दौर में विक्टोरियन समाज में महिलाओं को यूं पुरुषों के सामने खुलकर नाचने-गाने की छूट नहीं थी और इसे अनैतिक माना जाता था।
1857 की क्रांति
हालांकि, असली कहानी साल 1857 की क्रांति से शुरू होती है। पहले स्वतंत्रता संग्राम के दौरान कई तवायफों ने क्रांतिकारियों की आर्थिक रूप से मदद की और उनके कोठों में उन्हें रणनीति बनाने के ठिकाने भी बने। इस क्रांति को कुचलने के साथ अंग्रेजों ने तवायफों को भी निशाना बनाया। उनकी संपत्तियां जब्त कर ली गईं, उनके कोठों पर छापे मारे गए और उन्हें आर्थिक रूप से झकझोर दिया।
ब्रिटिश राज की साजिश
शाही संरक्षण खत्म होने और आर्थिक संकट के कारण तवायफों की आजीविका पर मुसीबत आ गई। इसी बीच ब्रिटिश सेना में सेक्शुअली ट्रांसमिटेड डिजीज फैलने लगे, जिसे रोकने के लिए ब्रिटिश राज ने एक सोची-समझी साजिश चली और सेक्स वर्कर्स और तवायफों को एक ही श्रेणी में रख दिया।
कॉन्टेशियस डिसीज एक्ट जैसे कड़े कानूनों के तहत तवायफों को जबरदस्ती मेडिकल जांच और थानों के चक्कर काटने पर मजबूर किया गया। धीरे-धीरे पूरे समाज में तवायफों को लेकर यहीं सोच फैल गई और इस तरह तवायफों का पतन हुआ और इन्हें अनैतिक मानकर लोगों ने इनसे दूरी बनानी शुरू कर दी।