नवरात्र का जोश दोगुना कर देगा गुजरात का ये 'डाकला' गीत, सुनते ही नाचने का करेगा मन
नवरात्र के दौरान गुजरात में गरबा के अलावा डाकला नृत्य और गीत की भी धूम है, जिसमें 'रमटी आवे माड़ी ...और पढ़ें

'रमटी आवे माड़ी' की धुन पर झूमेंगे आप, पढ़ें सही अर्थ (Picture Credit- AI Generated)
HighLights
नवरात्र में गुजरात का डाकला गीत 'रमटी आवे माड़ी' वायरल
यह गीत कच्छ-सौराष्ट्र की पारंपरिक शैली से जुड़ा है
देवी मां को बुलाने और बुरी शक्तियों से बचाने का पवित्र तरीका है यह गीत
लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। देश के कई हिस्सों में इन दिनों नवरात्र की धूम देखने को मिल रही है। इस दौरान लोग मां की दुर्गा की आराधना में डूबे रहते हैं और हर तरफ गरबे की धुन सुनाई देती है। यूं तो देशभर में यह त्योहार धूमधाम से मनाया जाता है, लेकिन गुजरात में इसकी अलग ही रौनक दिखाई देती है।
यहां गरबा और डांडिया के अलावा और भी कई ऐसे नृत्य हैं, जिनके बारे में अक्सर कम लोग ही जानते हैं, लेकिन वह गुजरात की संस्कृति से गहराई से जुड़े होते हैं। ऐसा ही एक नृत्य डाकला है, जो गुजरात की संस्कृति को करीब से जानने का मौका देता है। इस नृत्य के साथ ही इसमें गाया जाने वाला गीत भी काफी मशहूर है। इन दिनों यह गीत सोशल मीडिया पर भी काफी ज्यादा सुनने को मिल रहा है। आइए आज इस आर्टिकल में जनाते हैं डाकला के इसी मशहूर गीत के बारे में विस्तार से-
गुजरात का मशहूर डाकला गीत
हम जिस गीत की बात कर रहे हैं, वह इन दिनों इंस्टाग्राम रील्स पर काफी छाया हुआ है और आप में से कई लोगों ने इसे जरूर सुना भी होगा। जी हां, हम बात कर रहे हैं, मशहूर गुजराती गीत रमती आवे माडी रमती आवे की, जिस पर इन दिनों लोग जमकर थिरकते नजर आ रहे हैं। यह एक डाकला गीत है, जिसके बजते ही पूरे माहौल में एक जादुई ऊर्जा भर जाती है।
कच्छ और सौराष्ट्र की मिट्टी से जुड़ा इतिहास
इंटरनेट पर इन दिनों वायरल यह गीत सिर्फ थिरकने वाला एक आम गाना नहीं है, बल्कि आस्था, असीम ऊर्जा और पुरानी परंपराओं का एक ऐसा अद्भुत संगम है, जो सीधे देवी मां से जुड़ता है। यह गीत मूल रूप से गुजरात की 'डाकला' संगीत शैली का एक अहम हिस्सा है। इसकी जड़ें कच्छ और सौराष्ट्र के उन पुराने ग्रामीण और आदिवासी इलाकों से जुड़ी हुई है।
इस गीत की असली धड़कन इसका पारंपरिक वाद्य यंत्र- 'डाक' है। यह दिखने में भगवान शिव के डमरू जैसा जरूर लगता है, लेकिन इसका आकार काफी बड़ा होता है। जब इस पर जोरदार थाप पड़ती है, तो इसे सुनकर खुद-ब-खुद पैर थिरकने लगते हैं।
देवी मां को पुकारने का एक तरीका
इस गीत के बोल सुनकर यह तो समझ आ गया कि यह गुजराती संस्कृति से जुड़ा एक लोकगीत है, लेकिन आखिर लोग इसे गाते क्यों हैं? दरअसल, यह गीत अपनी आराध्य देवी मां चामुंडा, मां मेलड़ी, अंबा या दुर्गा को मनाने और धरती पर बुलाने का एक बहुत ही पवित्र तरीका है।
क्या है गीत के बोलों का असली अर्थ?
पुराने जमाने के लोगों का ऐसा मानना था कि इस गीत के साथ सुनाई देने वाली 'डाक' की गूंज सुनकर देवी मां उनके गांव को महामारियों, प्राकृतिक आपदाओं और बुरी शक्तियों से बचाने के लिए खुद धरती आती हैं। इस गीत के बोलों का बहुत ही प्यारा और भावुक मतलब है। इसमें भक्त अपनी मां से प्रार्थना करते हुए कह रहे हैं कि "हे मेरी मां! तुम हमारे बीच नाचती, झूमती और खेलती हुई हमारे आंगन में पधारो।"
सोशल मीडिया पर फिर ट्रेंड हुआ गाना
कभी सिर्फ गुजरात की मिट्टी में रचा-बसा यह गीत अब सोशल मीडिया के दौर में पूरे देशभर में मशहूर हो चुका है। आज इसका रीमिक्स और ट्रेंडी रूप लोगों की काफी पसंद आ रहा है औप नवरात्र के मौके पर लोग जमकर इस पर थिरकते नजर आते हैं।
