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    गुजरात का मशहूर लोकगीत है दीपिका-रणवीर की फिल्म का ये गाना, बंगाल की 100 साल पुरानी कविता से जुड़ी है कहानी

    Updated: Fri, 17 Jul 2026 02:52 PM (IST)

    दीपिका-रणवीर की फिल्म 'राम-लीला' का मशहूर गाना 'मन मोर बनी थंगाट करे' असल में एक गुजराती लोकगीत है। ...और पढ़ें

    बंगाल की कविता कैसे बनी गुजरात का लोकगीत? (AI Generated Image)

    बंगाल की कविता कैसे बनी गुजरात का लोकगीत? (AI Generated Image)

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    लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। साल 2013 में दीपिका पादुकोण और रणवीर सिंह की फिल्म गोलियों की रासलीला: राम-लीला सुपरहिट रही थी। इस फिल्म की कहानी जितनी मजेदार थी, उतने ही खूबसूरत इस फिल्म के गाने भी थे। इन्हीं गानों में मन मोर बनी थंगाट करे भी शामिल था। 

    ये गाना लोगों ने खूब पसंद किया था, लेकिन क्या आप जानते हैं ये गाना असल में गुजरात का एक लोकगीत है, जिसकी जड़ें बंगाल से जुड़ी हैं। जी हां, सुनने में थोड़ा हैरान करने वाला जरूर है, लेकिन गुजरात के इस लोकगीत का बंगाल से काफी गहरा नाता है। आइए जानें क्या है ये नाता और कैसे ये लोकगीत बॉलीवुड का हिट गाना बना। 

    कैसे हुई इस गीत की शुरुआत?

    इस गाने की शुरुआत 20वीं शताब्दी के बिल्कुल शुरुआत में हुई थी। साल 1900 में रवींद्रनाथ टैगोर ने शिलाईदह प्रवास के दौरान नववर्षा नाम की एक बंगाली कविता लिखी थी। इस कविता में उन्होंने बारिश के आगमन की खुशी और नई शुरुआत के बारे में लिखा था और इसकी खुशी में नाचते दिलों की तुलना उन्होंने थिरकते हुए मोर से की थी।

    इस कविता के दो दशक बाद, यानी 1920 में गुजरात के मशहूर लेखक और राष्ट्रीय शायर कहलाने वाले झवेरचंद मेघानी कोलकाता में रवींद्रनाथ टैगोर के घर गए और उनसे ये कविता सुनी। टैगोर की आवाज और कविता की लयबद्धता ने मेघानी को अंदर तक झकझोर दिया। 

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    इस कविता से वे इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने इसे अपनी मातृभाषा गुजराती में ढालने का फैसला किया। साल 1944 में मेघानी ने टैगोर की कविताओं के अपने गुजराती अनुवाद संग्रह रवींद्र-वीणा में इस कविता को मोर बनी थंगाट करे के नाम से पब्लिश किया। 

    बंगाली कविता बनी गुजराती लोकगीत

    झवेरचंद मेघानी ने इस कविता का सिर्फ अनुवाद नहीं किया। उन्होंने इसे पूरी तरह से गुजरात की संस्कृति के रंग में रंग दिया। उन्होंने बंगाली भाव को गुजरात की लोक-संस्कृति से ऐसे जोड़ा कि ये अपने आप में एक मूल गुजराती रचना लगती है। 

    इस कविता को गायक हेमू गढ़वी ने अपना संगीत दिया और इसे सौराष्ट्र के पारंपरिक लोक-धुनों से जोड़ा। इस गाने की धुन इतनी पसंद की गई कि इस गीत को सुनने के लिए हजारों की भीड़ उमड़ने लगी और देखते ही देखते ये गुजरात के लोकगीतों में शामिल हो गया। 

    लोकगीत से बॉलीवुड का सफर

    ये गीत भारत के पूर्व और पश्चिम के लोक संगीत से मिलकर बना है। इसमें बारिश के मौसम का ऐसा वर्णन है कि सुनने वाले के पांव अपने आप थिरकने लगते हैं। इसकी धुन और लिरिक्स इतने पसंद किए गए कि इसे साल 2013 में संजयलीला भंसाली की फिल्म गोलियों की रासलीला: राम-लीला में भी फिल्माया गया। हालांकि, फिल्म में इसकी धुन में बदलाव किए गए हैं, लेकिन ये गाना इस फिल्म की तरह ही सुपरहिट रहा।