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    मंडप में रिश्ते टूटने की असल वजह है संवाद की कमी; बच्चों की पसंद और नापसंद पर खुलकर करें बात

    By Jagran NewsEdited By: Harshita Saxena
    Updated: Fri, 17 Jul 2026 05:55 PM (IST)

    मंडप में शादियां टूटने की बढ़ती घटनाओं का मुख्य कारण माता-पिता और बच्चों के बीच संवाद की कमी है। बच्चे डर या सामाजिक दबाव के कारण अपनी बात नहीं कह पात ...और पढ़ें

    विवाह में संवादहीनता की गंभीर समस्या (Picture Credit- AI Generated)

    विवाह में संवादहीनता की गंभीर समस्या (Picture Credit- AI Generated)

    HighLights

    1. मंडप में रिश्ते टूटने का मुख्य कारण संवादहीनता

    2. डर या दबाव में बच्चे नहीं कह पाते मन की बात

    3. परिवार में विश्वास आधारित संवाद का माहौल बनाएं

    एन नवराही, नई दिल्ली। पूरे घर में शहनाई की मधुर धुन...। रंग-बिरंगी झालरों से सजा और फूलों की खुशबू से महक रहा आंगन का हर कोना। रिश्तेदारों की चहल-पहल, बच्चों की खिलखिलाहट और रोशनी की चमक के बीच खुशी से दमक रहे चेहरे...। कहीं ग्रुप के रूप में सेल्फी ले रहे युवा तो कहीं दौड़भाग के जीवन से कुछ पल चुराकर एक-दूसरे से खुशी बांट रहे दोस्त और रिश्तेदार। महीनों की तैयारियों के बाद आखिर वो दिन, जिसका इंतजार दोनों परिवारों को कब से था।

    रसोई से उठती पकवानों की खुशबू और आंगन में मंगल गीतों के बीच कोई मेहमानों के स्वागत में व्यस्त था तो कोई बरात का रास्ता देखने में। बाहर से सब कुछ सही और सुव्यवस्थित साथ ही परिवार के करीबियों के अंदर एक अजीब सी बेचैनी, जो ऐसे आयोजनों के समय अक्सर होती ही है...। बेचैनी में पिता अनायास ही बार-बार मोबाइल की स्क्रीन देख लेते... मां की आंखों में खुशी और विदाई का दर्द एक साथ था। वह कभी बेटी के माथे पर हाथ फेरती तो कभी उसके लहंगे की सिलवटें ठीक करती। उन्हें लगता, आज उनकी बरसों की जिम्मेदारी पूरी होने जा रही है। इस सारे दृश्य के बीच बचपन से लेकर अब तक की सारी कहानी भी उनके मन में तैरने लगती।

    उधर, अपने कमरे में लाल जोड़े में सजी बेटी आईने के सामने बैठी है बिल्कुल शांत। हाथों पर गहरी रची मेहंदी, चूड़ियों की खनक और चेहरे पर दुल्हन का शृंगार। ध्यान से निहारें तो आंखों में उत्साह नहीं, एक गहरी बेचैनी, जैसे कोई अनकहा सवाल ठहरा हुआ हो। सहेलियां हंसी-मजाक कर रही हैं, कोई बीच में आकर सेल्फी लेता है, मगर वह हर कुछ मिनट बाद चुपके से अपनी आंखों के कोने पोंछ लेती है। उसके भीतर कोई ऐसी लड़ाई चल रही थी, जिसका शोर केवल वही सुन पा रही थी। कमरे में मौजूद किसी को भी कुछ पता नहीं। सब कुछ जैसे समान्य। यदि किसी को कुछ असहज लगा भी तो यही खयाल आया, ऐसे मौके पर कुछ व्याकुलता स्वाभाविक है।

    तभी बाहर से उठते शोर के बीच- 'बरात आ गई... बरात आ गई' के साथ तेज होती है ढोल की थाप। आतिशबाजी से आसमान जगमगा उठता है। दूल्हे का स्वागत होता है और कुछ ही देर में सभी की निगाहें जयमाल के मंच पर टिक जाती हैं। दुल्हन कांपते कदमों से मंच तक पहुंचती है। उसने एक नजर सामने खड़े दूल्हे पर डाली, फिर भीड़ में बैठे अपने माता-पिता को देखा। अगले ही पल उसके हाथों से जयमाला ढीली पड़ गई। आंखों से आंसुओं की धारा बह निकली। पूरे माहौल में सन्नाटा छा गया।

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    कांपती आवाज में उसके होंठों से शब्द निकले- 'मुझे माफ कर दीजिए... मैं यह शादी नहीं कर सकती। मेरा मन कहीं और है।' बस, एक वाक्य... और कुछ ही सेकंड में महीनों की तैयारियां, अनगिनत सपने, दोनों परिवारों की उम्मीदें और उस शाम की सारी खुशियां जैसे समय के किसी ठहरे हुए फ्रेम में कैद हो गईं, जैसे पूरी दुनिया रुक गई हो। मौके पर बज रहे संगीत के जैसे मायने ही बदल गए। वातावरण में एक अजीब सी उदासी घुल चुकी थी। किसी के चेहरे पर अविश्वास था, किसी की आंखों में आंसू, कोई गुस्से में

    था तो कोई बिल्कुल निःशब्द। हर मन में केवल एक सवाल, अगर यह बात पहले कह दी जाती तो क्या इतना बड़ा दर्द टल नहीं सकता था? यह दृश्य आपको फिल्मी लग सकता है, लेकिन इसकी पीड़ा बिल्कुल वास्तविक है।

    हाल ही में इटावा और हापुड़ में हुई ऐसी घटनाओं ने ऐसे ही सवाल हमारे सामने रखे हैं। कहीं जयमाल से ठीक पहले रिश्ता टूट गया तो कहीं विवाह के कुछ घंटे बाद यह स्वीकार करना पड़ा कि यह रिश्ता मन से कभी स्वीकार ही नहीं किया गया था। घटनाएं अलग-अलग थीं, लेकिन उनकी जड़ एक ही थी- समय रहते संवाद न हो पाना और अपने ही घर में अपनी बात कहने का साहस न जुटा पाना।

    जरूरी है मन की सहमति

    इटावा और हापुड़ में घटी ये घटनाएं केवल दो परिवारों की निजी त्रासदी नहीं हैं। ये बदलते भारतीय समाज की एक ऐसी तस्वीर भी सामने रखती हैं, जिसमें रिश्तों की परिभाषा, विवाह की अपेक्षाएं और युवाओं का सोच तेजी से बदल रहा है। पहले जहां विवाह को परिवार का निर्णय माना जाता था, वहीं आज की पीढ़ी इसे अपने पूरे जीवन से जुड़ा फैसला मानती है। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि किसी ने शादी से इन्कार क्यों किया, बल्कि यह है कि बात आखिर मंडप तक पहुंचने के बाद ही क्यों सामने आई? कई बार बच्चे अपने मन की बात कहना चाहते हैं, लेकिन उन्हें लगता है कि उनकी बात सुनी नहीं जाएगी। कुछ को परिवार की नाराजगी का डर होता है तो कुछ सामाजिक बदनामी के डर से चुप रह जाते हैं।

    यह चुप्पी धीरे-धीरे इतनी लंबी हो जाती है कि उसका अंत सबसे गलत समय पर होता है। तब केवल एक रिश्ता नहीं टूटता, बल्कि दो परिवारों का भरोसा, सम्मान और वर्षों से संजोए गए सपने भी बिखर जाते हैं। जेएनयू, नई दिल्ली के समाजशास्त्र विभाग की पूर्व प्रोफेसर डा. रेणुका सिंह कहती हैं कि इन घटनाओं को केवल संस्कारों की कमी कह देना समस्या को बहुत सीमित नजरिए से देखना होगा। उनके अनुसार, समाज बदल रहा है और उसके साथ युवाओं का सोच भी बदल रहा है। आज का युवा अपनी इच्छाओं, अपने निजी स्पेस और अपने जीवन से जुड़े फैसलों को पहले से कहीं अधिक महत्व देता है। वह चाहता है कि विवाह जैसे महत्वपूर्ण निर्णय में उसकी राय केवल औपचारिकता न हो, बल्कि उसे गंभीरता से सुना भी जाए।

    दरअसल, पिछले एक दशक में शिक्षा, रोजगार और आर्थिक आत्मनिर्भरता ने युवाओं को अपनी पहचान के प्रति अधिक सजग बनाया है। वे अपने जीवनसाथी में केवल अच्छा परिवार या सामाजिक प्रतिष्ठा नहीं, बल्कि भावनात्मक जुड़ाव, समान सोच और आपसी सम्मान भी तलाश रहे हैं। समस्या तब पैदा होती है, जब परिवार और युवा एक ही रिश्ते को दो अलग नजरिए से देखने लगते हैं। एक पक्ष इसे सामाजिक जिम्मेदारी मानता है तो दूसरा इसे अपने पूरे जीवन का निर्णय। डॉ. रेणुका मानती हैं कि कई बार युवाओं का अंतिम समय पर लिया गया फैसला केवल विवाह से इन्कार नहीं होता, बल्कि यह उस असहमति का सार्वजनिक रूप होता है, जिसे वे पहले कभी व्यक्त नहीं कर पाए। उनके अनुसार, आज का युवा अपनी इच्छाओं को खुलकर स्वीकार कर रहा है और कई बार वह अपने निर्णय को

    प्रभावशाली ढंग से सामने लाने की कोशिश भी करता है। इंटरनेट मीडिया और अन्य माध्यमों ने भी अभिव्यक्ति के इस तरीके को प्रभावित किया है। हालांकि, इसका अर्थ यह नहीं कि युवा गलत हैं या माता-पिता। असली समस्या दोनों के बीच संवाद का कमजोर होना है।

    जनरेशन गैप ने बढ़ाई दूरियां

    आज परिवारों में बातचीत पहले की तुलना में कम हुई है। संयुक्त परिवारों में जहां दादा-दादी, चाचा-चाची या बड़े भाई-बहन जैसे रिश्ते बच्चों के लिए भरोसे का माध्यम बन जाते थे, वहीं अब छोटे परिवारों में संवाद का दायरा भी सीमित हो गया है। माता-पिता अक्सर यह मान लेते हैं कि वे बच्चों को समझ रहे हैं, जबकि कई बार बच्चे यह महसूस करते हैं कि उनकी बात सुनी ही नहीं जा रही। डॉ. रेणुका कहती हैं कि हमारे समाज में पीढ़ियों के बीच दूरी एक बड़ी चुनौती बनती जा रही है। माता-पिता और बच्चे दोनों अपने-अपने नजरिए को सही मानते हैं, लेकिन खुलकर बातचीत नहीं करते। यही दूरी बाद में गलतफहमियों और टकराव का कारण बनती है।

    चुप्पी की शुरुआत बचपन से होती है

    दिल्ली विश्वविद्यालय के मनोविज्ञान विभाग की पूर्व प्रोफेसर डा. नंदिता बाबू मानती हैं कि ऐसी परिस्थितियों की शुरुआत विवाह से नहीं, बल्कि बचपन से होती है। यदि किसी बच्चे को शुरू से यह भरोसा मिले कि वह अपनी पसंद, नापसंद, उलझन या असहमति बिना डांट और डर के माता-पिता के सामने रख सकता है तो वह बड़े होने पर भी जीवन के महत्वपूर्ण फैसलों में खुलकर अपनी बात कहेगा। उनके अनुसार, भारतीय परिवारों में आज भी बहुत से बच्चे अपनी इच्छाओं को दबाकर बड़े होते हैं। वे यह सोचकर चुप रहते हैं कि उनकी बात स्वीकार नहीं होगी या परिवार आहत हो जाएगा। धीरे-धीरे यह चुप्पी आदत बन जाती है।

    फिर जब जीवन का सबसे बड़ा फैसला सामने आता है तो वर्षों से दबा हुआ सच अचानक बाहर निकलता है। यही वजह है कि मनोवैज्ञानिक परिवारों में विश्वास आधारित संवाद को सबसे बड़ा समाधान मान रहे हैं। बच्चों को केवल अनुशासन नहीं, बल्कि अपनी बात रखने की स्वतंत्रता भी मिलनी चाहिए। यदि घर का माहौल ऐसा होगा, जहां असहमति को भी सम्मान मिलेगा तो शायद कोई बेटा या बेटी मंडप तक पहुंचने का इंतजार ही नहीं करेगा। रिलेशनशिप एक्सपर्ट व मनोवैज्ञानिक डा. निशा खन्ना कहती हैं कि बच्चे अपने माता-पिता पर भरोसा करना बचपन से सीखते हैं। यदि यह भरोसा मजबूत होगा तो वे जीवन के सबसे कठिन फैसलों में भी अपने परिवार को अपना पहला सहारा मानेंगे, आखिरी विकल्प नहीं।

    बदलना होगा सोच

    विवाह केवल एक सामाजिक आयोजन नहीं, बल्कि जीवनभर साथ निभाने का संकल्प है। ऐसे रिश्ते दबाव, डर या चुप्पी पर नहीं टिकते। वे विश्वास, सम्मान और संवाद की नींव पर खड़े होते हैं। डा. निशा के अनुसार हो सकता है कि समय बदलने के साथ रिश्तों की परिभाषाएं भी बदलें। बच्चों की अपेक्षाएं भी बदलें और परिवारों का सोच भी, लेकिन एक बात नहीं बदलनी चाहिए- बातचीत का दरवाजा, क्योंकि कई बार समय पर कही गई एक सच्ची बात, हजारों मेहमानों के सामने टूटने वाले एक रिश्ते से कहीं कम दर्द देती है।

    घर में है विवाह योग्य बेटा या बेटी

    • विवाह की तैयारी केवल कपड़े, कार्ड और समारोह तक सीमित नहीं होनी चाहिए। सबसे पहली तैयारी रिश्ते को लेकर स्पष्ट संवाद की होनी चाहिए।
    • रिश्ता तय करने से पहले केवल 'हां' सुनना पर्याप्त नहीं, यह भी समझिए कि वह 'हां' मन से है या दबाव में।
    • शादी की पूरी प्रक्रिया के दौरान समय-समय पर बेटे या बेटी से अकेले में बात करें।
    • यदि वे असमंजस में दिखें तो उसे जिद या अपरिपक्वता मानकर नजरअंदाज न करें।
    • प्रेम संबंध, करियर, भविष्य और विवाह जैसे विषयों पर खुलकर बातचीत का माहौल बनाइए।
    • यदि जरूरत महसूस हो तो विवाह पूर्व परामर्श लेने में संकोच न करें।
    • सबसे जरूरी, बच्चों को यह भरोसा दीजिए कि सच बोलने पर परिवार उनका साथ देगा, चाहे निर्णय कठिन ही क्यों न हो।

    खुलकर संवाद करें

    इनसिक्योर अटैचमेंट स्टाइल और गिल्ट जैसी भावनात्मक स्थितियां कई बार युवाओं के व्यवहार को प्रभावित करती हैं। ऐसे में सबसे जरूरी है कि माता-पिता बच्चों को भावनात्मक सहारा दें और उनसे खुलकर संवाद करें। -डॉ. निशा खन्ना, रिलेशनशिप एक्सपर्ट

    मन में दबे भाव

    यह व्यवहार अक्सर अभिभावकों के प्रति दबी नाराजगी और विरोध की अभिव्यक्ति होता है। युवा नाटकीय ढंग से यह संदेश देना चाहते हैं कि वे माता-पिता के चयन और नियंत्रण को स्वीकार नहीं करते तथा अपनी स्वतंत्र पहचान और निर्णय क्षमता स्थापित करना चाहते हैं। -डॉ. रेणुका सिंह, समाजशास्त्री

    पैदा करें विश्वास

    बच्चों को यह विश्वास होना चाहिए कि वे बिना किसी डर के अपनी भावनाएं, पसंद, असहमति या उलझन परिवार के सामने रख सकते हैं। यही विश्वास भविष्य में उन्हें विवाह जैसे महत्वपूर्ण निर्णयों पर भी समय रहते खुलकर अपनी बात कहने का साहस देगा। -डॉ. नंदिता बाबू, पूर्व प्रोफेसर, मनोविज्ञान विभाग, डीयू