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मां-पापा ने सब कुछ सिखाया, बस 'हारना' नहीं... आखिर क्यों 99% मार्क्स लाने वाले बच्चे भी अंदर से हैं कमजोर?

Published: Sun, 20 Sep 2026 01:01 PM (IST)

एआई के दौर में बच्चों के लिए केवल अकादमिक अंक ही नहीं, बल्कि भावनात्मक मजबूती भी सफलता के लिए बेहद जरूरी है।

क्या आपका बच्चा भी हार बर्दाश्त नहीं कर पाता? (Image Source: AI-Generated)

क्या आपका बच्चा भी हार बर्दाश्त नहीं कर पाता? (Image Source: AI-Generated)

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लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। आज भी केवल परीक्षा के नंबरों को ही सफलता का पैमाना माना जाता है, लेकिन असल जिंदगी में कामयाब होने के लिए बच्चों का भावनात्मक रूप से मजबूत होना ज्यादा जरूरी है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के इस दौर में किताबी ज्ञान अब सफलता की गारंटी नहीं रहा। दिल्ली पब्लिक स्कूल, आर.के.पुरम की कांउसलर कनिका मदान से जानिए कैसे बच्चों को सिखाएं उनके मन के तूफानों से लड़ना...

महानगर के एक नामचीन स्कूल में पढ़ने वाली 12 वर्षीय आन्या को कोडिंग और गणित में महारत हासिल थी। हर कोई उसे भविष्य की टेक-स्टार मानता था, लेकिन एक दिन जब उसकी सहेली को क्लास कैप्टन चुना गया, तो आन्या इस ईर्ष्या और हार को संभाल नहीं पाई। उसने खुद को आस-पास और इंटरनेट मीडिया से पूरी तरह काट लिया और गहरी हीनभावना का शिकार हो गई। आन्या की यह स्थिति बताती है कि आज की एआइ-चालित दुनिया में हम बच्चों के दिमाग को तो शार्प कर रहे हैं, लेकिन उनके दिल को बेहद कमजोर छोड़ रहे हैं। यह सच है कि स्कूल-कालेज में दाखिला पाने या नौकरी हासिल करने के लिए अकादमिक स्कोर अभी भी एक अहम सीढ़ी हैं, लेकिन वे सफलता की पूरी परिभाषा नहीं हैं। आइक्यू हमारी बौद्धिक क्षमताओं का सिर्फ एक हिस्सा है।

बदलता सफलता का पैमाना

आज केवल अधिक अंकों को सफलता का पैमाना मानना सबसे बड़ी भूल है। सभी माता-पिता चाहते हैं कि उनका बच्चा क्लास में टाप करे, लेकिन इस अंधी दौड़ में हम बच्चे के इमोशनल कोशिएंट यानी उसकी भावनात्मक मजबूती को नजरअंदाज कर देते हैं, जो कि उसके पूरे जीवन का आधार है।

असेंबली से सही शुरुआत

बेहतरीन स्कूल इस सोच पर काम करते हैं कि जहां शांति है, वहीं समृद्धि है। यही वजह है कि स्कूलों में दिन की शुरुआत कुछ मिनट के ध्यान सत्र से होती है, जिसमें सुबह की असेंबली के जरिए सभी बच्चे व शिक्षक शांत अवस्था में प्रवेश करते हैं।

ऐसे निपटें बच्चों की भावनाओं से

स्कूलों में मनोवैज्ञानिक काउंसलर होते हैं, जो यह सुनिश्चित करते हैं कि शिक्षण और गैर-शिक्षण दोनों तरह का स्टाफ यह समझे कि किसी बच्चे में पैनिक अटैक या एंग्जायटी के लक्षण दिखने पर कैसे प्रतिक्रिया देनी है। जब बच्चा असहज महसूस करता है, तो उसका शरीर दूसरों की अपेक्षाओं के अनुरूप व्यवहार नहीं कर पाता। पूरी तरह से प्रशिक्षित स्टाफ तुरंत ऐसे मुद्दों को संज्ञान में लेता है। हालांकि, आन-द-स्पाट काउंसलिंग सिर्फ डैमेज कंट्रोल की तरह है। असली और बुनियादी जीवन-प्रशिक्षण पहली या दूसरी कक्षा से ही शुरू हो जाना चाहिए, ताकि बच्चे अपनी भावनाओं के प्रति जागरूक रहें, सही ढंग से खुद को अभिव्यक्त कर सकें और जरूरत पड़ने पर परिवार या सही सपोर्ट सिस्टम तक आसानी से पहुंच सकें।

आपसी तालमेल से बनेगी बात

यदि माता-पिता और स्कूल एक ही उद्देश्य साझा नहीं करेंगे तो बच्चे की मदद करने में लंबा समय लग सकता है। स्कूल और परिवार के बीच बेहतरीन तालमेल होना चाहिए। यदि घर का माहौल थोड़ा सख्त है, तो स्कूल बच्चों को थोड़ा खुलापन दे सकता है और कभी-कभी स्कूल के कड़े नियमों के बीच माता-पिता बच्चों को थोड़ा स्पेस दे सकते हैं। कुछ दिनों के लिए बच्चों को थोड़ी छूट और सुरक्षित माहौल देना जरूरी है ताकि वे खुलकर अपनी बात कह सकें।

बदलें भावनाओं का वेग

इंटरनेट मीडिया के दौर में दूसरे बच्चों की लाइफस्टाइल या उपलब्धियों को देखकर बच्चों में फोमो (फियर आफ मिसिंग आउट) और ईर्ष्या की भावना बहुत जल्दी पनपती है। माता-पिता को इस नकारात्मक भावना को भांपकर बच्चे को डांटने के बजाय उससे संवाद करना चाहिए। उन्हें समझाएं कि हर व्यक्ति की यात्रा अलग होती है। बच्चों के बीच होने वाली ईर्ष्या या आपसी झगड़ों को बस यह कहकर नहीं टाला जा सकता कि 'जाओ, हाथ मिलाओ और भूल जाओ।' इसके लिए शिक्षकों को बच्चों को व्यक्तिगत रूप से सुनना चाहिए। कक्षा में ऐसे हालात या प्रोजेक्ट्स बनाने चाहिए, जहां हर बच्चा अपनी विशिष्ट खूबी के साथ टीम में योगदान दे सके। गैर-अकादमिक गतिविधियों, सांस्कृतिक आयोजनों या सामाजिक मुद्दों पर आधारित प्रोजेक्ट्स के जरिए बच्चों को बिना किसी दबाव के खुद को अभिव्यक्त करने का बेहतरीन मंच मिलता है।

स्वजन ऐसे पहचानें लक्षण

  • बच्चों के भावनात्मक संघर्षों के लक्षण उम्र के हिसाब से अलग-अलग होते हैं।
  • तीन से आठ साल के बच्चे अक्सर स्कूल न जाने के तरह -तरह के बहाने बनाने लगते हैं। बार-बार चिड़चिड़ापन, नाखुश रहना, बार-बार लड़ना या शिकायत करना, बहुत ज्यादा चुप रहना और अटेंशन पाने के लिए जिद करना।
  • किशोरावस्था में बच्चे बहुत ज्यादा खामोश हो जाएं, अपने कमरे तक सीमित रहने लगें, बात-बात पर नखरे या नाराजगी दिखाएं, अपनी बातें साझा करने से कतराएं। अकादमिक प्रदर्शन में बड़ी गिरावट भी इसका एक मुख्य संकेत है।

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