विज्ञापन हटाएंसिर्फ खबर पढ़ें

पेरेंट्स की 'सही सलाह' भी बच्चों को क्यों लगती है बुरी? वजह जानकर आप भी बदल देंगे अपना तरीका

Updated: Tue, 25 Aug 2026 07:00 AM (IST)

टीनएज एक ऐसा नाजुक दौर है, जहां माता-पिता और बच्चों के बीच छोटी-छोटी बातों पर खटपट होना बहुत आम है।

टीनएजर्स अपने माता-पिता से असल में क्या चाहते हैं? (Image Source: AI-Generated)

टीनएजर्स अपने माता-पिता से असल में क्या चाहते हैं? (Image Source: AI-Generated)

timer icon

समय कम है?

जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में

संक्षेप में पढ़ें

लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। अक्सर देखा जाता है कि जब बच्चे टीनएज में कदम रखते हैं, तो माता-पिता के साथ उनकी छोटी-छोटी बातों पर खटपट होने लगती है। जब आपका बच्चा कोई परेशानी लेकर आपके पास आता है और आप उसे कोई समझदारी भरी सलाह देते हैं, तो उसका चिर-परिचित जवाब होता है- "रहने दीजिए, आप मेरी बात नहीं समझेंगे।"

आपके मन में यह सवाल जरूर आता होगा कि आखिर आपकी सही सलाह भी उन्हें बुरी क्यों लग जाती है? आइए, कुछ अहम रिसर्च के जरिए समझते हैं कि इस उम्र में बच्चे अपने माता-पिता से असल में क्या उम्मीद करते हैं।

तुरंत समाधान खोजने की आदत

जब कोई बच्चा स्कूल में हुए किसी दोस्त से झगड़े या पढ़ाई के बहुत ज्यादा दबाव की शिकायत लेकर घर आता है, तो वह अक्सर तनाव में होता है। ऐसे में, माता-पिता का स्वाभाविक रवैया होता है कि वे तुरंत उसकी समस्या को सुलझाने के लिए ज्ञान देने लगते हैं।

यहीं पर तालमेल बिगड़ता है। बच्चों को यह लगने लगता है कि उनकी भावनाओं की गहराई को समझे बिना ही उनकी समस्या को बहुत छोटा माना जा रहा है। इस नाजुक समय में उन्हें किसी एक्सपर्ट सलाह की नहीं, बल्कि एक ऐसे इंसान की जरूरत होती है जो बस शांति से उनके मन की भड़ास सुन ले।

इस बारे में क्या कहती हैं रिसर्च?

पबमेड की एक रिसर्च के मुताबिक, 13 से 16 साल की उम्र के जिन बच्चों को यह महसूस होता है कि उनके माता-पिता उनकी बातों को बिना टोके सुनते हैं, वे मानसिक रूप से ज्यादा संतुष्ट रहते हैं। ऐसे बच्चे भविष्य में भी अपने दिल की बात पेरेंट्स से आसानी से साझा करते हैं। दरअसल, इस उम्र में बच्चे अपने माता-पिता का भावनात्मक साथ तो चाहते हैं, लेकिन वे खुद की एक स्वतंत्र पहचान भी बनाना चाहते हैं।

इस हालिया स्टडी में यह बात सामने आई कि भारतीय माता-पिता अपने बच्चों को कामयाब तो देखना चाहते हैं, लेकिन वे उनके हर फैसले को अपने कंट्रोल में रखना चाहते हैं। बच्चों को माता-पिता का यह दखल दो रूपों में दिखता है- या तो वे इसे 'सपोर्ट' मानते हैं या फिर 'पाबंदी'। बहुत ज्यादा रोक-टोक से बच्चों को लगने लगता है कि उन पर भरोसा नहीं किया जा रहा है और उनकी आजादी छीनी जा रही है।

रिश्ते सुधारने का एक बेहद आसान तरीका

अगर आप चाहते हैं कि आपके और बच्चे के बीच बहस कम हो और रिश्ता मजबूत बने, तो अगली बार बातचीत के दौरान एक बेहद आसान सा सवाल पूछकर देखें:

"बेटा, क्या तुम चाहते हो कि मैं सिर्फ तुम्हारी बात सुनूं, या फिर हम मिलकर इस समस्या का कोई हल निकालें?"

इस सवाल के बाद बच्चे के जवाब के अनुसार अपना रवैया तय करें:

  • अगर वह सिर्फ सुनने को कहे, तो बिना कोई राय या सलाह दिए उसकी पूरी बात ध्यान से सुनें।
  • अगर वह असमंजस में हो, तो तुरंत अपनी तरफ से समाधान थोपने की जल्दबाजी न करें।
  • अगर वह आपकी राय मांगे, पूछे कि आप मेरी जगह होते तो क्या करते, सिर्फ तभी उसे अपने सुझाव दें।

जब आप बच्चों को उनके नजरिए से समझने की कोशिश करते हैं और उन्हें खुद सोचने का मौका देते हैं, तो उन्हें एहसास होता है कि परिवार में उनकी भी अहमियत है। इससे आपके और उनके बीच का रिश्ता कहीं ज्यादा गहरा, स्वस्थ और प्यार भरा बन जाता है।

Source: PubMed

यह भी पढ़ें- बिना आजादी के नहीं आती जिम्मेदारी! पेरेंट्स बच्चों को रोज की इन आदतों से बनाएं इंडिपेंडेंट

यह भी पढ़ें- क्या आप PTM को समझते हैं बच्चों का 'शिकायत सेशन'? तो सीख लें कैसे पेरेंट्स को मीटिंग के लिए होना चाहिए तैयार