World War II में कैदी बनकर भारत आए थे इटली के हजारों सैनिक, भोपाल के पास देलावाड़ी में आज भी जिंदा है इतिहास
दूसरे विश्व युद्ध के दौरान अफ्रीका में पकड़े गए हजारों इटैलियन सैनिकों को भारत में बंदी बनाया गया था, जिनमें ...और पढ़ें

मध्य प्रदेश के देलावाड़ी में दफन है दूसरे विश्व युद्ध का एक अनसुना पन्ना (Image Source: AI-Generated)

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लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। 1939 से 1945 के बीच चले दूसरे विश्व युद्ध की चर्चा जब भी होती है, तो हमारे दिमाग में यूरोप और अफ्रीका का ही नाम आता है। हालांकि, इस भीषण युद्ध का एक गहरा नाता मध्य प्रदेश के रातापानी टाइगर रिजर्व से भी जुड़ा है।
जी हां, देलावाड़ी के इन घने जंगलों में एक ऐसा इतिहास दफन है, जिससे ज्यादातर लोग आज भी अनजान हैं। दरअसल, युद्ध के दौरान पकड़े गए इटली के हजारों सैनिकों को यहीं बंदी बनाकर रखा गया था। आज भी उन सैनिकों की कब्रें इस जंगल में मौजूद हैं, जिन्होंने इस कैद में ही दम तोड़ दिया था।
अफ्रीका के रेतीले मैदानों से भारत तक का सफर
बात दिसंबर 1940 की है। उत्तरी अफ्रीका के रेगिस्तान में ब्रिटिश-ऑस्ट्रेलियाई सेना (मित्र राष्ट्र) और इटली-जर्मनी (धुरी राष्ट्र) के बीच भयंकर जंग चल रही थी। इसी दौरान ब्रिटिश सेना ने लीबिया के टोब्रुक बंदरगाह पर हमला कर दिया और लगभग दो लाख इटैलियन सैनिकों को बंदी बना लिया।
इन युद्धबंदियों में से 68 हजार कैदियों को समुद्री जहाजों के जरिए भारत भेजा गया। 1941 की शुरुआत में जब ये कैदी बॉम्बे पहुंचे, तो शहर की सड़कों पर इनका जुलूस निकाला गया। इसके बाद इन्हें देश भर में बनाए गए 29 अलग-अलग युद्धबंदी कैंपों में भेज दिया गया। तत्कालीन भोपाल रियासत के बैरागढ़, बुदनी और देलावाड़ी सहित कुल 8 कैंपों में करीब 21,975 इटैलियन सैनिकों को रखा गया था।

(Image Source: AI-Generated)
तंबू से हुई शुरुआत, फिर बना डाला भोपाल का रनवे
देलावाड़ी का यह युद्धबंदी कैंप कोई छोटी-मोटी जगह नहीं थी। यह करीब 146.49 एकड़ के बड़े इलाके में फैला हुआ था। शुरुआत में ये कैदी टेंट में रहते थे, लेकिन ये इतने कुशल कारीगर थे कि इन्होंने जल्द ही अपने लिए मजबूत बैरकें खड़ी कर लीं। इन इटैलियन कैदियों की ही मेहनत थी कि अंग्रेजों ने भोपाल के बैरागढ़ (आज का भोज एयरपोर्ट) की कच्ची हवाई पट्टी को एक पक्के रनवे में बदलवाया।
आज भी देलावाड़ी में ब्रिटिश सैन्य इंजीनियरिंग की झलक दिखाते पत्थर, ईंट और पोर्टलैंड सीमेंट से बने 297 ढांचों के अवशेष मौजूद हैं।
बेहतरीन सुख-सुविधाएं और शानदार इंजीनियरिंग
कैंप में कैदियों ने कमाल के निर्माण किए थे, जो आज भी हैरान करते हैं:
- विशाल रसोईघर: खाना पकाने के लिए दो बड़े किचन ब्लॉक बनाए गए थे। इनमें बड़े-बड़े चूल्हे और चार ऊंची चिमनियां लगाई गई थीं।
- कमाल का ड्रेनेज सिस्टम: कैंप में पानी की निकासी के लिए अंडरग्राउंड नेटवर्क और फिल्ट्रेशन टैंक का बहुत ही व्यवस्थित ढांचा बनाया गया था।
- अन्य जरूरतें: घोड़ों के चारा खाने के लिए विशेष हौद और सेना की गाड़ियां धोने के लिए दो कार वॉश सेंटर भी बनाए गए थे।
कैद की मायूसी में भी गूंजती थीं संगीत की धुनें
भले ही वे सैनिक कैदी थे, लेकिन उन्होंने अपनी कला को मरने नहीं दिया। दिन भर की कड़ी मेहनत के बाद शाम होते ही पूरे कैंप में बांसुरी और मैंडोलिन की सुरीली धुनें सुनाई देती थीं। सैनिकों ने अपने छोटे-छोटे म्यूजिकल ग्रुप बना रखे थे, जो अक्सर प्रस्तुतियां देते थे। उन्होंने कैंप में बकायदा एक थिएटर भी तैयार कर लिया था, जहां वे नाटक खेलते थे। इसी कला और संगीत ने कैद के मुश्किल दिनों में उनका मानसिक हौसला बनाए रखा।
सुल्ताना डाकू को पकड़ने वाले अफसर ने बसाया था गांव
साल 1940 में इस युद्धबंदी कैंप की कमान भोपाल स्टेट पुलिस के आईजी और इंपीरियल पुलिस के अफसर फ्रेडी यंग के कंधों पर थी। यह वही मशहूर अफसर थे, जिन्होंने कुख्यात 'सुल्ताना डाकू' को पकड़ा था।
कैंप का कामकाज सुचारू रूप से चलाने के लिए फ्रेडी यंग ने उत्तर प्रदेश से सुखराम सिंह नामक पुलिस अफसर को बुलाया। वहीं, कैंटीन और रसोई के काम के लिए हरियाणा के महेंद्रगढ़ से कई भारतीय परिवारों को यहां लाया गया। जब विश्व युद्ध खत्म होने पर इटली के सैनिक वापस अपने देश लौट गए, तो फ्रेडी यंग ने इन भारतीय परिवारों को देलावाड़ी में ही जमीन खरीदकर बसने के लिए प्रेरित किया। आज इस गांव में रहने वाले ज्यादातर लोग इन्हीं परिवारों के वंशज हैं।
इतिहास के इस पन्ने को देखने कैसे पहुंचें?
अगर आप देलावाड़ी जाकर इस जगह को करीब से देखना चाहते हैं, तो इन बातों का ध्यान रखें:
- यह जगह भोपाल शहर से लगभग 53 किलोमीटर दूर है। कार के जरिए आप महज एक से डेढ़ घंटे में आसानी से यहां पहुंच सकते हैं।
- चूंकि यह क्षेत्र टाइगर रिजर्व के अंतर्गत आता है, इसलिए यहां केवल सूर्योदय से सूर्यास्त के बीच ही जाने की अनुमति है।
- यह इलाका रातापानी टाइगर रिजर्व के कोर एरिया से लगा हुआ है। इसलिए, वन विभाग से परमिट और अधिकृत पास लिए बिना यहां प्रवेश करना सख्त मना है।
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