1.8 करोड़ नौकरियों पर खतरा! किस सेक्टर पर पड़ेगा सबसे ज्यादा असर, 2030 तक दिखेगा AI का असली कहर
सौरभ मुखर्जी ने एक रिपोर्ट का हवाला देते हुए बताया कि 2030 तक भारत में AI ऑटोमेशन से 1.8 करोड़ नौकरियां प्रभावित हो सकती हैं। ...और पढ़ें

2030 तक 1.8 करोड़ भारतीय नौकरियां AI से प्रभावित

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डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। कंपनियां अब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआइ) का प्रयोग रोजमर्रा के काम में करने लगी हैं। इसका सबसे ज्यादा असर ऑफिस में बैठकर काम करने वाले लोगों (व्हाइट कॉलर जॉब) पर पड़ेगा, क्योंकि कंपनियां उन कामों को मशीन से कराना शुरू कर रही हैं, जिन्हें पहले इंसान करते थे।
एक पॉडकास्ट पर बोलते हुए मारसिलस इन्वेस्टमेंट मैनेजर्स के संस्थापक सौरभ मुखर्जी ने अमेरिकी सॉफ्टवेयर कंपनी सर्विसनाउ की एक रिपोर्ट से जुड़े अनुमानों का जिक्र किया।
इस रिपोर्ट के अनुसार, 2030 तक AI ऑटोमेशन के कारण भारत में 1.8 करोड़ नौकरियां प्रभावित हो सकती हैं, जबकि उनकी जगह पर सिर्फ 30 लाख नई तकनीकी नौकरियां ही पैदा होने की संभावना है। इस तरह 1.5 करोड़ कुल नौकरियों के प्रभावित होने की आशंका है।
हालांकि, सर्विसनाउ की अपनी भाषा में इनमें से कई भूमिकाओं को एआइ द्वारा पूरी तरह से खत्म करने के बजाय फिर से परिभाषित किए जाने के रूप में बताया गया है।
हालांकि, इसके बावजूद मुखर्जी ने तर्क दिया है कि उथल-पुथल कर्मचारियों की उम्मीद से कहीं ज्यादा होगी। मुखर्जी ने चेतावनी देते हुए कहा कि अभी तो यह ट्रेलर है।
सौरभ मुखर्जी ने कहा, 'तकनीकी क्षेत्र में अभी जो छंटनी चल रही है, वह तो बस एक शुरुआती झलक है। उस समय का अंदाजा लगाइए जब एआइ डिजिटल कामों को लगभग इंसानों की तरह करने में सक्षम हो जाएगा।'
मुखर्जी के अनुसार, 'एआइ कोडिंग से जुड़े कई तरह के कामों को पहले ही लगभग 50 प्रतिशत इंसानी विश्वसनीयता के स्तर तक करने में सक्षम हो गया है। उनका मानना है कि अगले दो से तीन सालों के भीतर एआइ तकनीक से जुड़े कामों के बड़े हिस्से में 90% या यहां तक कि 100 प्रतिशत विश्वसनीयता हासिल कर सकते हैं।
बड़ी तकनीकी कंपनियां AI में कर रही बेमिसाल खर्च
एआइ में हो रहे तेजी से बदलाव के पीछे माइक्रोसॉफ्ट, एमेजोन, अल्फाबेट, Apple और एंथ्रोपिक जैसी कंपनियों द्वारा इस पर किए जा रहे बेमिसाल खर्च है।
मुखर्जी का दावा है कि इन कंपनियों ने मिलकर पिछले सिर्फ 12 महीनों में एआइ पर अपना पूंजीगत खर्च दोगुना कर दिया है। उन्होंने एआइ इन्फ्रास्ट्रक्चर, चिप, डेटा सेंटर और लार्ज लैंग्वेज माडल (एलएलएम) की ट्रेनिंग पर लगभग 800 अरब डॉलर खर्च किए हैं। यह भारत की जीडीपी का 25 प्रतिशत है।
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मुखर्जी ने कहा कि हाल के महीनों में जो सबसे नाटकीय चीज देखने को मिली है, वह यह है कि इन तकनीकी कंपनियों को इस क्षेत्र से जबरदस्त राजस्व वृद्धि देखने को मिली है।
मुखर्जी ने पिछले तीन से चार महीनों में एआइ से होने वाले राजस्व में हुई तेज वृद्धि की ओर इशारा किया। उन्होंने एंथ्रोपिक को मुख्य उदाहरण के तौर पर पेश किया और दावा किया कि उसके क्लाउडएआइ प्लेटफॉर्म से जुड़ा एंटरप्राइज रेवेन्यू 2025 की शुरुआत में लगभग एक अरब डॉलर से बढ़कर सिर्फ 15 महीनों के अंदर ही लगभग 30 अरब डॉलर तक पहुंच गया।
58% जीसीसी पहले से ही कर रहे एजेंटिक एआइ का प्रयोग
मुखर्जी द्वारा बताए गए ईवाई के एक सर्वे से पता चला है कि भारत में मौजूद 58 प्रतिशत ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर्स (जीसीसी) पहले से ही 'एजेंटिक एआइ' में निवेश कर रहे हैं, जबकि 80% से ज्यादा सेंटर्स 'जेनरेटिव एआइ' में निवेश कर रहे हैं।
इसी सर्वे में यह भी सामने आया कि जीसीसी के अंदर मौजूद 24 प्रतिशत काम ऐसे हैं, जिन्हें पूरी तरह से आटोमेट किया जा सकता है और 42 प्रतिशत अन्य कामों को एआइ सिस्टम की मदद से काफी हद तक बेहतर बनाया जा सकता है।
मुखर्जी ने कहा, 'अगर मैं किसी जीसीसी को चला रहा होता, तो मैं उन 24% उन कामों को तुरंत ऑटोमेट कर देता जो फिलहाल इंसान कर रहा है।'
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