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भारत के 'आदित्य-L1' और यूरोपीय 'प्रोबा-3' की जोड़ी का कमाल, सौर विस्फोटों का रहस्य सुलझने की उम्मीद

Published: Fri, 16 Oct 2026 11:04 PM (GMT+05:30)

भारत के आदित्य-एल1 और यूरोपीय प्रोबा-3 मिशनों ने सौर विस्फोटों के रहस्यों को सुलझाने में महत्वपूर्ण सफलता हासिल की है। ...और पढ़ें

आदित्य-L1 और प्रोबा-3 के डाटा का पहली बार संयुक्त विश्लेषण

आदित्य-L1 और प्रोबा-3 के डाटा का पहली बार संयुक्त विश्लेषण

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डिजिटल डेस्क, बेंगलुरु। सूर्य पर होने वाले शक्तिशाली विस्फोटों के रहस्यों को सुलझाने के दिशा में भारत और यूरोप के विज्ञानियों को बड़ी सफलता मिली है। भारत के आदित्य-एल1 और यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी के प्रोबा-3 मिशन से मिले डाटा का पहली बार संयुक्त विश्लेषण किया गया है। यह शोध एस्ट्रोनामी एंड एस्ट्रोफिजिक्स पत्रिका में प्रकाशित हुआ है।

बेंगलुरु स्थित इंडियन इंस्टीट्यूट आफ एस्ट्रोफिजिक्स के विज्ञानियों ने आदित्य-एल1 के वीईएलसी पेलोड और प्रोबा-3 के एएसपीआईआईसीएस पेलोड से मिले डाटा का उपयोग कर कोरोनल मास इजेक्शन (सीएमई) का अध्ययन किया।

सीएमई सूर्य से निकलने वाले गर्म गैस और चुंबकेय पदार्थ के विशाल गुबार होते हैं। पृथ्वी के ओर आने पर ये आसपास के अंतरिक्ष के वातावरण को प्रभावित कर सकते हैं। आदित्य-एल1/वीईएलसी और प्रोबा-3 के डाटा से सीएमई को बेहतर ढंग से समझने में मदद मिलेगी।

भारत के पहले सौर मिशन आदित्य को 2023 में लांच किया गया था। यह छह जनवरी 2024 को पृथ्वी से लगभग 15 लाख किलोमीटर दूर सूर्य-पृथ्वी प्रणाली के लैग्रेंज प्वाइंट 1 (एल-1) के पास के कक्षा में पहुंचा और सूर्य का अध्ययन कर रहा है। एल-1 बिंदु के आसपास कक्षा में रखे गए सेटेलाइट से सूर्य को बिना किसी छाया/ग्रहण के लगातार देखा जा सकता है।

आदित्य का वीईएलसी उपकरण सूर्य के कोरोना से आने वाले प्रकाश के स्पेक्ट्रम का विश्लेषण करता है। वहीं, यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी का प्रोबा-3 मिशन दिसंबर 2024 में लॉन्च हुआ। इसके दो अंतरिक्षयान करीब 150 मीटर के दूरी पर उड़ते हैं। एक यान दूसरे पर छाया डालकर कृत्रिम सूर्यग्रहण जैसी स्थिति बनाता है। इससे इसका एएसपीआईआईसीएस उपकरण सूर्य के कोरोना के तस्वीरें लेता है। दोनों मिशनों ने सूर्य के लगभग एक ही क्षेत्र का अलग-अलग तरीकों से अध्ययन किया।

आदित्य-एल1 के उपकरण ने लगभग 20 लाख डिग्री तापमान वाली गैस के बारे में जानकारी दी। वहीं, प्रोबा-3 के तस्वीरों से विस्फोट का आकार, गति और द्रव्यमान मापने में मदद मिली। इससे अंतरिक्ष मौसम के पूर्वानुमान और उपग्रहों व संचार प्रणालियों पर संभावित प्रभावों का आकलन बेहतर बनाने में सहायता मिल सकती है।

शोध के अनुसार, जुलाई से दिसंबर 2025 के बीच दोनों उपकरणों ने 14 और 16 सितंबर को हुए दो सौर विस्फोटों को एक साथ दर्ज किया। दोनों मामलों में आदित्य ने विस्फोटों को शुरुआती चरण में देख लिया।

(न्यूज एजेंसी एएनआई के इनपुट के साथ)