‘मेधावी, बेबाक और निडर’; दीक्षांत समारोह विवाद के बाद सुप्रीम कोर्ट जज ने की NALSAR छात्रों की तारीफ
जस्टिस उज्ज्वल भुइयां ने नालसार यूनिवर्सिटी के छात्रों को 'शानदार, निडर और बहादुर' बताया, यह टिप्पणी हाल ही में हुए दीक्षांत समारोह विवाद के कुछ हफ्तों बाद आई है।

जस्टिस भुइयां ने की NALSAR छात्रों की सराहना (फाइल फोटो)

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डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। नालसार (NALSAR) यूनिवर्सिटी ऑफ लॉ में हाल ही में हुए दीक्षांत समारोह विवाद के कुछ ही हफ्तों बाद सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस उज्ज्वल भुइयां का एक बड़ा बयान सामने आया है।
हैदराबाद में आयोजित 19वीं NALSAR-जस्टिस बी.आर. साहनी मेमोरियल मूट कोर्ट प्रतियोगिता के समापन समारोह को संबोधित करते हुए उन्होंने यूनिवर्सिटी के छात्रों की जमकर तारीफ की। उन्होंने छात्रों को शानदार, निडर और बहादुर बताया।
'दुनिया को दिखाया लॉ छात्र कैसा होना चाहिए'
अपने भाषण के दौरान जस्टिस भुइयां ने NALSAR के छात्रों का जिक्र किया। उन्होंने कहा, अपनी बात खत्म करने से पहले, NALSAR के शानदार छात्रों के बारे में एक आखिरी बात कहना चाहता हूं। आपने देश और दुनिया को दिखाया है कि एक यूनिवर्सिटी का छात्र, और वो भी कानून का छात्र, कैसा होना चाहिए। आप वाकई शानदार हैं, निडर हैं और बेहद बहादुर हैं।
वहीं उन्होंने यूनिवर्सिटी के शिक्षकों और कुलपति प्रोफेसर श्रीकृष्ण देव राव के नेतृत्व की भी सराहना की। जस्टिस भुइयां ने कहा कि शिक्षकों और वाइस-चांसलर ने अपनी जिम्मेदारियों को बखूबी निभाया है और छात्रों का मार्गदर्शन बेहतर ढंग से किया है।
गौरतलब है कि 2022-23 में तेलंगाना हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस रहने के दौरान जस्टिस भुइयां NALSAR के पदेन चांसलर के रूप में सेवाएं दे चुके हैं।
विवाद के बीच बार काउसिंल की आई थी धमकी
बता दें कि अगस्त में NALSAR के ग्रेजुएट होने वाले छात्रों ने दीक्षांत समारोह में मुख्य अतिथि के तौर पर सीजेआई सूर्यकांत को आमंत्रित करने का विरोध किया था। यह विरोध दिल्ली में प्रदर्शनकारियों पर हुई कथित पुलिस ज्यादती से जुड़े मामले की सुनवाई के दौरान अदालत की टिप्पणियों को लेकर था।
इसके बाद बार काउंसिल ऑफ इंडिया के चेयरमैन मनन कुमार मिश्रा ने सख्त रुख अपनाने हुए NALSAR के 2026 बैच के ग्रेजुएट्स के एनरोलमेंट पर रोक लगाने के निर्देश दे दिए थे। हालांकि, बाद में विरोध और आलोचना के बाद BCI ने कुछ ही घंटों में अपना फैसला वापस ले लिया था।
बाद में 14 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट ने साफ आदेश दिया कि छात्रों या फैकल्टी के खिलाफ कोई दंडात्मक कार्रवाई न की जाए, और यह स्पष्ट किया कि BCI के पास लॉ के छात्रों पर अनुशासनात्मक कार्रवाई का कोई कानूनी अधिकार नहीं है।
वोटिंग अधिकार और चुनाव आयोग पर भी रखी बात
छात्रों की तारीफ करने से ठीक पहले जस्टिस भुइयां ने देश में मताधिकार और लोकतांत्रिक मूल्यों पर अपनी बात रखी, जिसे सुप्रीम कोर्ट के ही पुराने रुख से अलग एक बेहद गंभीर टिप्पणी के रूप में देखा जा रहा है। प्रसिद्ध कानूनविद नानी पालकीवाला का हवाला देते हुए उन्होंने कहा, आजादी खून में विरासत के तौर पर नहीं मिलती, हर पीढ़ी को इसकी रक्षा करनी होती है।
उन्होंने कहा कि कोई भी ऐसी प्रक्रिया जो लाखों भारतीय नागरिकों को वोट देने के अधिकार से वंचित करती है, वह मूल रूप से मनमानी और संवैधानिक व्यवस्था के खिलाफ है। इसे किसी भी तरह से सही नहीं ठहराया जा सकता।
जस्टिस भुइयां ने कहा कि भारतीय संविधान नागरिकों के दो वर्गों की व्यवस्था नहीं करता है। एक वर्ग जिसके पास वोट देने का अधिकार है और दूसरा वर्ग जिसके पास वोट देने का अधिकार नहीं है। कोई भी ऐसी प्रक्रिया जिसके तहत भारतीय नागरिकों को बड़े पैमाने पर वोट देने के अधिकार से वंचित किया जाए, वह संविधान के अनुच्छेद 326 और 14 का उल्लंघन होगा।
ऐसी प्रक्रिया संविधान की मूल भावना पर चोट करती है। मैं तो यहां तक कहूंगा कि यह उस व्यवस्था को नकारने जैसा है, जिसे संविधान के तहत अपनाया गया है।
SIR विवाद के बीच टिप्पणी
उनकी यह टिप्पणी ऐसे समय में आई है जब हाल ही में विपक्षी दलों ने चुनाव आयोग के SIR पर सवाल खड़े किए हैं, जबकि सुप्रीम कोर्ट ने विभिन्न याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान SIR प्रक्रिया को पूरी तरह वैध ठहराया था और इसे चुनाव आयोग का संवैधानिक अधिकार माना था।
शीर्ष अदालत ने मई, 2026 के अपने फैसले की पहली लाइन में लिखा था कि किसी भी प्रतिनिधि सरकार के लिए वोटों की गिनती करने से पहले यह जानना जरूरी है कि किन लोगों के वोट गिने जाने चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने बिहार और बंगाल के SIR से जुड़े मामलों में बार-बार स्पष्ट किया है कि यह चुनाव आयोग का अधिकार है।
