हिमालयी आपदा: निगरानी तंत्र का सवाल, भारत के लिए बड़ी चेतावनी
तिब्बत में हिमस्खलन से नेपाल में आई बाढ़ भारत के लिए हिमालयी आपदाओं की बड़ी चेतावनी है, जहां जलवायु परिवर्तन ...और पढ़ें

नेपाल त्रासदी से लेनी चाहिए सीख।
जेएनएन, नई दिल्ली। तिब्बत में हिमस्खलन के कारण नेपाल में आई भीषण बाढ़ भारत के लिए एक बड़ी चेतावनी है। तिब्बत उसी हिमालयी क्षेत्र का हिस्सा है, जो सदियों से भारत की पहचान रहा है। अगर हिमस्खलन से पैदा हुए सैलाब की दिशा थोड़ी इधर उधर होती है तो तबाही का मंजर भारत की सीमाओं में दिख रहा होता।
जलवायु परिवर्तन और ढांचागत सुविधाओं के विकास के कारण हिमालय का पारिस्थितिकी तंत्र लगातार कमजोर हो रहा है। हिमालय में 2,000 से अधिक ग्लेशियर झीलें हैं। ये कभी भी बड़ी तबाही का कारण बन सकती हैं। इन झीलों की रियल टाइम निगरानी किए जाने की जरूरत है।
भारत मौसम विज्ञान और अंतरिक्ष विज्ञान में तेजी से आगे बढ़ रहा है। ऐसे में प्राकृतिक आपदाओं की पूर्व चेतावनी जारी करने के लिहाज से हमारा निगरानी तंत्र कितना मजबूत और प्रभावी है, इसकी पड़ताल आज प्रासंगिक है...
रिसर्च
हिमालयी क्षेत्र में हिमस्खलन और ग्लेशियर टूटने (जीएलओएफ) जैसी घटनाओं की पूर्व चेतावनी देने के संदर्भ में भारत की निगरानी प्रणाली अंतरिक्ष-आधारित प्रौद्योगिकियों में मजबूत है, लेकिन आन-ग्राउंड रियल-टाइम अलर्ट और सीमा-पार डाटा शेयरिंग के स्तर पर अभी भी महत्वपूर्ण कमियां हैं।
उपग्रह और मैपिंग नेटवर्क
ग्लेशियर मैपिंग: इसरो के नेशनल रिमोट सेंसिंग सेंटर (एनआरएससी) के पास भारतीय हिमालयी क्षेत्र और आसपास के सीमावर्ती क्षेत्रों के ग्लेशियरों का विस्तृत सेटेलाइट डाटाबेस है।

2,431 ग्लेशियर झीले हैं भारत के हिमालयी क्षेत्र में
676 झीलों के आकार में दर्ज की गई उल्लेखनीय वृद्धि
उच्च-जोखिम वाली झीलों की पहचान:
189 उच्च जोखिम वाली ग्लेशियर झीलों की पहचान की है भारत के हिमालयी राज्यों में एनडीएमए और केंद्रीय जल आयोग ने
56 झीलों को अत्यधिक संवेदनशील श्रेणी में रखा गया है 189 उच्च जोखिम वाली ग्लेशियर झीलों में से
अर्ली वार्निंग सिस्टम और जमीनी निगरानी की स्थिति
उच्च पर्वतीय क्षेत्रों के लिए स्वदेशी तकनीक पर आधारित अर्ली वार्निंग सिस्टम तैनात कर रहा है एनडीएमए
हिमाचल में आटोमैटिक वेदर स्टेशन और इनसैट आधारित उपग्रह संचार प्रणाली का किया गया है सफल पायलट परीक्षण

भू-सेंसर की सीमित संख्या: उपग्रह चित्रों से दूरस्थ ग्लेशियरों की स्थिति तो पता चलती है, लेकिन केवल उपग्रह चित्रों से कुछ ही मिनटों में अचानक होने वाले हैंगिंग ग्लेशियर या चट्टान-बर्फ हिमस्खलन का पूर्वानुमान लगाना कठिन होता है। इसके लिए आवश्यक धरातलीय सेंसर (जैसे सीस्मिक मानिटर, जियोफोन और आटोमैटिक वाटर लेवल सेंसर बेहद दुर्गम होने के कारण अभी भी सीमित संख्या में ही स्थापित हो पाए हैं।
सीमा पार अलर्ट में चुनौतियां
समेकित आंकड़ों का अभाव: एनडीएमए के आधिकारिक वक्तव्य के अनुसार, तिब्बत या नेपाल जैसे अंतरराष्ट्रीय सीमा पार क्षेत्रों में बनने वाली नई अस्थाई झीलों या भूस्खलन-रोधी बांधों के जल प्रवाह और मलबे का सटीक अनुमान लगाना चुनौतीपूर्ण होता है। सीमा पार से रियल-टाइम सेंसर डाटा की अनुपलब्धता के कारण निचली घाटियों को अलर्ट भेजने का प्रतिक्रिया समय घटकर 15 से 30 मिनट ही रह जाता है।
एआई आधारित अर्ली वार्निंग नेटवर्क पर काम जारी
भारत का अंतरिक्ष तकनीक आधारित निगरानी इंफ्रास्ट्रक्चर मैपिंग और जोखिम मूल्यांकन के लिए सक्षम है, लेकिन अत्यंत दुर्गम और सीमा पार के क्षेत्रों से रियल-टाइम जमीनी जानकारी प्राप्त करने के लिए एकीकृत एआइ-आधारित अर्ली वार्निंग नेटवर्क को व्यापक रूप से लागू करने का काम जारी है।

आंकड़ों का स्रोत: इसरो 2024 रिपोर्ट, रिसर्च: महेन्द्र सिंह
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